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विश्व हथकरघा दिवस: महेश्वर का हुनर राष्ट्रीय मंच पर चमका, बुनकर कमल गौड़ को राष्ट्रपति करेंगी सम्मानित
Fri, 07 Aug 2026 04:15 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, महेश्वर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, महेश्वर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Fri, 07 Aug 2026 04:15 PM IST
सार
महेश्वर की पारंपरिक महेश्वरी बुनाई को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। स्वतंत्रता दिवस के राष्ट्रपति भवन समारोह के लिए महेश्वरी स्टोल चुना गया है, जबकि वरिष्ठ बुनकर कमल गौड़ को वर्ष 2025 का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलेगा। यह सम्मान मध्य प्रदेश की हस्तकरघा कला और बुनकरों के गौरव का प्रतीक है।
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महेश्वर की बुनाई अपने आप में विशेष है।
- फोटो : अमर उजाला
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नर्मदा के शांत तट पर सदियों से करघों की लय में गूंजती महेश्वर की बुनाई कला आज पूरे देश के गौरव का प्रतीक बन गई है। एक ओर स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले 'एट होम' समारोह के विशेष निमंत्रण में देश-विदेश से आने वाले अतिथियों के स्वागत के लिए महेश्वरी परंपरा में हाथ से बुने विशेष स्टोल (दुपट्टे) को चुना गया है, वहीं, दूसरी ओर महेश्वर के प्रख्यात बुनकर कमल गौड़ को वर्ष 2025 का राष्ट्रीय पुरस्कार सात अगस्त को महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के कर-कमलों से प्रदान किया जाएगा। एक सप्ताह में मिली ये दोनों उपलब्धियां केवल महेश्वर के लिए नहीं, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के हस्तकरघा और पारंपरिक शिल्प जगत के लिए गर्व का विषय हैं।
महेश्वर की साड़ी विश्व प्रसिद्ध है।
- फोटो : अमर उजाला
देवी अहिल्या ने बुनकरों को बसाया था
यह संयोग नहीं, बल्कि महेश्वर की 300 वर्ष पुरानी बुनाई परंपरा के पुनर्जागरण का संकेत है। जिस नगरी में लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ने बुनकरों को बसाकर महेश्वरी साड़ी की नींव रखी थी, उसी नगरी की बुनाई आज राष्ट्रपति भवन तक पहुंच चुकी है। करघों की हर आवाज आज मानो यह कह रही है कि परंपरा कभी पुरानी नहीं होती, यदि उसे समर्पण और गुणवत्ता के साथ आगे बढ़ाया जाए। महेश्वर की रंगाई, बुनाई केवल वस्त्र निर्माण नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और आत्मनिर्भरता की जीवंत पहचान है। यहां हजारों परिवार आज भी हस्तकरघा उद्योग से जुड़े हैं। बदलते समय में मशीनों की चुनौती के बावजूद महेश्वर के बुनकरों ने अपनी कला को जीवित रखा और उसे राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
महेश्वर की बुनाई देश की सांस्कृतिक पहचान
रूही हैंडलूम के संचालक कमल गौड़ का राष्ट्रीय पुरस्कार केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि हर उस बुनकर की मेहनत का सम्मान है जिसने वर्षों तक करघे पर बैठकर भारतीय परंपरा को जीवित रखा। वहीं, राष्ट्रपति भवन के स्वतंत्रता दिवस समारोह में महेश्वरी स्टोल का चयन यह प्रमाणित करता है कि महेश्वर की बुनाई आज भारत की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। यदि सरकार महेश्वरी बुनाई को आधुनिक डिजाइन, विपणन, निर्यात और युवा प्रशिक्षण से लगातार जोड़ती रही, तो आने वाले वर्षों में महेश्वर विश्व के प्रमुख हस्तकरघा केंद्रों में और मजबूत पहचान स्थापित कर सकता है। यह समय विरासत को संरक्षित करने का नहीं, बल्कि नई पीढ़ी तक गर्व के साथ पहुंचाने का भी है।
इनका कहना है...
यह संयोग नहीं, बल्कि महेश्वर की 300 वर्ष पुरानी बुनाई परंपरा के पुनर्जागरण का संकेत है। जिस नगरी में लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ने बुनकरों को बसाकर महेश्वरी साड़ी की नींव रखी थी, उसी नगरी की बुनाई आज राष्ट्रपति भवन तक पहुंच चुकी है। करघों की हर आवाज आज मानो यह कह रही है कि परंपरा कभी पुरानी नहीं होती, यदि उसे समर्पण और गुणवत्ता के साथ आगे बढ़ाया जाए। महेश्वर की रंगाई, बुनाई केवल वस्त्र निर्माण नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और आत्मनिर्भरता की जीवंत पहचान है। यहां हजारों परिवार आज भी हस्तकरघा उद्योग से जुड़े हैं। बदलते समय में मशीनों की चुनौती के बावजूद महेश्वर के बुनकरों ने अपनी कला को जीवित रखा और उसे राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
महेश्वर की बुनाई देश की सांस्कृतिक पहचान
रूही हैंडलूम के संचालक कमल गौड़ का राष्ट्रीय पुरस्कार केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि हर उस बुनकर की मेहनत का सम्मान है जिसने वर्षों तक करघे पर बैठकर भारतीय परंपरा को जीवित रखा। वहीं, राष्ट्रपति भवन के स्वतंत्रता दिवस समारोह में महेश्वरी स्टोल का चयन यह प्रमाणित करता है कि महेश्वर की बुनाई आज भारत की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। यदि सरकार महेश्वरी बुनाई को आधुनिक डिजाइन, विपणन, निर्यात और युवा प्रशिक्षण से लगातार जोड़ती रही, तो आने वाले वर्षों में महेश्वर विश्व के प्रमुख हस्तकरघा केंद्रों में और मजबूत पहचान स्थापित कर सकता है। यह समय विरासत को संरक्षित करने का नहीं, बल्कि नई पीढ़ी तक गर्व के साथ पहुंचाने का भी है।
इनका कहना है...
- नरेंद्र पंड्या बुनकर, ताना-बाना (महेश्वर): राष्ट्रपति भवन के सम्मान समारोह में महेश्वरी स्टोल का शामिल होना हमारे लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। इससे देश-दुनिया में हमारी बुनाई की नई पहचान बनेगी और महिला बुनकरों का भी उत्साह बढ़ेगा।
- अनिल मुक्ति ज्योति हैंडलूम (महेश्वर): कमल गौड़ को राष्ट्रीय पुरस्कार हर उस परिवार की जीत है जो वर्षों से करघों के सहारे अपना जीवन चला रहा है। यह सम्मान आने वाली पीढ़ियों को इस कला से जुड़े रहने की प्रेरणा देगा।"
- अर्जुन चौहान वीरा हैंडलूम (महेश्वर): महेश्वर की पहचान केवल पर्यटन नहीं, बल्कि उसकी बुनाई भी है। राष्ट्रपति भवन तक पहुंची हमारी कला यह साबित करती है कि परंपरा और गुणवत्ता का कोई विकल्प नहीं है।
- यशवंतराव होलकर रेवा सोसाइटी(महेश्वर): सरकार यदि महेश्वरी बुनाई के लिए डिजाइन, विपणन और निर्यात की बेहतर व्यवस्था विकसित करे तो यहां के हजारों बुनकरों की आर्थिक स्थिति और मजबूत होगी। यह सम्मान उसी दिशा में एक नई शुरुआत है।
महेश्वर के प्रख्यात बुनकर कमल गौड़
- फोटो : अमर उजाला
मछुआरे से बुनकर बनने तक का असाधारण सफर
राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए चुने जाने पर महेश्वर के बुनकर कमल गौड़ ने कहा कि महेश्वरी साड़ी केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि समय के चक्र की वह बुनावट है, जिसे हमने अपने पूर्वजों के संघर्ष और राजमाता अहिल्याबाई होलकर के आशीर्वाद से सींचा है। नेशनल अवॉर्ड के लिए प्रस्तुत यह कृति हमारे समुदाय के मछुआरे से बुनकर बनने के उस असाधारण सफर का प्रतीक है, जिसने इतिहास की धाराओं को बदल दिया।
गौड़ ने भावुक अंदाज में कहा कि हमारी कहानी राजस्थान के उन छोटे गांवों से शुरू होती है, जहां हमारे पूर्वज नदियों के किनारे मछली पकड़कर अपना जीवन यापन करते थे। उनके हाथों में तब रेशम के धागे नहीं, बल्कि मछली पकड़ने के जाल हुआ करते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। देवी अहिल्याबाई होलकर की पारखी नजरों ने हमारे पूर्वजों की निष्ठा को पहचाना और उन्हें महेश्वर की पावन धरा पर पालकी उठाने का गौरवपूर्ण दायित्व सौंपा। यहीं से हमारे जीवन में जाल की जगह जालदार बुनाई ने ले ली।
बॉक्स : महेश्वरी बुनाई एक नजर में
राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए चुने जाने पर महेश्वर के बुनकर कमल गौड़ ने कहा कि महेश्वरी साड़ी केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि समय के चक्र की वह बुनावट है, जिसे हमने अपने पूर्वजों के संघर्ष और राजमाता अहिल्याबाई होलकर के आशीर्वाद से सींचा है। नेशनल अवॉर्ड के लिए प्रस्तुत यह कृति हमारे समुदाय के मछुआरे से बुनकर बनने के उस असाधारण सफर का प्रतीक है, जिसने इतिहास की धाराओं को बदल दिया।
गौड़ ने भावुक अंदाज में कहा कि हमारी कहानी राजस्थान के उन छोटे गांवों से शुरू होती है, जहां हमारे पूर्वज नदियों के किनारे मछली पकड़कर अपना जीवन यापन करते थे। उनके हाथों में तब रेशम के धागे नहीं, बल्कि मछली पकड़ने के जाल हुआ करते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। देवी अहिल्याबाई होलकर की पारखी नजरों ने हमारे पूर्वजों की निष्ठा को पहचाना और उन्हें महेश्वर की पावन धरा पर पालकी उठाने का गौरवपूर्ण दायित्व सौंपा। यहीं से हमारे जीवन में जाल की जगह जालदार बुनाई ने ले ली।
बॉक्स : महेश्वरी बुनाई एक नजर में
- 18वीं शताब्दी में लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ने महेश्वरी बुनाई को संरक्षण दिया।
- रेशम और सूती धागों के अनूठे मिश्रण से तैयार होती है महेश्वरी साड़ी।
- हल्की, आकर्षक और दोनों ओर से पहनने योग्य बॉर्डर इसकी प्रमुख विशेषता है।
- कांगरा, चटाई, ईंट, लहर और हीरा जैसे पारंपरिक डिजाइन इसकी पहचान हैं।
- महेश्वर में हजारों परिवार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हस्तकरघा उद्योग से जुड़े हैं।
