हिमाचल में पांच प्रमुख शक्तिपीठों के अलावा माता के कई प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर हैं। इन मंदिरों में पूरा साल श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। शक्तिपीठ छिन्न मस्तिका धाम चिंतपूर्णी, श्रीनयना देवी, मां ज्वाला जी, बज्रेश्वरी धाम कांगड़ा और मां चामुंडा के अलावा नाहन स्थित मां बाला सुंदरी, मंडी में मां सिमसा माता, शिमला के तारादेवी मंदिर और कांगड़ा के बगलामुखी मंदिर में नवरात्र में देश भर से श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। माता के भवनों का रंग-बिरंगे फूलों से किया गया शृंगार हर किसी का मन मोह लेता है। ये मंदिर कई रहस्यों से भरे पड़े हैं।
रहस्यों से भरे हैं हिमाचल के ये मंदिर और शक्तिपीठ, जानिए रोचक तथ्य
शक्तिपीठ माता बज्रेश्वरी देवी के मंदिर का इस बार भी नवरात्र में फूलों से शृंगार किया गया है। मंदिर अधिकारी गौरव शर्मा के अनुसार 52 शक्तिपीठों में प्रमुख बज्रेश्वरी शक्तिपीठ एक ऐसा धाम है, जहां भक्तों की हर दुख-तकलीफ मां की एक झलक भर देखने से दूर हो जाती है। पुराणों के अनुसार मां सती ने भगवान शिव के अपमान से कुपित होकर पिता राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए थे। तब क्रोधित शिव भगवान ने मां सती की देह को लेकर संपूर्ण ब्रह्मांड का भ्रमण किया। सती मोह को भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर को कई टुकड़ों में बांट दिया। मां सती के शरीर के अंग धरती पर जहां-जहां गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए। मान्यता है कि कांगड़ा में माता सती का दाहिना वाम अंग/बायां वक्ष गिरा था, इसलिए यह स्थल बज्रेश्वरी शक्तिपीठ कहलाया।
51 शक्तिपीठों में सर्वोपरि मां ज्वाला
अकबर ने ज्वालाजी में ज्योतियों को बुझाने के प्रयास किए और अब ओएनजीसी सालों से यह जानने में जुटी हुई है कि आखिर मां ज्वाला की ज्योतियां सदियों से कैसे जल रही हैं। मां ज्वाला का स्थान आज भी रहस्य बना है। कांगड़ा का ज्वालाजी मंदिर सदियों से रहस्य बना हुआ है। यहां दिन-रात ज्योतियां कैसे जल रही हैं इसे आज तक कोई नहीं जान पाया है। मुगल सम्राट अकबर ने इन ज्योतियों को बुझाने के लिए एक नहर खुदवाकर पानी छोड़ दिया था। ज्योतियों पर लोहे के तवे चढ़ा दिए गए। ज्योतियां पानी से नहीं बुझ पाईं। तवों को भी चीरकर निकल आईं। उसके बाद अकबर का अहंकार टूटा, नंगे पैर मां के दर्शन करने पहुंचा और सोने का छत्र चढ़ाया।
सालों से ओएनजीसी ज्वालाजी में डेरा जमाए हुए है। हर दो-चार साल बाद यहां नई टीम यह खोजने पहुंच जाती है कि कहीं यहां पेट्रोलियम पदार्थ या गैस तो नहीं है। उसके बाद टीम थक-हारकर लौट जाती है। अब तक मंदिर के आसपास की एक दर्जन जगहों पर मशीनरी लगाकर खोज की जा चुकी है। पिछले कुछ सालों में टिहरी, बग्गी और आसपास के क्षेत्रों में गैस की खोज की गई, लेकिन मां की ज्योतियों का रहस्य जानने में विज्ञान भी फेल है। अब सुराणी में चिह्नित साइट पर नई टीम पहुंच गई है। मान्यता है कि पांडवों ने अपने वनवास काल के दौरान इन ज्योतियों को खोजा था। उन्होंने मंदिर की नींव रखी और भवन बनाया। हालांकि, इस मंदिर को सबसे पहले बनवाने का श्रेय राजा भूमि चंद को जाता है। बाद में महाराजा रणजीत सिंह और कांगड़ा के राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर को पूरा कराया। रणजीत सिंह ने मुख्य मंदिर के बाहरी छत्र पर सोने का पानी चढ़ाया।
उनके पौत्र कंवर नौनिहाल सिंह ने मंदिर के मुख्य दरवाजों पर चांदी के पत्र चढ़वाए थे। शक्तिपीठ ज्वालाजी अपने आप में इसलिए भी अनूठा है क्योंकि यहां पर मूर्ति पूजा नहीं होती। मंदिर के अंदर माता की नौ ज्योतियां हैं जिन्हें, महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है। मां ज्वाला को 51 शक्तिपीठों में सर्वोपरि माना गया है। मंदिर के समीप में ही बाबा गोरखनाथ का मंदिर है जिसे गोरख डिब्बी से जाना जाता है।

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