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Chromium: गूगल की अपनी तकनीकें अब उसके खिलाफ खड़ीं, एआई के दौर में क्यों डगमगाई सर्च में बादशाहत?
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Thu, 23 Oct 2025 05:13 PM IST
सार
Google Chromium: गूगल, जिसने इंटरनेट सर्च को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, अब उसी की बनाई तकनीकें उसके लिए चुनौती बन रही हैं। एआई के इस दौर में गूगल का एक प्रोडक्ट उसके रास्ते में नई मुसीबतें खड़ी कर रहा है।
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क्रोम ब्राउजर
- फोटो : AI
गूगल आज ऐसे दौर में है जब उसके अपने ही आविष्कार उसके लिए चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। दशकों तक सर्च इंजन और ब्राउजर में एकाधिकार रखने वाली टेक कंपनी गूगल को आज नई कंपनियों से चुनौती मिलने लगी है। हाल ही में OpenAI ने Atlas और Perplexity ने Comet वेब ब्राउजर को लॉन्च किया है। दिलचस्प बात ये है कि दोनों ही ब्राउजर एक ऐसे प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं जिसकी नींव खुद गूगल ने रखी थी। आज हम आपको बताएंगे कि कैसे गूगल का यह फ्री प्लेटफॉर्म उसी के लिए सिरदर्द बन चुका है।
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Google Chrome
- फोटो : FREEPIK
ट्रांसफॉर्मर: जिसने AI की दिशा ही बदल दी
12 जून 2017 को गूगल के शोधकर्ताओं ने एक पेपर प्रकाशित किया जिसका शीर्षक "Attention Is All You Need" रखा गया था। इसमें "ट्रांसफॉर्मर" नाम के न्यूरल नेटवर्क आर्किटेक्चर को दुनिया के सामने पेश किया गया था। इस पेपर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में क्रांति ला दी।
ट्रांसफॉर्मर मॉडल की सबसे खास बात यह थी कि यह किसी वाक्य के सभी शब्दों को लाइन-बाई-लाइन प्रोसेस करने के बजाए एक साथ प्रोसेस कर सकता था। इससे मॉडल का ट्रेनिंग टाइम घटा और नतीजे पहले से कहीं बेहतर आए। इसी ने GPT जैसे बड़े लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) के लिए रास्ता खोला।
12 जून 2017 को गूगल के शोधकर्ताओं ने एक पेपर प्रकाशित किया जिसका शीर्षक "Attention Is All You Need" रखा गया था। इसमें "ट्रांसफॉर्मर" नाम के न्यूरल नेटवर्क आर्किटेक्चर को दुनिया के सामने पेश किया गया था। इस पेपर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में क्रांति ला दी।
ट्रांसफॉर्मर मॉडल की सबसे खास बात यह थी कि यह किसी वाक्य के सभी शब्दों को लाइन-बाई-लाइन प्रोसेस करने के बजाए एक साथ प्रोसेस कर सकता था। इससे मॉडल का ट्रेनिंग टाइम घटा और नतीजे पहले से कहीं बेहतर आए। इसी ने GPT जैसे बड़े लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) के लिए रास्ता खोला।
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गूगल क्रोमियम
- फोटो : Google
आफत बना खुद का ओपन-सोर्स इंजन
2008 में गूगल ने क्रोम ब्राउजर के साथ उसका ओपन-सोर्स इंजन क्रोमियम (Chromium) भी जारी किया था। क्रोमियम एक ओपन-सोर्स (Open Source) वेब ब्राउजर प्रोजेक्ट है जिसका सोर्स कोड सबके लिए खुला है। यानी कोई भी डेवलपर इसे देखकर अपने हिसाब से ब्राउजर बना सकता है। Chromium वो नींव है जिस पर Google Chrome और कई अन्य ब्राउजर बनाए गए हैं। Google ने इसे ओपन-सोर्स इसलिए किया ताकि इंटरनेट टेक्नोलॉजी तेजी से आगे बढ़े, लेकिन अब यही कदम उसके लिए चुनौती भी बन रहा है, क्योंकि दूसरी कंपनियाँ इसी Chromium इंजन पर अपने AI-पावर्ड ब्राउजर बना रही हैं।
Microsoft Edge, Brave, Opera जैसे ब्राउजर्स Chromium के इंजन का इस्तेमाल करते हैं और अब उनमें से कई अपने AI-आधारित असिस्टेंट्स या सर्च टूल्स को डिफॉल्ट बना रहे हैं। ओपन-सोर्स होने के वजह से इसके इस्तेमाल से कोई भी अपना वेब ब्राउजर बना सकता है।
2008 में गूगल ने क्रोम ब्राउजर के साथ उसका ओपन-सोर्स इंजन क्रोमियम (Chromium) भी जारी किया था। क्रोमियम एक ओपन-सोर्स (Open Source) वेब ब्राउजर प्रोजेक्ट है जिसका सोर्स कोड सबके लिए खुला है। यानी कोई भी डेवलपर इसे देखकर अपने हिसाब से ब्राउजर बना सकता है। Chromium वो नींव है जिस पर Google Chrome और कई अन्य ब्राउजर बनाए गए हैं। Google ने इसे ओपन-सोर्स इसलिए किया ताकि इंटरनेट टेक्नोलॉजी तेजी से आगे बढ़े, लेकिन अब यही कदम उसके लिए चुनौती भी बन रहा है, क्योंकि दूसरी कंपनियाँ इसी Chromium इंजन पर अपने AI-पावर्ड ब्राउजर बना रही हैं।
Microsoft Edge, Brave, Opera जैसे ब्राउजर्स Chromium के इंजन का इस्तेमाल करते हैं और अब उनमें से कई अपने AI-आधारित असिस्टेंट्स या सर्च टूल्स को डिफॉल्ट बना रहे हैं। ओपन-सोर्स होने के वजह से इसके इस्तेमाल से कोई भी अपना वेब ब्राउजर बना सकता है।
Meta AI, chatGPT, Grok AI
- फोटो : अमर उजाला
डगमगा रही सर्च में बादशाहत
गूगल की ताकत चार चीजों पर टिकी है जिसमें भारी सर्च ट्रैफिक, डिफॉल्ट ब्राउजर सेटिंग्स, यूजर डेटा और विज्ञापन से होने वाली कमाई शामिल है। लेकिन अब AI बेस्ड सर्च इस ढांचे को बदल रहे हैं। गूगल यूजर्स को सर्च करने पर वेब पेज के लिंक दिखाता है, लेकिन एआई आधारित ब्राउजर सवाल का सीधा जवाब देते हैं जिसका सोर्स इंटरनेट पर पहले से उपलब्ध जानकारियां होती हैं। इससे यूजर्स को किसी लिंक को खोलकर जानकारी पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती और उनका काम आसान हो जाता है। AI चैटबॉट्स और लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स वही कर रहे हैं। इससे पारंपरिक सर्च रिजल्ट्स और विज्ञापन क्लिक कम हो रहे हैं जो गूगल की कमाई की रीढ़ हैं।
साथ ही, गूगल पहले से ही एंटी-ट्रस्ट जांचों में फंसा हुआ है, जिनमें उस पर मार्केट में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अनुचित सौदे करने के आरोप हैं। स्टैटकाउंटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 के आखिरी तीन महीनों में गूगल का सर्च मार्केट शेयर 90 प्रतिशत के नीचे चला गया, जो पिछले 10 साल में पहली बार हुआ था। वहीं, स्टैटिस्टा की रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2025 में यह 79.1 प्रतिशत के साथ रिकार्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था। वहीं, एक और रिपोर्ट के अनुसार, एशिया और यूरोप में गूगल का डेक्सटॉप सर्च में हिस्सेदारी 80 फीसदी ने नीचे जा चुकी है। इसकी बड़ी वजह ChatGPT और Meta Ai समेत अन्य छोटे-बड़े एआई प्लेटफॉर्म्स को माना जा रहा है।
गूगल की ताकत चार चीजों पर टिकी है जिसमें भारी सर्च ट्रैफिक, डिफॉल्ट ब्राउजर सेटिंग्स, यूजर डेटा और विज्ञापन से होने वाली कमाई शामिल है। लेकिन अब AI बेस्ड सर्च इस ढांचे को बदल रहे हैं। गूगल यूजर्स को सर्च करने पर वेब पेज के लिंक दिखाता है, लेकिन एआई आधारित ब्राउजर सवाल का सीधा जवाब देते हैं जिसका सोर्स इंटरनेट पर पहले से उपलब्ध जानकारियां होती हैं। इससे यूजर्स को किसी लिंक को खोलकर जानकारी पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती और उनका काम आसान हो जाता है। AI चैटबॉट्स और लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स वही कर रहे हैं। इससे पारंपरिक सर्च रिजल्ट्स और विज्ञापन क्लिक कम हो रहे हैं जो गूगल की कमाई की रीढ़ हैं।
साथ ही, गूगल पहले से ही एंटी-ट्रस्ट जांचों में फंसा हुआ है, जिनमें उस पर मार्केट में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अनुचित सौदे करने के आरोप हैं। स्टैटकाउंटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 के आखिरी तीन महीनों में गूगल का सर्च मार्केट शेयर 90 प्रतिशत के नीचे चला गया, जो पिछले 10 साल में पहली बार हुआ था। वहीं, स्टैटिस्टा की रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2025 में यह 79.1 प्रतिशत के साथ रिकार्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था। वहीं, एक और रिपोर्ट के अनुसार, एशिया और यूरोप में गूगल का डेक्सटॉप सर्च में हिस्सेदारी 80 फीसदी ने नीचे जा चुकी है। इसकी बड़ी वजह ChatGPT और Meta Ai समेत अन्य छोटे-बड़े एआई प्लेटफॉर्म्स को माना जा रहा है।
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ChatGPT
- फोटो : अमर उजाला
सर्च की जगह ले रहे AI असिस्टेंट्स
अब सर्च केवल जानकारियों को पेश करने का ही नहीं, बल्कि बातचीत का भी अनुभव बनता जा रहा है। यूजर्स जवाब का विश्लेषण पढ़ना पसंद कर रहे हैं और यह GPT जैसे मॉडल्स बेहतरीन तरीके से कर रहे हैं। आने वाले समय में Chromium आधारित ब्राउजर वैकल्पिक सर्च या एआई लेयर्स के साथ डिफॉल्ट आ सकते हैं। साथ ही, मॉनेटाइजेशन मॉडल भी बदल सकते हैं। जहां पहले विज्ञापनों से कमाई होती थी, अब सब्सक्रिप्शन और प्रीमियम AI सेवाएं जगह ले सकती हैं।
Google ने वो तकनीकें विकसित कीं जिनसे पूरी डिजिटल दुनिया आगे बढ़ी, लेकिन अब वही इनोवेशन उसके लिए नई चुनौती बन गए हैं। आज सवाल यह नहीं है कि गूगल सर्च में टिक पाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह आने वाले AI युग में अपने सिंहासन को बचा पाएगा?
अब सर्च केवल जानकारियों को पेश करने का ही नहीं, बल्कि बातचीत का भी अनुभव बनता जा रहा है। यूजर्स जवाब का विश्लेषण पढ़ना पसंद कर रहे हैं और यह GPT जैसे मॉडल्स बेहतरीन तरीके से कर रहे हैं। आने वाले समय में Chromium आधारित ब्राउजर वैकल्पिक सर्च या एआई लेयर्स के साथ डिफॉल्ट आ सकते हैं। साथ ही, मॉनेटाइजेशन मॉडल भी बदल सकते हैं। जहां पहले विज्ञापनों से कमाई होती थी, अब सब्सक्रिप्शन और प्रीमियम AI सेवाएं जगह ले सकती हैं।
Google ने वो तकनीकें विकसित कीं जिनसे पूरी डिजिटल दुनिया आगे बढ़ी, लेकिन अब वही इनोवेशन उसके लिए नई चुनौती बन गए हैं। आज सवाल यह नहीं है कि गूगल सर्च में टिक पाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह आने वाले AI युग में अपने सिंहासन को बचा पाएगा?