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UP: जिनके हाथों से बने जूते पूरे देश ने पहने...वो अब बेच रहे सब्जी, कोई चला रहा ई-रिक्शा; हुनर ने खो दी पहचान
Mon, 30 Dec 2024 10:07 PM IST
धीरेन्द्र सिंह
अबरार अहमद, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अबरार अहमद, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Mon, 30 Dec 2024 10:07 PM IST
सार
आगरा का ताजमहल, फिर पेठा और तीसरे नंबर पर जूता, जो बड़ी पहचान रखता है। कोरोना में हुए लोकडाउन में इस कारोबार से जुड़े कारीगरों ने अपने हुनर की पहचान को खो दिया। ऐसा झटका लगा कि कोई सब्जी बेचने लगा, तो किसी ने ई-रिक्शा चलाना शुरू कर दिया।
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Agra shoe industry
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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नाई की मंडी में रहने वाले मोहम्मद कफील का पूरा परिवार घर में ही जूता बनाता था। छह लोग मिलकर रोज करीब 80 जोड़ी जूते तैयार कर देते थे। इससे अच्छी आमदनी हो जाती थी लेकिन अब पूरे परिवार का रोजगार छिन गया है। कफील रेडिमेड कपड़े के शोरूम में 12 हजार महीने की नौकरी कर रहे हैं। उनके भाई-बहन भी दूसरे काम-धंधे में लग गए हैं।
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सदर भट्टी में जूते के थोक कारोबारी हाजी कदीर कहते हैं, पहले सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन लॉकडाउन ने कारोबार को बड़ा नुकसान पहुंचाया। इंडस्ट्री संभलने की कोशिश कर रही थी कि सरकार ने जीएसटी को पांच से बढ़ाकर 12 प्रतिशत कर दिया, जिसका व्यापक असर पड़ा। छोटे कारोबारियों की कमर टूट गई। घर-घर में चलने वाले छोटे व मझौले कारखाने बंद हो गए। लागत बढ़ने से माल की खपत भी घट गई। अब इंडस्ट्री को ब्यूरो ऑफ इंडियंस स्टैंडर्स (बीआईएस) के दायरे में लाने से हालात और बदतर हो गए हैं। 12 माह चलने वाला कारोबार सिमटकर केवल चार महीने का रह गया है।
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नाई की मंडी में जूता फैक्टरी चलाने वाले कारोबारी राशिद कोहिनूर ने कहा कि 12 फीसदी के जीएसटी ने जूता कारोबारियों को सड़क पर ला दिया है। हाल यह है कि एक जोड़ी जूते पर कारोबारी को पांच और सरकार को 24 रुपये मिल रहे हैं। सरकार की नीतियां शू इंडस्ट्री को गर्त में ले जा रही हैं। ई-काॅमर्स कंपनियां भी आगरा के बाजार को बड़ा नुकसान पहुंचा रही हैं। हर साल काम कम होता जा रहा है क्योंकि बाजार में उधारी का काम खत्म हो गया है। सस्ते लोन की भी कोई व्यवस्था सरकार ने नहीं की है। इससे छोटे कारोबारी बाजार से बाहर हो गए हैं।
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- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पर्ची सिस्टम खत्म होने से बदल गई इंडस्ट्री की चाल
टीला नंद राम में घरेलू व छोटे कारखानों के लिए शू डिजाइनिंग का काम करने वाले एके सिंह कहते हैं कि लॉकडाउन से पहले उनके पास इतना काम होता था कि आठ-आठ दिन की वेटिंग रहती थी और अब पूरे दिन में कुछ ही लोग आते हैं। वह कहते हैं कि पहले बाजार में पर्ची सिस्टम चलता था। इससे छोटे कारोबारियों को पैसे की दिक्कत नहीं होती थी लेकिन उसके बंद होने से काम आधा हो गया। पहले जहां रोजाना 200 जोड़ी जूते बनते थे, अब 20 जोड़ी बन रहे हैं। इससे बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए। हाल यह है कि आज कोई सब्जी बेच रहा है, बेलदारी कर रहा है तो कोई ई-रिक्शा चला रहा है।
टीला नंद राम में घरेलू व छोटे कारखानों के लिए शू डिजाइनिंग का काम करने वाले एके सिंह कहते हैं कि लॉकडाउन से पहले उनके पास इतना काम होता था कि आठ-आठ दिन की वेटिंग रहती थी और अब पूरे दिन में कुछ ही लोग आते हैं। वह कहते हैं कि पहले बाजार में पर्ची सिस्टम चलता था। इससे छोटे कारोबारियों को पैसे की दिक्कत नहीं होती थी लेकिन उसके बंद होने से काम आधा हो गया। पहले जहां रोजाना 200 जोड़ी जूते बनते थे, अब 20 जोड़ी बन रहे हैं। इससे बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए। हाल यह है कि आज कोई सब्जी बेच रहा है, बेलदारी कर रहा है तो कोई ई-रिक्शा चला रहा है।
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दिल्ली और नेपाल पलायन कर रहे कारीगर
जूता व्यवसायी जितिन कर्दम और नईम ने बताया कि दिल्ली और नेपाल में मशीनों से जूते बन रहे हैं जबकि यहां हाथ का ही काम है। मशीनों से तेजी से काम हो रहा, जिसका असर आगरा में जूते के कुटीर उद्योग पर पड़ रहा है। इंडस्ट्री को करीब से जानने वाले मुईन बाबू कहते हैं कि काम कम होने से छोटे कारखानों के मालिक भी अब मजदूर जैसे बन गए हैं। उनके पास इतनी पूंजी नहीं कि मशीनें लगा सकें और बीआईएस प्रमाणन ले सकें। ऐसे में वह काम छोड़कर दूसरे धंधे में जा रहे हैं।
जूता व्यवसायी जितिन कर्दम और नईम ने बताया कि दिल्ली और नेपाल में मशीनों से जूते बन रहे हैं जबकि यहां हाथ का ही काम है। मशीनों से तेजी से काम हो रहा, जिसका असर आगरा में जूते के कुटीर उद्योग पर पड़ रहा है। इंडस्ट्री को करीब से जानने वाले मुईन बाबू कहते हैं कि काम कम होने से छोटे कारखानों के मालिक भी अब मजदूर जैसे बन गए हैं। उनके पास इतनी पूंजी नहीं कि मशीनें लगा सकें और बीआईएस प्रमाणन ले सकें। ऐसे में वह काम छोड़कर दूसरे धंधे में जा रहे हैं।