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Vikas Encounter: पुलिस के गले की फांस न बन जाए विकास का एनकाउंटर, सरकार की साख बचाई पर न्याय व्यवस्था को भूली पुलिस

आशीष अग्रवाल, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Sun, 12 Jul 2020 02:36 AM IST
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Vikas Dubey Encounter News: Story of encounter
kanpur encounter - फोटो : amar ujala
एनकाउंटर में विकास दुबे की मौत यूपी पुलिस पर बड़े सवाल खड़े कर रही है। विकास को उज्जैन से कानपुर लाने के दौरान अचानक गाड़ी का पलटना, विकास का भागना, भागते हुए अपराधी के सीने में गोली लगना और मुठभेड़ में उसकी मौत होना। पहली नजर में सबकुछ बड़ा अजीब लगता है।
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Kanpur encounter - फोटो : अमर उजाला
वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ताओं की राय में पुलिस ने अपने स्तर से कानून का पालन करते हुए पेचीदगियों से बचने की पूरी कोशिश की लेकिन विकास की मौत से उठ रहे कई सवाल उसे जांच और अदालती कार्रवाई में उलझा सकते हैं।
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Vikas Dubey Encounter News: Story of encounter
kanpur encounter - फोटो : amar ujala
विकास की मौत ने जनता के आक्रोश को तो दबा दिया, सरकार की साख को भी बचा लिया लेकिन अदालत में पेशी से पहले ही विकास की मुठभेड़ में मौत ने न्याय व्यवस्था पर अविश्वास जताने वाली मंशा को भी बल दिया है। पुलिसिया कार्रवाई के बजाय न्यायालय से मिलने वाला इंसाफ अधिक महत्वपूर्ण और जनता व अपराधियों पर गहरी छाप छोड़ने वाला होता है।

 
Vikas Dubey Encounter News: Story of encounter
kanpur encounter news - फोटो : amar ujala
जनभावना से जोड़कर देखें तो विकास दुबे की मौत पर सवाल नहीं होने चाहिए लेकिन कानूनी दृष्टिकोण से पुलिस की एनकाउंटर की कहानी में कई छेद हैं। कुख्यात अपराधी को बिना हथकड़ी सफर पर ले चलना, भागते हुए आदमी की पीठ के बजाय सीने में गोली लगना जैसे सवालों का सामना जांच के दौरान पुलिसकर्मियों को करना होगा। संतोष शुक्ला हत्याकांड में पुलिसकर्मी ही अदालत में बयान से मुकर गए थे। ऐसे में शायद पुलिस अपने ही लोगों पर भरोसा नहीं कर पा रही थी, इसीलिए न्यायालय से इंसाफ के बजाय खुद ही सजा का फैसला कर लिया।
- दिनेश शुक्ला, लॉयर्स एसोसिएशन अध्यक्ष

अपराधी को मारने से अपराध खत्म नहीं होता, इसीलिए देश में कानून का राज है। न्याय व्यवस्था में अपराध साबित होने के बाद उसी आधार पर दंड की व्यवस्था है। अपराधी को जेल में बंद रखने के पीछे भी कानून का मकसद अपराधी में पश्चाताप और सुधार की भावना जगाना होता है। बिकरू में हुई पुलिसकर्मियों की शहादत से सभी दुखी हैं लेकिन इतने दुर्दांत अपराधी की ऐसी मौत समझ से परे है। एनकाउंटर की पुलिसिया कहानी खुद ही अपराधी को न्यायालय में पेश करने में बरती गई लापरवाही को उजागर करने के लिए काफी है।
- सईद नकवी, वरिष्ठ अधिवक्ता

 
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kanpur encounter - फोटो : amar ujala
सीआरपीसी की धारा 37 एक आम आदमी को भी यह अधिकार देती है कि वह पुलिस के आने तक अपराधी को पकड़कर रखे। ऐसे में महाकाल मंदिर के सिक्योरिटी गार्ड ने विकास को पकड़ा और पुलिस के हवाले किया। यूपी पुलिस ने एमपी पुलिस के साथ कानूनी कार्यवाही पूरी की और फिर विकास को कानपुर देहात न्यायालय में पेश करने के लिए उज्जैन से कानपुर रवाना हुए लेकिन पेशी के पहले ही मुठभेड़ में विकास की मौत हो गई। प्रथम दृष्टया पुलिस ने कोई विधिक त्रुटि नहीं की है। बाकी जांच का विषय है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति साफ होगी।
- अजय सिंह भदौरिया, वरिष्ठ अधिवक्ता

पुलिस का काम अपराधी को पकड़ना है, दंड देने का अधिकार सिर्फ न्यायालय को है। न्यायिक दृष्टिकोण से मुठभेड़ के नाम पर पुलिस द्वारा किसी अपराधी की हत्या को जायज नहीं ठहराया जा सकता। पुलिसकर्मियों की हत्या का बदला लेने के लिए किया गया एनकाउंटर न्याय की श्रेणी में नहीं आता। विकास का एनकाउंटर पुलिस और अपराधी के बीच जंग के रूप में सामने आ रहा है। ऐसे एनकाउंटर जनता के आक्रोश को दबाने में तो महत्वपूर्ण हो सकते हैं लेकिन इससे कहीं न कहीं जनता का न्याय व्यवस्था पर विश्वास भी डिगता है।
- डीएस मिश्रा, वरिष्ठ अधिवक्ता
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