हिमाचल: अनुबंध कर्मचारियों के वेतन संशोधन के फैसले पर अंतरिम रोक, जानें हाईकोर्ट के बड़े फैसले
हाईकोर्ट ने अनुबंध कर्मचारियों को संशोधित वेतनमान लागू होने के बाद न्यूनतम वेतन अंतर का भुगतान करने के फैसले पर अगले आदेशों तक अंतरिम रोक लगा दी है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अनुबंध कर्मचारियों को संशोधित वेतनमान लागू होने के बाद न्यूनतम वेतन अंतर का भुगतान करने के फैसले पर अगले आदेशों तक अंतरिम रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एकल जज के उस निर्णय के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है, इसमें अनुबंध कर्मचारियों को संशोधित वेतनमान लागू होने के बाद न्यूनतम वेतन अंतर का भुगतान करने के निर्देश दिए गए थे।एकल न्यायाधीश ने यशवंत और घनश्याम मामलों में 21 मार्च 2024 के अपने फैसले में राज्य सरकार के उस रुख को खारिज कर दिया था कि तीन जनवरी 2022 की वेतन संशोधन अधिसूचना केवल नियमित कर्मचारियों के लिए है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि संशोधित वेतनमान (रिवाइज पे रूल्स,2022) के तहत अनुबंध कर्मचारियों को भी बढ़ी हुई न्यूनतम वेतन दर और पे-बैंड के अंतर का लाभ मिलेगा। एकल पीठ ने अनुबंध कर्मचारियों को भी नियुक्ति तिथि से नियमितीकरण तक संशोधित पे-बैंड के अंतर का लाभ देने का आदेश दिया था।राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ खंडपीठ के समक्ष अपील दायर कर चुनौती दी, जिस पर अदालत ने सुनवाई करते हुए इस अंतरिम रोक का आदेश पारित किया।राज्य सरकार ने दलील दी थी कि 3 जनवरी 2022 की वेतन संशोधन अधिसूचना केवल नियमित (रेगुलर) कर्मचारियों के लिए लागू है।
देवरी स्कूल के नए भवन के दूसरी बार उद्घाटन पर हाईकोर्ट नाराज
हाईकोर्ट ने मंडी जिले के सरकारी स्कूल देवरी के नए भवन के दूसरी बार उद्घाटन पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इस मामले से जुड़ी जनहित याचिका को बंद करने के आदेश जारी किए। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि स्कूल की नई इमारत का मंगलवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उद्घाटन करने के पश्चात इसे छात्रों और स्कूल प्रबंधन को सौंप दिया गया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने दो बार एक ही बिल्डिंग के उद्घाटन को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। सरकार की ओर से अदालत को आश्वस्त किया गया कि भविष्य में प्रदेश में ऐसा नहीं दोहराया जाएगा। खंडपीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि एक तरफ को सरकार वित्तीय संकट का रोना रो रही है और वहीं दूसरी तरफ एक ही बिल्डिंग का दो बार उद्घाटन कर जनता के धन का दुरुपयोग किया जा रहा है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने माना कि स्कूल बिल्डिंग का शिक्षा मंत्री ने भी उद्घाटन किया था और जिसके लिए संभवतः सरकारी धन का उपयोग भी किया था। गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता कुंज लाल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर पूछा था कि उद्घाटन होने के बावजूद बच्चों को नए भवन में क्यों नहीं शिफ्ट किया जा रहा है। मंडी जिले के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला देवरी का पुराना स्कूल भवन प्राकृतिक आपदा में पूरी तरह बह गया था। भवन न होने के कारण शिक्षा विभाग की ओर से छोटे किराए के कमरों का इंतजाम कर स्कूल चलाया जा रहा था, जिससे बच्चों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। सरकार के आश्वासन के बाद हाईकोर्ट ने यह जनहित याचिका में सुनवाई बंद कर दी है।
सेवानिवृत्ति के करीब पहुंचे चालक के तबादले आदेश रद्द
प्रदेश हाईकोर्ट ने आबकारी विभाग में चालक के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी के 18 मार्च 2026 के विवादित तबादले आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायाधीश अजय मोहन की अदालत ने माना कि सेवानिवृत्ति के करीब पहुंचे और चालक जैसे श्रेणी के कर्मचारी का प्रशासनिक आवश्यकता के नाम पर किया गया स्थानांतरण सही नहीं था, विशेषकर तब जब दूसरे कर्मचारी को उसकी सुविधा के अनुसार वहां समायोजित किया गया हो। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता मंडी में 4 साल का कार्यकाल पूरा कर चुका है, लेकिन सेवानिवृत्ति में 2 साल से भी कम का समय शेष होने के नाते राज्य सरकार और विभाग को निर्देश दिए गए हैं कि याचिकाकर्ता (ओम चंद) को उनकी सेवानिवृत्ति तक मंडी स्थित उनके वर्तमान स्थल (संयुक्त आयुक्त आबकारी, सेंट्रल ज़ोन, मंडी) पर ही सेवा करने की अनुमति दी जाए। राज्य सरकार का तर्क था कि कुल्लू कार्यालय में चालकों की कमी के कारण याचिकाकर्ता को मंडी से कुल्लू भेजा गया था। हालांकि, अदालत ने पाया कि शिमला में तैनात एक निजी प्रतिवादी को बिना टीटीए और ज्वाइनिंग टाइम के याचिकाकर्ता की जगह मंडी में ट्रांसफर कर दिया गया। अदालत ने कहा कि यदि वास्तव में कुल्लू में चालक की कमी थी, तो शिमला वाले कर्मचारी को सीधे कुल्लू भेजा जा सकता था। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह तबादला निजी प्रतिवादी के अनुरोध पर किया गया था।
एलर्जली भवन का अस्तित्व खतरे में, सरकार को नोटिस
प्रदेश हाईकोर्ट ने छोटा शिमला स्थित प्रदेश सचिवालय के ऐतिहासिक एलर्जली भवन के समीप अवैध और नियमों को दरकिनार कर किए गए निर्माण कार्य को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। अदालत ने पाया कि नवनिर्मित कंक्रीट के ढांचे ऐतिहासिक भवन को शारीरिक रूप से ओवरलैप कर रहे हैं। इससे इस ऐतिहासिक प्रतीक का अस्तित्व और गरिमा प्रभावित हो रही है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल निर्माण कार्य का नहीं है, बल्कि सरकारी जवाबदेही, जन प्रशासन में पारदर्शिता, विरासत के संरक्षण और मनमानेपन के खिलाफ कानून की सर्वोच्चता से जुड़ा है। सूचना का अधिकार अधिनियम में प्राप्त जानकारी और हेरिटेज कैबिनेट सब-कमेटी की कार्रवाई यह खुलासा हुआ है कि निर्माण और बदलाव के दौरान अनिवार्य सेटबैक नियमों का पालन नहीं किया गया। अदालत की निष्पक्ष सहायता और स्वतंत्र राय के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीमती देवयानी शर्मा को न्याय मित्र नियुक्त किया गया है। राज्य सरकार (प्रतिवादी 1 से 4) की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राकेश ढौल्टा ने नोटिस स्वीकार किया, जबकि प्रतिवादी 5 और 6 (एडवोकेट मुकुल सूद) को एक सप्ताह के भीतर नोटिस तामील करने के निर्देश दिए गए हैं।
याचिका में मुख्य मांगें
कैप्टन अतुल शर्मा की शिकायत के आधार पर शुरू हुई इस जनहित याचिका में अदालत से विशेषज्ञ समिति का गठन, विरासत संरक्षण विशेषज्ञों, स्ट्रक्चरल इंजीनियरों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय स्वतंत्र समिति बनाकर समयबद्ध जांच रिपोर्ट तैयार करने की मांग की गई है। इसके अलावा अवैध अतिक्रमण को अनुमति देने, बढ़ावा देने, अनदेखा करने या रोकने में विफल रहने वाले अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाए। दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार अनुशासनात्मक, नागरिक और आपराधिक कार्रवाई शुरू की जाए। मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर को तय की गई है।