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जहां उतरे 'सैफई परिवार' के उम्मीदवार, वहां हुआ ज्यादा नुकसान, ये हैं प्रमुख कारण
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sun, 26 May 2019 01:35 PM IST
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मुलायम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव और अक्षय यादव
- फोटो : अमर उजाला
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इस लोकसभा चुनाव में सपा का बंटाधार होने की कई वजह सामने आ रही हैं। बसपा का वोट सपा के साथ न जुड़ पाना तो एक कारण है ही। दूसरी बड़ी वजह सैफई परिवार का बिखराव भी मानी जा रही है, जिसके कारण यादव वोट में सेंध लग गई।
सैफई परिवार के रिश्तेदार भी एकजुट नजर नहीं आए। इससे गलत संदेश गया। इसका असर इससे पता चलता है कि जहां सैफई परिवार के उम्मीदवार थे, वहां पहले से कम वोट मिले हैं। अन्य जगहों पर हार भले ही मिली हो, पर वोट पहले से ज्यादा हैं।
गठबंधन में ब्रज की छह सीटों में से तीन सपा के पास थीं, एटा, फिरोजाबाद और मैनपुरी। दो बसपा के आगरा और फिरोजाबाद। एक रालोद के पास मथुरा। फिरोजाबाद में सैफई परिवार के कई रिश्तेदार अक्षय यादव के खिलाफ काम कर रहे थे। मैनपुरी में जो रिश्तेदार पहले सक्रिय रहते थे, उनमें से कई इस बार घर बैठे रहे। नतीजा सामने है।
फिरोजाबाद से रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव लड़े और मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव। दोनों जगह वोट 2014 से पहले कम मिले। मुलायम जीत तो गए लेकिन जीत का अंतर पहले से छोटा रहा। अक्षय तो हार ही गए। फिरोजाबाद में तो साफ ही दिख रहा है कि चाचा शिवपाल यादव ने जो वोट काटे, उनसे ही भतीजे अक्षय यादव की साइकिल पंक्चर हो गई।
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सैफई परिवार के रिश्तेदार भी एकजुट नजर नहीं आए। इससे गलत संदेश गया। इसका असर इससे पता चलता है कि जहां सैफई परिवार के उम्मीदवार थे, वहां पहले से कम वोट मिले हैं। अन्य जगहों पर हार भले ही मिली हो, पर वोट पहले से ज्यादा हैं।
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गठबंधन में ब्रज की छह सीटों में से तीन सपा के पास थीं, एटा, फिरोजाबाद और मैनपुरी। दो बसपा के आगरा और फिरोजाबाद। एक रालोद के पास मथुरा। फिरोजाबाद में सैफई परिवार के कई रिश्तेदार अक्षय यादव के खिलाफ काम कर रहे थे। मैनपुरी में जो रिश्तेदार पहले सक्रिय रहते थे, उनमें से कई इस बार घर बैठे रहे। नतीजा सामने है।
फिरोजाबाद से रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव लड़े और मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव। दोनों जगह वोट 2014 से पहले कम मिले। मुलायम जीत तो गए लेकिन जीत का अंतर पहले से छोटा रहा। अक्षय तो हार ही गए। फिरोजाबाद में तो साफ ही दिख रहा है कि चाचा शिवपाल यादव ने जो वोट काटे, उनसे ही भतीजे अक्षय यादव की साइकिल पंक्चर हो गई।
मैनपुरी: मुलायम के वोट घटे
2014 की मोदी लहर में मुलायम सिंह यादव को 596918 वोट मिले। जीत का अंतर 3.60 लाख से ज्यादा का रहा। मुलायम ने सीट खाली की तो उप चुनाव में तेज प्रताप को उनसे भी ज्यादा 653786 वोट मिले।
फिरोजाबाद: डिंपल की हार जैसा सदमा
फिरोजाबाद में 2009 में उप चुनाव में डिंपल यादव की हार से जैसा सदमा लगा था, वैसा ही इस बार भी महसूस हो रहा है। अक्षय यादव को 2014 में 534583 वोट मिले थे। इस बार 467038 हैं। अगर उनके चाचा शिवपाल यादव को मिले 90 हजार वोट जोड़ दिए जाएं तो कुल वोट भाजपा से ज्यादा हैं।
एटा: बसपा के वोट प्लस नहीं हुए
एटा में हार जरूर मिली है लेकिन वोट पहले से ज्यादा मिले हैं। 2014 में 273977 वोट मिले थे। अब 422054 वोट मिले हैं। माना जा रहा है कि यहां यादव नहीं बंटे। मुस्लिमों का भी साथ मिला। इस कारण वोट प्रतिशत बढ़ गया। बसपा के वोट में भाजपा ने सेंध लगा ली। इसी से कमल खिल गया।
2017 में ही सुनाई दे गई थी आहट
मैनपुरी, फिरोजाबाद, एटा और ब्रज के अन्य जिलों में सपा की हार पहली बार नहीं हुई। 2017 में कांग्रेस के साथ गठबंधन था। तब भी भारी नुकसान हुआ था। 2012 में 30 में से 21 सीटें जीती थीं। 2017 में इनमें से 24 भाजपा ने जीत ली।
2014 की मोदी लहर में मुलायम सिंह यादव को 596918 वोट मिले। जीत का अंतर 3.60 लाख से ज्यादा का रहा। मुलायम ने सीट खाली की तो उप चुनाव में तेज प्रताप को उनसे भी ज्यादा 653786 वोट मिले।
फिरोजाबाद: डिंपल की हार जैसा सदमा
फिरोजाबाद में 2009 में उप चुनाव में डिंपल यादव की हार से जैसा सदमा लगा था, वैसा ही इस बार भी महसूस हो रहा है। अक्षय यादव को 2014 में 534583 वोट मिले थे। इस बार 467038 हैं। अगर उनके चाचा शिवपाल यादव को मिले 90 हजार वोट जोड़ दिए जाएं तो कुल वोट भाजपा से ज्यादा हैं।
एटा: बसपा के वोट प्लस नहीं हुए
एटा में हार जरूर मिली है लेकिन वोट पहले से ज्यादा मिले हैं। 2014 में 273977 वोट मिले थे। अब 422054 वोट मिले हैं। माना जा रहा है कि यहां यादव नहीं बंटे। मुस्लिमों का भी साथ मिला। इस कारण वोट प्रतिशत बढ़ गया। बसपा के वोट में भाजपा ने सेंध लगा ली। इसी से कमल खिल गया।
2017 में ही सुनाई दे गई थी आहट
मैनपुरी, फिरोजाबाद, एटा और ब्रज के अन्य जिलों में सपा की हार पहली बार नहीं हुई। 2017 में कांग्रेस के साथ गठबंधन था। तब भी भारी नुकसान हुआ था। 2012 में 30 में से 21 सीटें जीती थीं। 2017 में इनमें से 24 भाजपा ने जीत ली।