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Women's Day 2026: मुश्किलों में तपकर बन गईं कुंदन, आगरा की इन महिलाओं ने हौसले से बदल दी अपनी तकदीर

अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Sun, 08 Mar 2026 01:05 PM IST
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सार

Women's Day 2026: जीवन की विषम परिस्थितियां हों या पारिवारिक विवाद। महिलाओं को हर दौर में खुद को साबित करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। अपने शहर में भी ऐसी तमाम महिलाएं हैं जिन्होंने न तो परिस्थितियों के आगे घुटने टेके और न ही किसी से मदद की गुहार लगाई। परिवार के खातिर वो खुद मुश्किलों की आग में तपकर कुंदन सरीखी हो गईं हैं।

Women's Day 2026 Inspiring Women of Agra Who Turned Challenges Into Success
कंचन शुक्ला और मुद्रा। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार

महिला...वो कभी मां के रूप में ममता लुटाती है तो कभी बहन बनकर हौसला दिलाती है। पत्नी के रूप में हर कदम साथ निभाती है तो बेटी बनकर उम्मीद जगाती है। परिवार का जरा सा साथ मिला तो हर महिला अपने ख्वाबों को हकीकत में बदल सकती है। मुश्किल दौर में भी वह हौसलों आसमान को जमीन कर सकती है। बदलते दौर में महिलाओं ने अपने मेहनत, लगन से न केवल विशेष मुकाम पाया बल्कि कड़े संघर्षों ने उन्हें तपाकर कुंदन सा निखार दिया है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर अमर उजाला ने शहर की ऐसी ही महिलाओं की प्रेरणा भरी कहानी लाया है जिन्होंने उसने साबित कर दिया है कि उसकी कोमलता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है।.....
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पेट्रोल पंप पर सेवाएं दे रही हैं कंचन
शारदा विहार निवासी कंचन पिछले दो साल से बोदला स्थित पेट्रोल पंप पर कार्यरत हैं। बताती हैं कि एक हादसे में पति ने अपना पैर गंवा दिया। उनके इलाज में जमा पूंजी निबट गईं। घर चलाने में दिक्कत आई तो उन्होंने पेट्रोल पंप पर काम करना शुरू कर दिया। कंचन बताती हैं कि मुझे बहुत खुशी होती है जब पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हूं। कहती हैं लोगों की सोच में बदलाव आया है। अब लोग किसी भी काम को छोटी दृष्टि से नहीं देखते बल्कि उनकी हौसला अफजाई भी करते हैं।


 
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सारी दुनिया का बोझ ये उठाती हैं
आगरा कैंट रेलवे स्टेशन पर साल 2008 से कुली के रूप में मुद्रा कार्य कर रही हैं। कहती हैं यह वह दौर था जब पुरुषों के किसी भी क्षेत्र में महिलाएं इक्का-दुक्का ही दिखती थीं। उस पर भी बोझ उठाने का काम परंपरागत रूप से पुरुषों का माना जाता है। तीन बच्चों की परवरिश का बोझ उनके कंधों पर था और सहयोग करने वाला कोई नहीं। कहती हैं पढ़ी-लिखी नहीं थी इसलिए कोई दूसरा काम भी नहीं कर सकती थी। शुरुआत में परेशानी और विरोध भी झेला लेकिन उन्होंने मुश्किलों से हार नहीं मानी।

 

बेटी कर रही है मां की परवरिश
खिलौैनों से खेलने की उम्र में 11 वर्षीय सांवी अपनी मां की परवरिश खुद मां बनकर कर रही है। बताती हैं कि चार साल पहले जब वो केवल 7 साल की थी तब उसके पिता का देहांत हो गया। इसके बाद से मां का स्वास्थ्य भी खराब रहने लगा। पिछले तीन साल से वह ठेल पर गली-मोहल्लों में सब्जी बेचकर अपनी मां की इलाज करा रही है। बताती है कि सुबह 10 बजे से शाम तक ठेल लगाती है और फिर शाम को घर जाकर घरेलू काम और मां की सेवा करती है। पढ़ाई के सवाल पर वह सिर्फ इतना ही बोली कि घर चलाने के लिए काम करना जरूरी है।
 
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