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High Court : मुद्दई की मौत के बाद लेखक व विवेचक एफआईआर की पुष्टि कर सकते हैं, सच्चाई की नहीं

Wed, 08 Jul 2026 05:42 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 08 Jul 2026 05:42 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मुद्दई की मौत के बाद एफआईआर का लेखक उसके हस्ताक्षर की पुष्टि कर सकता है, लेकिन घटना की सच्चाई साबित नहीं कर सकता।

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After the death of the complainant, the writer and the investigating officer can only verify the FIR
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मुद्दई की मौत के बाद एफआईआर का लेखक उसके हस्ताक्षर की पुष्टि कर सकता है, लेकिन घटना की सच्चाई साबित नहीं कर सकता। यह विधि व्यवस्था निर्धारित करते हुए न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की खंडपीठ ने 35 साल पुराने हत्या के मामले में उम्रकैद पाए खालिद और नन्नू को बेगुनाह माना। खालिद की तत्काल रिहाई का आदेश दे दिया।

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कोर्ट ने कहा कि एफआईआर के तथ्यों को मुद्दई ही साबित कर सकता है। यदि मुद्दई (शिकायतकर्ता) की मुकदमे के दौरान मौत हो जाती है। उसकी मृत्यु का एफआईआर में वर्णित घटना से कोई संबंध नहीं है तो उसकी सामग्री को ठोस साक्ष्य के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। ऐसी स्थिति में एफआईआर लिखने वाला व्यक्ति केवल यह साबित कर सकता है कि उसने मुद्दई के कहने पर रिपोर्ट लिखी थी, लेकिन वह उसमें दर्ज तथ्यों को सिद्ध नहीं कर सकता।
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मामला गाजियाबाद के भोजपुर का है। मेरठ निवासी वाहिउद्दीन की ओर से 1990 एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इसमें उसने अपने भतीजे खालिद और नौकर नन्नू पर बेटे सरफराज की हत्या का आरोप लगाया था। कहा कि घटना के समय इब्राहिम का बेटा इकबाल और उसका दूसरा बेटा सरताज उर्फ बबली भी वहां मौजूद थे। हालांकि, घटना के दौरान नन्नू के शरीर के नीचले हिस्से में भी गाेली के छर्रे लगे थे।

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विवेचना के बाद खालिद और नन्नू के खिलाफ आरोप पत्र लगा। ट्रायल के दौरान मुद्दई की मौत हो गई। खालिद ने आरोप को गलत बताते हुए कहा था कि यह मामला झूठा बनाया गया है। ट्रायल कोर्ट ने 2005 में उन्हें दोषी ठहराया था। सजा के खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपील के दौरान नन्नू की मौत हो गई।

कोर्ट ने पाया कि घटना के समय गवाहों का वहां मौजूद होना और उनका व्यवहार काफी अजीब था। गोली लगने की कहानी भी अविश्वसनीय लगी। लिहाजा, कोर्ट ने माना कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि घटना वास्तव में वैसे ही हुई थी, जैसा बताया गया था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-32 का लाभ तभी मिलेगा, जब मुद्दई की मौत उसी घटना या उससे लगी चोटों के कारण हुई हो। यदि उसकी मृत्यु किसी अन्य कारण से हुई है तो एफआईआर की सामग्री साक्ष्य नहीं बन सकती। ऐसी स्थिति में न तो एफआईआर का लेखक और न ही जांच अधिकारी उसके तथ्यों को साबित कर सकते हैं। वे केवल इतना बता सकते हैं कि रिपोर्ट किसने लिखवाई, किसने लिखी और किस दिन दर्ज हुई।

कोर्ट ने कहा कि एफआईआर घटना का सबसे प्रारंभिक विवरण होती है और उसकी सामग्री केवल वही व्यक्ति साबित कर सकता है जिसने उसे दर्ज कराया हो। उसके अभाव में एफआईआर का उपयोग न तो गवाहों की पुष्टि के लिए किया जा सकता है और न ही उसे स्वतंत्र साक्ष्य माना जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयान स्वाभाविक नहीं हैं। अभियोजन की कहानी साबित करने का तरीका भौतिक तथ्यों और चिकित्सकीय साक्ष्यों से मेल नहीं खाता। इसलिए अभियोजन आरोप संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा।

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