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High Court : पूर्व सैनिक की 48 साल पहले हुई हत्या में मिली उम्रकैद की सजा रद्द, दो की हो चुकी है मौत

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 08 Mar 2026 04:01 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रंजिश में 48 साल पहले पूर्व सैनिक की हत्या में उम्रकैद की सजा पाए एक आरोपी की सजा रद्द कर दी। सत्र अदालत ने तीन आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी।

High Court Life sentence for murder of former soldier 48 years ago cancelled, two have died
कोर्ट का आदेश। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रंजिश में 48 साल पहले पूर्व सैनिक की हत्या में उम्रकैद की सजा पाए एक आरोपी की सजा रद्द कर दी। सत्र अदालत ने तीन आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। तीन में दो की पहले ही मौत हो जाने के कारण उनकी अपील अपास्त की जा चुकी है। यह फैसला न्यायमूर्ति सीडी सिंह और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह की खंडपीठ ने सुल्तानपुर के राम हृदय, शिवराम व गुरु प्रसाद की अपीलों की एक साथ सुनवाई करते हुए दिया है। मुख्य न्यायाधीश के आदेश पर यह अपील निस्तारण के लिए सितंबर 1983 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की प्रधान पीठ स्थानांतरित कर दी गई थी।

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राम हृदय और शिवराम की मौत होने के कारण अपील पहले ही निरस्त की जा चुकी है। मामला सुल्तानपुर के मुसाफिर खाना थाना क्षेत्र का है। अभियोजन के मुताबिक वादी मुकदमा भगवती सेवक पांच भाई थे। भगवती ने अपने भाई 35 वर्षीय पूर्व सैनिक त्रिभुवन दत्त पर जानलेवा हमले की एफआईआर 1978 में दर्ज कराई थी। वादी मुकदमा के मुताबिक वह 14 मार्च 1978 को भाइयों के साथ बैठा था। इसी बीच पट्टीदार आरोपियों ने रंजिश में असलहे व लाठी लेकर घेर लिए। विवाद बढ़ने पर त्रिभुवन पर फायर कर दिया।
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त्रिभुवन को प्रारंभिक उपचार के बाद लखनऊ स्थित मिलिट्री अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान 20 मार्च 1978 को उनकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण सेप्टीसीमिया बताया गया। पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया। सत्र अदालत ने सभी को उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके खिलाफ सभी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि अभियोजन आरोप साबित करने में नाकाम रहा। अभियोजन के मुताबिक गुरु प्रसाद के हाथ में लाठी थी, हत्या सह अभियुक्त की बंदूक की गोली से हुई थी। इसमें इसकी भूमिका नहीं थी। लिहाजा, कोर्ट ने 18 मार्च 1981 को सत्र अदालत की ओर से सुनाई गई उम्र कैद की सजा रद्द कर दी और जमानत बंधपत्र निरस्त कर दिया। 

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