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Ambedkar Nagar News: बाढ़ में टापू बन जाते सरयू किनारे बसे गांव

Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Thu, 18 Jun 2026 10:48 PM IST
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The villages along the Saryu river turn into islands during the flood
मांझा कम्हरिया में कटान रोके जाने को लेकर लगाया गया परक्यूपाइ। संवाद
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राजेसुल्तानपुर। बरसात शुरू होने से पहले ही सरयू के किनारे बसे ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है। आलापुर और टांडा क्षेत्र में बारिश के दौरान सरयू नदी के किनारे बसे गांवों में पानी भर जाता है। गांव टापू की तरह दिखने लगने हैं। बाढ़ का असर क्षेत्र के करीब 35 गांवों पर पड़ता है। ऐसे में प्रशासन की ओर से किए गए इंतजाम भी नाकाफी होते हैं।

आलापुर तहसील क्षेत्र के आराजी देवरा, कम्हरिया व मांझा कम्हरिया क्षेत्र में बाढ़ का सबसे ज्यादा असर दिखता है। आलापुर तहसील क्षेत्र में सबसे पहले आरजी देवारा के प्रसाद कुर्मी का पूरा, करिया लोनिया का पूरा व हंसू का पूरा बाढ़ की चपेट में आता है, जहां गांव चारों तरफ से पानी से घिर जाने के कारण से टापू जैसे दिखते हैं। फसलें और घर तक कटान में जलमग्न हो जाते हैं। वहीं, मांझा कम्हरिया के बद्री का पूरा पटपरवा, निषाद बस्ती, नौका का पूरा, सत्यनारायण का पूरा, कल्लू का पूरा, दलित बस्ती के मजरों में रास्तों पर पानी का जमाव हो जाता है। इस दौरान गांवों के अंदर नदी का पानी भरने से विषैला जीव जंतु भी घरों तक पहुंच जाते हैं। वहीं, टांडा क्षेत्र के मांझा उल्टहवा, डुहिया, मुबारकपुर, चिंतौरा, औसानपुर व महरीपुर गांवों में बाढ़ का पानी भर जाता है
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तीन वर्ष पहले पहुंच गया था मगरमच्छ
तीन वर्ष पूर्व आरजी देवारा के करिया लोनिया पूरा गांव के किनारे खेत में मगरमच्छ पहुंच गया था। बाद में वन विभाग की टीम ने मगरमच्छ का रेस्क्यू कर सरयू नदी में ले जाकर छोड़ा था, ऐसे में बाढ़ के समय खतरा अधिक बढ़ जाता है। वर्ष 2022 में बाढ़ का असर अधिक रहा। इसके अलावा लगभग 10 वर्ष पूर्व माझा क्षेत्र के गांवों में बाढ़ ने कहर बरपाया था। उस दौरान लोगों को बंधे के साथ-साथ रिश्तेदारियों में जाकर शरण लेनी पड़ी थी।
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वर्ष 1998 में आई थी तबाही
वर्ष 1998 में बाढ़ की भयंकर तबाही व कटान से मांझा कम्हरिया के रग्घू का पूरा व झीनक का पूरा मजरा जहां पूरी तरह से कटान से नदी की धारा में समाहित हो गए थे। वहीं, बद्री के पूरा का भी कुछ अंश नदी की धारा में समा गया था। इस दौरान तीनों मजरे के लगभग 200 ग्रामीणों को प्रशासन की ओर से मांझा कम्हरिया से लगभग 10 किलोमीटर दूर खरुवइया नई बस्ती में जमीन व आवास देकर बसाया गया था। वे लोग आज भी मांझा कम्हरिया के ही मतदाता हैं।
मुआवजा के नाम पर मिलते हैं छह हजार
मांझा कम्हरिया के नौकापुर निवासी सतिराम यादव ने बताया कि उनका लगभग दो बीघा खेत कटान से नदी की धारा में एक वर्ष पूर्व समाहित हो गया था। मुआवजे के नाम पर सिर्फ छह हजार रुपये ही मिले थे, जो सिर्फ खानापूर्ति जैसा है। नदी के उफान के दौरान ग्रामीणों को सबसे अधिक समस्या आवागमन की होती है उस दौरान लोगों को नाव के सहारे आवागमन करना पड़ता है।

बारिश से पहले बढ़ जाती हैं धड़कनें
मांझा कम्हरिया के कल्लू का पूरा निवासी विजयी ने बताया कि बरसात का समय आते ही जुलाई अगस्त से बाढ़ की चिंता को लेकर धड़कनें बढ़ जाती हैं। लोग सामान को सुरक्षित स्थान के साथ-साथ ऊंचाइयों पर रखते हैं। पांच वर्षों से कटान को लेकर काफी परेशान है। कटान रोके जाने को लेकर प्रशासन द्वारा पूर्व में प्रयास किए गए, लेकिन सफल नहीं हुए। इस वर्ष भी परियोजना बनाकर कार्य किया गया है। पता नहीं इस बार कटान रुकेगी या हर बार की तरह तबाही मचेगी।

बाढ़ से निपटने की तैयारी पूरी
जिला प्रशासन की ओर बाढ़ से निपटने के लिए पूरी तैयारी कर ली गई है। प्रशासन का प्रयास है कि इस बार किसी प्रकार की कोई असुविधा न हो। इसके लिए संबंधित अधिकारियों को भी निर्देश दिए गए हैं। मुआवजा तहसील प्रशासन की ओर से मिली रिपोर्ट के आधार पर दिया जाता है।

ज्योत्सना बंधु, एडीएम वित्त एवं प्रशासन
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