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Amethi News: ललिता ने सिलाई से संवारी जिंदगी
Fri, 14 Aug 2026 12:36 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
Updated Fri, 14 Aug 2026 12:36 AM IST
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संग्रामपुर के मड़ौली गांव में तिरंगा बनाती समूह की महिलाएं। स्रोत: स्थानीय नागरिक
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संग्रामपुर। मड़ौली गांव की ललिता देवी ने करीब दो हजार रुपये की पूंजी से शुरू किए सिलाई-कढ़ाई के काम को तीन साल में स्वरोजगार का जरिया बना दिया। अब वह स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष बनकर 10 महिलाओं को रोजगार से जोड़ रही हैं।
पहली बार समूह को हर घर तिरंगा अभियान के तहत एक हजार राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने का काम मिला है। इससे महिलाओं को घर के पास ही काम और आमदनी का अवसर मिला है। पढ़ाई के दौरान सिलाई का प्रशिक्षण लेने वाली ललिता ने परिवार की मदद से काम शुरू किया था।
सीमित पूंजी के कारण शुरुआत में काम धीरे-धीरे बढ़ा। फिलहाल वह सिलाई-कढ़ाई से हर महीने पांच से सात हजार रुपये कमा रही हैं। सात दिन पहले समूह को एक हजार तिरंगे तैयार करने का लक्ष्य मिला था। अब तक 700 तिरंगे तैयार किए जा चुके हैं। ध्वजों की सिलाई निर्धारित मानकों और ध्वज संहिता के अनुरूप की जा रही है। तैयार तिरंगे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
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तानों के बावजूद नहीं छोड़ा हुनर
ललिता बताती हैं कि शुरुआत में गांव के कुछ लोगों के ताने सुनने पड़े। इसके बावजूद उन्होंने काम नहीं छोड़ा। धीरे-धीरे काम बढ़ा तो अन्य महिलाओं को भी समूह से जोड़ा। समूह की 10 महिलाएं सिलाई-कढ़ाई कर स्थानीय बाजार में उत्पाद बेच रही हैं। प्रत्येक महिला को हर महीने करीब तीन से चार हजार रुपये की आमदनी हो रही है।
रेडीमेड वस्त्र उद्योग लगाने की तैयारी
ललिता अब रेडीमेड वस्त्र उद्योग स्थापित कर कारोबार बढ़ाना चाहती हैं। उनका लक्ष्य गांव की अधिक महिलाओं को रोजगार से जोड़ना है। उनका कहना है कि महिलाओं को अपने हुनर पर भरोसा रखकर काम शुरू करना चाहिए। शुरुआत छोटी हो सकती है, मगर मेहनत और लगन से उसे आगे बढ़ाया जा सकता है।
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पहली बार समूह को हर घर तिरंगा अभियान के तहत एक हजार राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने का काम मिला है। इससे महिलाओं को घर के पास ही काम और आमदनी का अवसर मिला है। पढ़ाई के दौरान सिलाई का प्रशिक्षण लेने वाली ललिता ने परिवार की मदद से काम शुरू किया था।
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सीमित पूंजी के कारण शुरुआत में काम धीरे-धीरे बढ़ा। फिलहाल वह सिलाई-कढ़ाई से हर महीने पांच से सात हजार रुपये कमा रही हैं। सात दिन पहले समूह को एक हजार तिरंगे तैयार करने का लक्ष्य मिला था। अब तक 700 तिरंगे तैयार किए जा चुके हैं। ध्वजों की सिलाई निर्धारित मानकों और ध्वज संहिता के अनुरूप की जा रही है। तैयार तिरंगे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
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तानों के बावजूद नहीं छोड़ा हुनर
ललिता बताती हैं कि शुरुआत में गांव के कुछ लोगों के ताने सुनने पड़े। इसके बावजूद उन्होंने काम नहीं छोड़ा। धीरे-धीरे काम बढ़ा तो अन्य महिलाओं को भी समूह से जोड़ा। समूह की 10 महिलाएं सिलाई-कढ़ाई कर स्थानीय बाजार में उत्पाद बेच रही हैं। प्रत्येक महिला को हर महीने करीब तीन से चार हजार रुपये की आमदनी हो रही है।
रेडीमेड वस्त्र उद्योग लगाने की तैयारी
ललिता अब रेडीमेड वस्त्र उद्योग स्थापित कर कारोबार बढ़ाना चाहती हैं। उनका लक्ष्य गांव की अधिक महिलाओं को रोजगार से जोड़ना है। उनका कहना है कि महिलाओं को अपने हुनर पर भरोसा रखकर काम शुरू करना चाहिए। शुरुआत छोटी हो सकती है, मगर मेहनत और लगन से उसे आगे बढ़ाया जा सकता है।