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Auraiya News: हरचंदपुर में तीन साल बाद भी नहीं बन सका अमृत सरोवर
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Tue, 28 Apr 2026 12:31 AM IST
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फोटो-31- हरचंदपुर में इस जमीन पर बनना था अमृत सरोवर, ऊबड़खाबड़ जमीन पर उगी है झाड़ियां। संवाद
- फोटो : सड़क हादसे के बाद जलता डीसीएम व ट्रेलर।
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दिबियापुर। साल 2023 में अमृत सरोवर योजना के तहत जनपद के 97 तालाबों को संवारने की योजना बनाई गई। लाखों का बजट भी जुटाया गया।
ज्यादातर पंचायतों में अमृत सरोवर बन गए लेकिन यह काम जिले की बड़ी पंचायतों में शुमार हरचंदपुर में तीन साल बाद भी नहीं हो सका है। अछल्दा ब्लॉक की इस पंचायत में अधूरी पड़ी अमृत सरोवर योजना सरकारी सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहा है। अछल्दा ब्लॉक की ग्राम पंचायत हरचंदपुर जनपद की बड़ी पंचायतों में है।
यहां पर साल 2023 में अमृत सरोवर योजना के तहत सराय पुख्ता रोड किनारे तालाब को संवारने के लिए 27 लाख का खाका तैयार किया गया था। जिला प्रशासन की ओर से बनाई गई कार्ययोजना में इसे अहम जगह दिया गया था। यह तालाब बंबा से सटा हुआ है। भीषण गर्मी के दिनों में यहां पर बंबे के जरिए पानी का पर्याप्त भराव भी हो सकता है लेकिन यह प्रयास पूरा नहीं हो सका है।
योजना के शुरुआती दौर में यहां पर मनरेगा के जरिए करीब पांच लाख की लागत से श्रमिकों से इस तालाब की खोदाई कराई गई। इसके बाद इस तालाब से निगाहें हटा ली गईं। यही वजह है कि यहां पर तीन साल बाद भी ऊबड़-खाबड़ जमीन पड़ी हुई है।
यहां पर झाड़ियां खड़ी हो गई हैं। तालाब का नामोनिशान तक नहीं है। 27 लाख की यह परियोजना तीन सालों से ठंडे बस्ते में है। कागजों में सिमटी रह गई इस परियोजना पर अधिकारियों की निगाहें हट चुकी हैं।
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ज्यादातर पंचायतों में अमृत सरोवर बन गए लेकिन यह काम जिले की बड़ी पंचायतों में शुमार हरचंदपुर में तीन साल बाद भी नहीं हो सका है। अछल्दा ब्लॉक की इस पंचायत में अधूरी पड़ी अमृत सरोवर योजना सरकारी सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहा है। अछल्दा ब्लॉक की ग्राम पंचायत हरचंदपुर जनपद की बड़ी पंचायतों में है।
यहां पर साल 2023 में अमृत सरोवर योजना के तहत सराय पुख्ता रोड किनारे तालाब को संवारने के लिए 27 लाख का खाका तैयार किया गया था। जिला प्रशासन की ओर से बनाई गई कार्ययोजना में इसे अहम जगह दिया गया था। यह तालाब बंबा से सटा हुआ है। भीषण गर्मी के दिनों में यहां पर बंबे के जरिए पानी का पर्याप्त भराव भी हो सकता है लेकिन यह प्रयास पूरा नहीं हो सका है।
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योजना के शुरुआती दौर में यहां पर मनरेगा के जरिए करीब पांच लाख की लागत से श्रमिकों से इस तालाब की खोदाई कराई गई। इसके बाद इस तालाब से निगाहें हटा ली गईं। यही वजह है कि यहां पर तीन साल बाद भी ऊबड़-खाबड़ जमीन पड़ी हुई है।
यहां पर झाड़ियां खड़ी हो गई हैं। तालाब का नामोनिशान तक नहीं है। 27 लाख की यह परियोजना तीन सालों से ठंडे बस्ते में है। कागजों में सिमटी रह गई इस परियोजना पर अधिकारियों की निगाहें हट चुकी हैं।

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