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Auraiya News: 20 नवजात में से दो में सामने आ रहे पीलिया के लक्षण
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फोटो-23- एसएनसीयू में फोटो थेरेपी के लिए भर्ती नवजातों को देखते डॉ. रंजीत कुमार। स्रोत:कर्मी
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औरैया। नवजातों में पीलिया के मामले इन दिनों बढ़ गए हैं। मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू वार्ड में हर रोज 8-10 नवजात भर्ती हो रहे हैं। फोटो थेरेपी के बाद बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। जच्चा बच्चा विभाग में होने वाले 20 प्रसव में दो नवजातों में पीलिया के लक्षण देखे जा रहे हैं। प्रसव के बाद जच्चा के साथ ही बच्चा को भी भर्ती किया जा रहा है।
मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. रंजीत कुमार ने बताया कि नवजात में पीलिया के लक्षण दिखने पर तत्काल उपचार कराना चाहिए। बताया कि एक माह के बच्चों में पीलिया एक सामान्य प्रक्रिया है। पीलिया नवजात शिशुओं में अधिक होता है क्योंकि पीलिया हीमोग्लोबिन से बनता है। शिशुओं में हीमोग्लोबिन की मात्रा 16 ग्राम प्रति डेसीलीटर और वयस्कों में 12-14 ग्राम प्रति डेसीलीटर होती है। यह बच्चों में 90 दिन और वयस्कों में 120 दिन रहता है।
नवजात का लिवर भी वयस्कों की तुलना में कम सक्रिय होता है। कम दूध पीने वाले बच्चों में पीलिया तेजी से बढ़ता है। कम पीलिया लिवर की खराबी से नहीं होता है और मूत्र भी पीला नहीं होता है। इसे शारीरिक पीलिया कहते हैं। इन्हें फोटो थेरेपी की आवश्यकता होती है। नवजात बच्चों के लिए 10 बेड की सुविधा है। सामान्य स्थिति में तो बच्चों को तीन दिन में आराम मिल जाता है लेकिन स्थिति गंभीर होने पर एक सप्ताह का भी समय लग रहा है।
मां का दुग्धपान नवजात के लिए जरूरी
मेडिकल कॉलेज के सीएमएस डॉ. पवन कुमार शर्मा ने बताया कि नवजात में पीलिया एक सामान्य बात है लेकिन अनदेखी बड़ी समस्या खड़ी कर देती है। जरा से लक्षण नजर आने पर डॉक्टर को दिखाना चाहिए। एसएनसीयू में फोटो थेरेपी के लिए पर्याप्त इंतजाम है। फिर भी प्रसव के बाद से ही मां को बच्चे को दुग्धपान कराना चाहिए। इससे पीलिया में तेजी से सुधार होता है।
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मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. रंजीत कुमार ने बताया कि नवजात में पीलिया के लक्षण दिखने पर तत्काल उपचार कराना चाहिए। बताया कि एक माह के बच्चों में पीलिया एक सामान्य प्रक्रिया है। पीलिया नवजात शिशुओं में अधिक होता है क्योंकि पीलिया हीमोग्लोबिन से बनता है। शिशुओं में हीमोग्लोबिन की मात्रा 16 ग्राम प्रति डेसीलीटर और वयस्कों में 12-14 ग्राम प्रति डेसीलीटर होती है। यह बच्चों में 90 दिन और वयस्कों में 120 दिन रहता है।
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नवजात का लिवर भी वयस्कों की तुलना में कम सक्रिय होता है। कम दूध पीने वाले बच्चों में पीलिया तेजी से बढ़ता है। कम पीलिया लिवर की खराबी से नहीं होता है और मूत्र भी पीला नहीं होता है। इसे शारीरिक पीलिया कहते हैं। इन्हें फोटो थेरेपी की आवश्यकता होती है। नवजात बच्चों के लिए 10 बेड की सुविधा है। सामान्य स्थिति में तो बच्चों को तीन दिन में आराम मिल जाता है लेकिन स्थिति गंभीर होने पर एक सप्ताह का भी समय लग रहा है।
मां का दुग्धपान नवजात के लिए जरूरी
मेडिकल कॉलेज के सीएमएस डॉ. पवन कुमार शर्मा ने बताया कि नवजात में पीलिया एक सामान्य बात है लेकिन अनदेखी बड़ी समस्या खड़ी कर देती है। जरा से लक्षण नजर आने पर डॉक्टर को दिखाना चाहिए। एसएनसीयू में फोटो थेरेपी के लिए पर्याप्त इंतजाम है। फिर भी प्रसव के बाद से ही मां को बच्चे को दुग्धपान कराना चाहिए। इससे पीलिया में तेजी से सुधार होता है।