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Baghpat: स्कूल का लोगो लगाया और कॉपी-किताब के दाम दोगुने, मोलभाव का भी नहीं विकल्प, बिगड़ा अभिभावकों का बजट
मुकेश पंवार, बागपत
Published by: Mohd Mustakim
Updated Thu, 26 Mar 2026 01:25 PM IST
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सार
New session of schools: सीबीएसई और आईसीएससीई बोर्ड के स्कूलों का नया सत्र शुरू होने का समय आ गया है। अभिभावक महंगी कॉपी-किताबें खरीदने को मजबूर हैं। न कोई मोलभाव का विकल्प है और न ही बाहर से खरीद सकते हैं।
अभिभावक रीजू, रूबी राठी, सुजाता और शालिनी।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही जनपद में कापी-किताबों का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। निजी स्कूलों की सख्त शर्तों के चलते अभिभावक खुद को पूरी तरह बेबस महसूस कर रहे हैं। स्थिति यह है कि न तो उन्हें कहीं और से किताबें खरीदने की छूट मिल रही है और न ही कीमतों पर मोलभाव का कोई विकल्प बचा है।
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अभिभावकों रविन्द्र, नरेंद्र, रवि, पवन और सुनील का कहना है कि स्कूल प्रबंधन द्वारा तय दुकानों या स्कूल परिसर से ही किताबें और कॉपियां खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है। दुकानदार भी किताबें अलग-अलग देने के बजाय पूरा सेट ही थमा रहे हैं, जिससे एकमुश्त बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही है।
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छोटे बच्चों की पढ़ाई भी अब सस्ती नहीं रही
एलकेजी और यूकेजी की किताबों में करीब एक हजार रुपये तक की बढ़ोतरी कर दी गई है, जिससे इन कक्षाओं के लिए ही 1500 से 3000 रुपये तक खर्च आ रहा है। वहीं कक्षा छह से आठ तक के बच्चों के लिए यह खर्च 4000 से 5000 रुपये तक पहुंच गया है।
एलकेजी और यूकेजी की किताबों में करीब एक हजार रुपये तक की बढ़ोतरी कर दी गई है, जिससे इन कक्षाओं के लिए ही 1500 से 3000 रुपये तक खर्च आ रहा है। वहीं कक्षा छह से आठ तक के बच्चों के लिए यह खर्च 4000 से 5000 रुपये तक पहुंच गया है।
कॉपियों के दाम भी बढ़ा रहे अभिभावकों की परेशानी
बाजार में 50 से 60 रुपये में मिलने वाली साधारण कॉपी स्कूल के लोगो के साथ 90 से 110 रुपये तक बेची जा रही है। अभिभावकों का कहना है कि सिर्फ स्कूल के नाम का लोगो लगाकर कीमतें बढ़ा दी जाती हैं और उन्हें मजबूरी में खरीदना पड़ता है।
बाजार में 50 से 60 रुपये में मिलने वाली साधारण कॉपी स्कूल के लोगो के साथ 90 से 110 रुपये तक बेची जा रही है। अभिभावकों का कहना है कि सिर्फ स्कूल के नाम का लोगो लगाकर कीमतें बढ़ा दी जाती हैं और उन्हें मजबूरी में खरीदना पड़ता है।
हर साल किताबें बदलने से बढ़ी समस्या
सबसे बड़ी समस्या हर साल बदलने वाली किताबें हैं। निजी प्रकाशकों की नई किताबें लागू होने से पुराना सिलेबस बेकार हो जाता है, जिससे हर साल नया खर्च उठाना पड़ता है। शिक्षा के नाम पर बढ़ती इस मनमानी ने हर घर की जिम्मेदारी को और भारी बना दिया है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस ‘किताबी कैद’ से अभिभावकों को कब राहत दिलाता है।
सबसे बड़ी समस्या हर साल बदलने वाली किताबें हैं। निजी प्रकाशकों की नई किताबें लागू होने से पुराना सिलेबस बेकार हो जाता है, जिससे हर साल नया खर्च उठाना पड़ता है। शिक्षा के नाम पर बढ़ती इस मनमानी ने हर घर की जिम्मेदारी को और भारी बना दिया है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस ‘किताबी कैद’ से अभिभावकों को कब राहत दिलाता है।
अभिभावकों की प्रतिक्रिया
मेरे बच्चे ने कक्षा 3 में प्रवेश लिया है। स्कूल की शर्तें इतनी सख्त हैं कि हमें वही से किताबें लेनी पड़ती हैं। तीसरी कक्षा की किताब खरीदने के लिए 3800 रूपये का कोर्स खरीदना पड़ा। जबकि दूसरे बेटे वेदांत की यूकेजी कक्षा के लिए 2100 किताबें खरीदने के लिए देने पड़े।
- रीजू
हर साल नई किताबें लागू कर दी जाती हैं, जिससे पुरानी किताबें किसी काम की नहीं रहतीं। ऐसे में अभिभावकों पर किताबों के नाम पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है।
- रूबी राठी
हर साल निजी स्कूल संचालक और दुकानदार किताबों और कापियां के दाम बढ़ा देते हैं, कक्षा पांच का जो कोर्स पहले 3200 में आता था, वह बढ़ाकर 4500 तक कर दिया है। ऊपर से पुरानी किताबे किसी के काम भी नहीं आ सकती।
- सुजाता
बच्चों की पढ़ाई के नाम पर हमें हर बार भारी खर्च उठाना पड़ता है, कोई विकल्प नहीं दिया जाता। प्रशासन से मांग की है कि इस मनमानी पर लगाम लगाई जाए और स्कूलों को निर्देशित किया जाए कि वे एनसीईआरटी की किताबें लागू करें और अभिभावकों को बाजार से सस्ती किताबें खरीदने की स्वतंत्रता दें।
- शालिनी
मेरे बच्चे ने कक्षा 3 में प्रवेश लिया है। स्कूल की शर्तें इतनी सख्त हैं कि हमें वही से किताबें लेनी पड़ती हैं। तीसरी कक्षा की किताब खरीदने के लिए 3800 रूपये का कोर्स खरीदना पड़ा। जबकि दूसरे बेटे वेदांत की यूकेजी कक्षा के लिए 2100 किताबें खरीदने के लिए देने पड़े।
- रीजू
हर साल नई किताबें लागू कर दी जाती हैं, जिससे पुरानी किताबें किसी काम की नहीं रहतीं। ऐसे में अभिभावकों पर किताबों के नाम पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है।
- रूबी राठी
हर साल निजी स्कूल संचालक और दुकानदार किताबों और कापियां के दाम बढ़ा देते हैं, कक्षा पांच का जो कोर्स पहले 3200 में आता था, वह बढ़ाकर 4500 तक कर दिया है। ऊपर से पुरानी किताबे किसी के काम भी नहीं आ सकती।
- सुजाता
बच्चों की पढ़ाई के नाम पर हमें हर बार भारी खर्च उठाना पड़ता है, कोई विकल्प नहीं दिया जाता। प्रशासन से मांग की है कि इस मनमानी पर लगाम लगाई जाए और स्कूलों को निर्देशित किया जाए कि वे एनसीईआरटी की किताबें लागू करें और अभिभावकों को बाजार से सस्ती किताबें खरीदने की स्वतंत्रता दें।
- शालिनी
ये बोले अधिकारी
स्कूलों में किताब बेचना और किसी निजी दुकान से किताब और कापी खरीदने का दवाब बनाना कानूनी अपराध है। यदि ऐसा है तो अभिभावक लिखित या फिर सूचना देकर शिकायत करें, संबंधित स्कूल संचालक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। किताबें व कॉपियां के नाम पर अभिभावकों से अवैध वसूली बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
- राघवेंद्र सिंह डीआईओएस बागपत
स्कूलों में किताब बेचना और किसी निजी दुकान से किताब और कापी खरीदने का दवाब बनाना कानूनी अपराध है। यदि ऐसा है तो अभिभावक लिखित या फिर सूचना देकर शिकायत करें, संबंधित स्कूल संचालक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। किताबें व कॉपियां के नाम पर अभिभावकों से अवैध वसूली बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
- राघवेंद्र सिंह डीआईओएस बागपत