Nepal: नेपाल में ‘मैं हिंदू हूं’ से तेज हुई हिंदू राष्ट्र की बहस, पूर्व पीएम के बयान ने मामले को दी नई धार
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग पर पूर्व प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा के बयान का हिंदू संगठनों ने स्वागत किया है। उनका कहना है कि अब बहस केवल हिंदू राष्ट्र की मांग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि नेपाल की सनातन सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक रूप देने के मॉडल पर भी होनी चाहिए।
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नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग को पूर्व प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा के ‘मैं हिंदू हूं’ वाले बयान और सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने वाले प्रस्ताव ने नई राजनीतिक धार दे दी है। देउबा गुट के राष्ट्रीय सम्मेलन के इस रुख पर विश्व हिंदू परिषद नेपाल, नेपाल शिवसेना और सनातन संगठनों ने इसे वर्षों से चली आ रही मांग के मुख्यधारा की राजनीति में पहुंचने का महत्वपूर्ण संकेत बताया है। संगठनों का कहना है कि अब बहस केवल हिंदू राष्ट्र की मांग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि नेपाल की सनातन सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक रूप देने के मॉडल पर भी होनी चाहिए।
विश्व हिंदू परिषद नेपाल मातृशक्ति विभाग की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा देवी पांडे ने कहा कि देउबा का सार्वजनिक रूप से स्वयं को हिंदू बताना और सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने का प्रस्ताव नेपाल के बदलते राजनीतिक विमर्श का संकेत है। उन्होंने कहा कि नेपाल की हजारों वर्ष पुरानी धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को संवैधानिक बहस में स्थान मिलना चाहिए। उनके मुताबिक हिंदू राष्ट्र की अवधारणा किसी अन्य धर्म की स्वतंत्रता समाप्त करने की नहीं, बल्कि सनातन पहचान के साथ सभी धर्मों की समान स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की होनी चाहिए।
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नेपाल शिवसेना के केंद्रीय अध्यक्ष किशोर लामा ने कहा कि देउबा का बयान इस मुद्दे को नया राजनीतिक आधार देता है। अब इसे धार्मिक संगठनों के कार्यक्रमों से आगे बढ़ाकर राजनीतिक दलों और संसद में बहस का विषय बनाया जाना चाहिए। शिवसेना के बांके जिला सदस्य नरेश छेत्री ने कहा कि सनातन पहचान को मान्यता देना किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि नेपाल की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण का सवाल है।
वीएचपी ने उठाया संविधान का सवाल
वीएचपी नेपाल के कर्णाली प्रदेश अध्यक्ष कृष्ण मुरारी भट्ट ने कहा कि धार्मिक पहचान पर फैसला व्यापक राजनीतिक सहमति और संवैधानिक प्रक्रिया से होना चाहिए। वीएचपी सदस्य रामेश्वर यादव के अनुसार देउबा गुट के प्रस्ताव की सबसे अहम बात यह है कि ‘सनातन’ अब राजनीतिक प्रस्ताव का हिस्सा बना है। अगली बहस यही है कि इसे केवल सांस्कृतिक पहचान माना जाए या संविधान में भी स्थान मिले।
अब बहस ‘हिंदू राष्ट्र’ से आगे ‘मॉडल’ पर
संगठनों के बीच अब सवाल यह है कि यदि नेपाल की सनातन पहचान को संवैधानिक मान्यता मिलती है तो उसका मॉडल क्या होगा। क्या सनातन धर्म को राष्ट्रीय-सांस्कृतिक पहचान देते हुए सभी धर्मों की समान स्वतंत्रता बरकरार रहेगी? क्या संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ व्यवस्था को बदला जाएगा? या इसके लिए व्यापक राजनीतिक सहमति और संविधान संशोधन का रास्ता अपनाया जाएगा? अभी सरकार की ओर से कोई अंतिम निर्णय नहीं है, लेकिन देउबा का बयान और उनके गुट का प्रस्ताव बहस को सड़क से राजनीतिक और संवैधानिक मंच तक जरूर ले आया है।