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Banda News: अव्यवस्थाओं का खूंटा उखाड़कर भाग रहे गोवंश
Sun, 28 Jun 2026 10:56 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Sun, 28 Jun 2026 10:56 PM IST
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अतर्रा कान्हा गोशाला में बीमार पड़ा गोवंश। संवाद
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बांदा। सरकार निराश्रित गोवंशों के संरक्षण के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। भूसा, हरा चारा, पशु चिकित्सा, शेड अलग-अलग मदों में बजट जारी होता है, लेकिन जमीनी तस्वीर इन दावों से बिल्कुल उलट है। कहीं अस्थाई गोशालाएं महीनों से बंद हैं, कहीं पंजीकृत गोवंशों का अता-पता नहीं है, तो कहीं बीमार पशु बिना इलाज तड़प रहे हैं। कुछ स्थानों पर गोवंश अव्यवस्थाओं का खूंटा उखाड़कर मध्य प्रदेश की सीमा की ओर भाग रहे हैं। वहीं कुछ गोशालाएं ऐसी भी मिलीं जहां व्यवस्थाएं अपेक्षाकृत बेहतर हैं, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए सड़क ही नहीं है। पांच अलग-अलग स्थानों की पड़ताल में व्यवस्था की परतें खुलकर सामने आईं।
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गोशाला बंद, तो गोवंशों ने पकड़ लिया मध्य प्रदेश का रास्ता
नरैनी विकासखंड के करतल क्षेत्र में मध्य प्रदेश की ओर बड़ी संख्या में गोवंश का पलायन देखने को मिला। ग्रामीणों का कहना है कि ग्राम पंचायत नहरी की अस्थाई गोशाला बंद होने के बाद गोवंश खुले में छोड़ दिए गए। इसके बाद वे करतल-पन्ना मार्ग से मध्य प्रदेश की सीमा की ओर निकल रहे हैं। राहुल, नीरज, धर्मेंद्र, बलदेव और शिवम सहित ग्रामीणों का कहना है कि कई गोवंश पन्ना तक पहुंच जाते हैं, जबकि अनेक रास्ते में गांव-गांव भटकते रहते हैं। भूख और प्यास मिटाने के लिए वे खेतों और बस्तियों में पहुंचते हैं। गोशाला प्रभारी डॉ. अभिषेक सिंह ने बताया कि नहरी अस्थाई गोशाला फिलहाल बंद है, जिसे जुलाई से दोबारा शुरू किया जाएगा। उन्होंने बताया कि अब गोशालाओं के संचालन की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों की बजाय एनजीओ को दी जाएगी।
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रिकॉर्ड में 743 गोवंश, लेकिन गोशालाएं मिलीं खाली
बदौसा क्षेत्र की तीन अस्थाई गोशालाओं की पड़ताल में चौंकाने वाली स्थिति सामने आई। बरछा में 248, दुबरिया में 275 और हरहा माफी में 220 गोवंश पंजीकृत बताए गए हैं, लेकिन मौके पर एक भी गोवंश नहीं मिला।ग्राम विकास अधिकारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। ग्राम प्रधान लक्ष्मी देवी ने कहा कि ये अस्थाई गोशालाएं हैं। अगस्त से इनका संचालन शुरू होगा। अब सवाल यह है कि जब रिकॉर्ड में सैकड़ों गोवंश दर्ज हैं तो वर्तमान में वे कहां गए।
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भूसा है, पानी है... लेकिन इलाज नहीं
मटौंध कस्बे की कान्हा गोशाला में लगभग 500 गोवंश संरक्षित हैं। यहां रहने, पानी और चारे की व्यवस्था संतोषजनक दिखाई दी, लेकिन सबसे बड़ी कमी पशु चिकित्सा व्यवस्था में मिली। गोशाला में कोई स्थाई पशु मित्र तैनात नहीं है। बीमार पशुओं के इलाज के लिए मैकई पशु चिकित्सालय पर निर्भर रहना पड़ता है। चिकित्सालय का स्टाफ पहले से अन्य कार्यों में व्यस्त रहता है, जिससे गोशाला तक समय पर नहीं पहुंच पाता। स्थानीय लोगों का कहना है कि समय पर इलाज न मिलने से कई पशु बीमारी के कारण दम तोड़ देते हैं। यहां कई गोवंश बीमारी से कराहते दिखाई दिए।
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सूखे भूसे पर जिंदा गोवंश
अतर्रा की कान्हा गोशाला में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर दिखाई दिया। यहां गोवंशों को हरे चारे के बजाय केवल सूखा भूसा दिया जा रहा था। कई गायें उसी भूसे के लिए आपस में लड़ती दिखीं। भीषण गर्मी में सीमित पंखों के सहारे सैकड़ों पशु गर्मी झेलते मिले। कई बीमार गोवंश उपचार की प्रतीक्षा में थे, लेकिन मौके पर कोई पशु चिकित्सक मौजूद नहीं था। स्थानीय निवासी राघव मिश्रा और हर्ष द्विवेदी ने आरोप लगाया कि हरे चारे की व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित है। गोशाला प्रभारी रामरतन ने स्वीकार किया कि अप्रैल से हरा चारा उपलब्ध नहीं होने के कारण नहीं दिया जा रहा है।
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व्यवस्थाएं बेहतर, लेकिन सड़क नहीं
पैलानी तहसील के खप्टिहा कलां स्थित गजहा डेरा की वृहद गोशाला इस पड़ताल में सबसे व्यवस्थित मिली। करीब 1.60 करोड़ रुपये की लागत से बनी इस गोशाला में 105 गोवंश संरक्षित हैं। भूसा, पानी, पशु आहार, सबमर्सिबल से पेयजल और कर्मचारियों की व्यवस्था मौजूद है लेकिन सबसे बड़ी समस्या यहां पहुंचने की है। केन नदी के कटान से करीब तीन किलोमीटर का रास्ता खराब हो चुका है। बरसात के दिनों में गोशाला तक वाहन पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है। ग्राम प्रधान मैना देवी ने बताया कि सड़क निर्माण न होने से गोवंशों की देखभाल और सामग्री पहुंचाने में भारी परेशानी होती है।
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गर्मी अधिक पड़ने के कारण गोवंशों को अस्थाई गोशालाओं से छोड़ना पड़ा, ताकि ये बीमार न हो जाएं। जुलाई के अंत तक सभी गोशालाओं में पर्याप्त इंतजाम कर गोवंशों को संरक्षित कराया जाएगा। जहां भी कमी है, उसे ठीक कराया जाएगा।
- डॉ. निर्मल कुमार गुप्ता, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी
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गोशाला बंद, तो गोवंशों ने पकड़ लिया मध्य प्रदेश का रास्ता
नरैनी विकासखंड के करतल क्षेत्र में मध्य प्रदेश की ओर बड़ी संख्या में गोवंश का पलायन देखने को मिला। ग्रामीणों का कहना है कि ग्राम पंचायत नहरी की अस्थाई गोशाला बंद होने के बाद गोवंश खुले में छोड़ दिए गए। इसके बाद वे करतल-पन्ना मार्ग से मध्य प्रदेश की सीमा की ओर निकल रहे हैं। राहुल, नीरज, धर्मेंद्र, बलदेव और शिवम सहित ग्रामीणों का कहना है कि कई गोवंश पन्ना तक पहुंच जाते हैं, जबकि अनेक रास्ते में गांव-गांव भटकते रहते हैं। भूख और प्यास मिटाने के लिए वे खेतों और बस्तियों में पहुंचते हैं। गोशाला प्रभारी डॉ. अभिषेक सिंह ने बताया कि नहरी अस्थाई गोशाला फिलहाल बंद है, जिसे जुलाई से दोबारा शुरू किया जाएगा। उन्होंने बताया कि अब गोशालाओं के संचालन की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों की बजाय एनजीओ को दी जाएगी।
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रिकॉर्ड में 743 गोवंश, लेकिन गोशालाएं मिलीं खाली
बदौसा क्षेत्र की तीन अस्थाई गोशालाओं की पड़ताल में चौंकाने वाली स्थिति सामने आई। बरछा में 248, दुबरिया में 275 और हरहा माफी में 220 गोवंश पंजीकृत बताए गए हैं, लेकिन मौके पर एक भी गोवंश नहीं मिला।ग्राम विकास अधिकारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। ग्राम प्रधान लक्ष्मी देवी ने कहा कि ये अस्थाई गोशालाएं हैं। अगस्त से इनका संचालन शुरू होगा। अब सवाल यह है कि जब रिकॉर्ड में सैकड़ों गोवंश दर्ज हैं तो वर्तमान में वे कहां गए।
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भूसा है, पानी है... लेकिन इलाज नहीं
मटौंध कस्बे की कान्हा गोशाला में लगभग 500 गोवंश संरक्षित हैं। यहां रहने, पानी और चारे की व्यवस्था संतोषजनक दिखाई दी, लेकिन सबसे बड़ी कमी पशु चिकित्सा व्यवस्था में मिली। गोशाला में कोई स्थाई पशु मित्र तैनात नहीं है। बीमार पशुओं के इलाज के लिए मैकई पशु चिकित्सालय पर निर्भर रहना पड़ता है। चिकित्सालय का स्टाफ पहले से अन्य कार्यों में व्यस्त रहता है, जिससे गोशाला तक समय पर नहीं पहुंच पाता। स्थानीय लोगों का कहना है कि समय पर इलाज न मिलने से कई पशु बीमारी के कारण दम तोड़ देते हैं। यहां कई गोवंश बीमारी से कराहते दिखाई दिए।
सूखे भूसे पर जिंदा गोवंश
अतर्रा की कान्हा गोशाला में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर दिखाई दिया। यहां गोवंशों को हरे चारे के बजाय केवल सूखा भूसा दिया जा रहा था। कई गायें उसी भूसे के लिए आपस में लड़ती दिखीं। भीषण गर्मी में सीमित पंखों के सहारे सैकड़ों पशु गर्मी झेलते मिले। कई बीमार गोवंश उपचार की प्रतीक्षा में थे, लेकिन मौके पर कोई पशु चिकित्सक मौजूद नहीं था। स्थानीय निवासी राघव मिश्रा और हर्ष द्विवेदी ने आरोप लगाया कि हरे चारे की व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित है। गोशाला प्रभारी रामरतन ने स्वीकार किया कि अप्रैल से हरा चारा उपलब्ध नहीं होने के कारण नहीं दिया जा रहा है।
व्यवस्थाएं बेहतर, लेकिन सड़क नहीं
पैलानी तहसील के खप्टिहा कलां स्थित गजहा डेरा की वृहद गोशाला इस पड़ताल में सबसे व्यवस्थित मिली। करीब 1.60 करोड़ रुपये की लागत से बनी इस गोशाला में 105 गोवंश संरक्षित हैं। भूसा, पानी, पशु आहार, सबमर्सिबल से पेयजल और कर्मचारियों की व्यवस्था मौजूद है लेकिन सबसे बड़ी समस्या यहां पहुंचने की है। केन नदी के कटान से करीब तीन किलोमीटर का रास्ता खराब हो चुका है। बरसात के दिनों में गोशाला तक वाहन पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है। ग्राम प्रधान मैना देवी ने बताया कि सड़क निर्माण न होने से गोवंशों की देखभाल और सामग्री पहुंचाने में भारी परेशानी होती है।
गर्मी अधिक पड़ने के कारण गोवंशों को अस्थाई गोशालाओं से छोड़ना पड़ा, ताकि ये बीमार न हो जाएं। जुलाई के अंत तक सभी गोशालाओं में पर्याप्त इंतजाम कर गोवंशों को संरक्षित कराया जाएगा। जहां भी कमी है, उसे ठीक कराया जाएगा।
- डॉ. निर्मल कुमार गुप्ता, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी

अतर्रा कान्हा गोशाला में बीमार पड़ा गोवंश। संवाद

अतर्रा कान्हा गोशाला में बीमार पड़ा गोवंश। संवाद

अतर्रा कान्हा गोशाला में बीमार पड़ा गोवंश। संवाद