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हर घर नल योजना : अफसरों के दावे और नल दोनों हवाहवाई
Sat, 23 May 2026 11:53 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Sat, 23 May 2026 11:53 PM IST
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फोटो - 03 सूखा पड़ा नल दिखाता स्थानीय युवक।
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बांदा। अपना जिला देशभर में तापमान और गर्मी के टाॅप पर है। लेकिन शहर में पानी की सप्लाई देने के मामले में फिसड्डी। केंद्र और प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे योजना और जल जीवन मिशन के तहत चलाए जा रहे हर घर नल, हर घर जल अभियान की जमीनी हकीकत से पूरी योजना सवालों के घेरे में है। करोड़ों रुपये खर्च कर घरों तक पाइपलाइन और कनेक्शन पहुंचा दिए गए। लेकिन नियमित जलापूर्ति अब भी एक सपना बनी हुई है। शहर के कई मोहल्लों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं, जबकि सरकारी नल महीने में केवल तीन से चार दिन ही पानी दे रहे हैं, बाकी दिनों में उनसे सिर्फ हवा निकल रही है।
जिले में नमामि गंगे और जल जीवन मिशन के तहत पेयजल योजनाओं पर अरबों रुपये खर्च किए गए हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार जिले के हजारों घरों तक नल कनेक्शन पहुंचाने का दावा किया गया है। इसके तहत 647 गांवों में से 525 से अधिक गांवों को हर घर जल का प्रमाणपत्र भी दे दिया गया। मुख्यमंत्री ने स्वयं विंध्य-बुंदेलखंड क्षेत्र में अगस्त 2023 तक हर घर नल से जल पहुंचाने के लक्ष्य की समीक्षा की थी और बांदा सहित कई जिलों को प्राथमिकता दी थी। इन योजनाओं के तहत अमलीकौर और खटान परियोजनाओं पर भी काम चल रहा है, जिससे लाखों घरों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
प्रेशर कम और अनियमित मोटर संचालन बना कारण
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पानी पर्याप्त प्रेशर से नहीं आता और मोटर भी समय से नहीं चलाई जातीं। जिससे जलापूर्ति बाधित रहती है। कई बार शिकायतें करने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। जल जीवन मिशन के तहत खटान और अमलीकौर परियोजनाओं का 80 प्रतिशत काम पूरा होने के बावजूद पानी का प्रेशर कम होने की शिकायतें लगातार मिल रही हैं।
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जनता की आवाज
जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग है। शहर के गुलाब नगर मोहल्ले के निवासी भीषण गर्मी में पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे निजी बोरिंग और हैंडपंप भी जवाब दे रहे हैं। ऐसे में सरकारी योजना से राहत की उम्मीद थी, लेकिन यह योजना भी कागजों तक सीमित नजर आ रही है।
गुलाब नगर निवासी दीपू साहू ने बताया कि सरकार ने घर के बाहर नल तो लगवा दिया है, लेकिन पानी महीने में सिर्फ तीन-चार बार ही आता है। बाकी दिनों में पानी के लिए उन्हें इधर-उधर भटकना पड़ता है। उन्होंने कहा कि गर्मी में बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है।
स्थानीय निवासी अंकित ने बताया कि योजना शुरू होने पर लोगों को उम्मीद थी कि पानी की समस्या खत्म हो जाएगी, लेकिन हालात पहले से भी बदतर हो गए हैं। कई बार सप्लाई आती भी है तो केवल 15 से 20 मिनट बाद बंद हो जाती है।
इसी मोहल्ले के इंद्रजीत ने कहा कि लोगों ने अपने खर्चे पर मोटर और पाइपलाइन कनेक्शन कराए हैं, लेकिन उसके बावजूद पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा। कई परिवारों को मजबूरी में टैंकर से पानी खरीदना पड़ रहा है।
..........................
मामला संज्ञान में नहीं है, मैं पता करता हूं। यदि ऐसा है तो तत्काल सप्लाई व्यवस्थित रूप से चालू कराई जाएगी।
मदन मोहन वर्मा, एडीएम नमामि गंगे
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कुएं- कभी जिनसे थी पहचान, उन्हीं के अस्तित्व पर संकट
बांदा। अतर्रा तहसील में कभी जीवन का आधार रहे कुएं अब देखरेख के अभाव में अपनी पहचान खो रहे हैं। बदलते परिवेश और उदासीनता के कारण ये जल स्रोत बदहाल हैं।
सन 1960 के दशक में तहसील के 108 गांवों में लगभग पांच हजार कुएं थे, जिनकी संख्या अब घटकर 1512 रह गई है। इनमें से 341 कुएं निष्प्रयोज्य हो चुके हैं, जबकि 1171 में अभी भी पानी है। चंदेलकालीन राजाओं और जमींदारों द्वारा निर्मित ये कुएं कभी पेयजल और खेती के लिए उपयोग होते थे। उदाहरण के लिए, गोरेमऊ का चंदेलकालीन कुआं, पुनाहूर का ''बीच गांव का कुआं'', अतर्रा का मीठा कुआं और पारा का खरौआ कुआं सभी अब कूड़े से पटे या सूखे पड़े हैं। ग्रामीणों के अनुसार, पहले कुओं से हजारों लीटर पानी निकालने पर भी जलस्तर कम नहीं होता था, लेकिन अब उनमें पीने लायक पानी भी नहीं बचा है। उपजिलाधिकारी राहुल द्विवेदी ने राजस्व निरीक्षक से सभी कुओं की सूची मंगवाई है और बदहाल कुओं को ठीक कराकर पेयजल आपूर्ति लायक बनाने का आश्वासन दिया है।
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अभिलेखों में कुओं की स्थिति पर नजर
तहसील में दर्ज कुल कुएं-1512
वर्तमान में पानी युक्त हालत में-1171
अति प्राचीन कुएं -250
निष्प्रयोज्य कुएं- 341
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प्रतिक्रिया-
1-बैलों द्वारा खींचकर पुरवाई के माध्यम से हजारो लीटर पानी प्रतिदिन निकाल जाता था। तब भी उनके जलस्तर में कभी कमी नही आती थी। आज ऐसे कुए गंदगी से पटे नजर आ रहे है।-चंद्रप्रकाश रैकवार, पुनाहुर
2-मंदिर के साथ कुआं होना ग्रामीणों की धार्मिक रीति में शामिल था। लोग कुआं निर्माण के साथ उसमें बाल्टी डोर तक रखते थे, कि आने वाला राहगीर अपनी प्यास बुझा सके। आज बाल्टी डोर तो दूर की बात कुओ में पीने लायक पानी ही नही बचा है।
-रामस्वरूप,गोरेमऊ
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जिले में नमामि गंगे और जल जीवन मिशन के तहत पेयजल योजनाओं पर अरबों रुपये खर्च किए गए हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार जिले के हजारों घरों तक नल कनेक्शन पहुंचाने का दावा किया गया है। इसके तहत 647 गांवों में से 525 से अधिक गांवों को हर घर जल का प्रमाणपत्र भी दे दिया गया। मुख्यमंत्री ने स्वयं विंध्य-बुंदेलखंड क्षेत्र में अगस्त 2023 तक हर घर नल से जल पहुंचाने के लक्ष्य की समीक्षा की थी और बांदा सहित कई जिलों को प्राथमिकता दी थी। इन योजनाओं के तहत अमलीकौर और खटान परियोजनाओं पर भी काम चल रहा है, जिससे लाखों घरों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
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प्रेशर कम और अनियमित मोटर संचालन बना कारण
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पानी पर्याप्त प्रेशर से नहीं आता और मोटर भी समय से नहीं चलाई जातीं। जिससे जलापूर्ति बाधित रहती है। कई बार शिकायतें करने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। जल जीवन मिशन के तहत खटान और अमलीकौर परियोजनाओं का 80 प्रतिशत काम पूरा होने के बावजूद पानी का प्रेशर कम होने की शिकायतें लगातार मिल रही हैं।
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जनता की आवाज
जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग है। शहर के गुलाब नगर मोहल्ले के निवासी भीषण गर्मी में पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे निजी बोरिंग और हैंडपंप भी जवाब दे रहे हैं। ऐसे में सरकारी योजना से राहत की उम्मीद थी, लेकिन यह योजना भी कागजों तक सीमित नजर आ रही है।
गुलाब नगर निवासी दीपू साहू ने बताया कि सरकार ने घर के बाहर नल तो लगवा दिया है, लेकिन पानी महीने में सिर्फ तीन-चार बार ही आता है। बाकी दिनों में पानी के लिए उन्हें इधर-उधर भटकना पड़ता है। उन्होंने कहा कि गर्मी में बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है।
स्थानीय निवासी अंकित ने बताया कि योजना शुरू होने पर लोगों को उम्मीद थी कि पानी की समस्या खत्म हो जाएगी, लेकिन हालात पहले से भी बदतर हो गए हैं। कई बार सप्लाई आती भी है तो केवल 15 से 20 मिनट बाद बंद हो जाती है।
इसी मोहल्ले के इंद्रजीत ने कहा कि लोगों ने अपने खर्चे पर मोटर और पाइपलाइन कनेक्शन कराए हैं, लेकिन उसके बावजूद पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा। कई परिवारों को मजबूरी में टैंकर से पानी खरीदना पड़ रहा है।
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मामला संज्ञान में नहीं है, मैं पता करता हूं। यदि ऐसा है तो तत्काल सप्लाई व्यवस्थित रूप से चालू कराई जाएगी।
मदन मोहन वर्मा, एडीएम नमामि गंगे
कुएं- कभी जिनसे थी पहचान, उन्हीं के अस्तित्व पर संकट
बांदा। अतर्रा तहसील में कभी जीवन का आधार रहे कुएं अब देखरेख के अभाव में अपनी पहचान खो रहे हैं। बदलते परिवेश और उदासीनता के कारण ये जल स्रोत बदहाल हैं।
सन 1960 के दशक में तहसील के 108 गांवों में लगभग पांच हजार कुएं थे, जिनकी संख्या अब घटकर 1512 रह गई है। इनमें से 341 कुएं निष्प्रयोज्य हो चुके हैं, जबकि 1171 में अभी भी पानी है। चंदेलकालीन राजाओं और जमींदारों द्वारा निर्मित ये कुएं कभी पेयजल और खेती के लिए उपयोग होते थे। उदाहरण के लिए, गोरेमऊ का चंदेलकालीन कुआं, पुनाहूर का ''बीच गांव का कुआं'', अतर्रा का मीठा कुआं और पारा का खरौआ कुआं सभी अब कूड़े से पटे या सूखे पड़े हैं। ग्रामीणों के अनुसार, पहले कुओं से हजारों लीटर पानी निकालने पर भी जलस्तर कम नहीं होता था, लेकिन अब उनमें पीने लायक पानी भी नहीं बचा है। उपजिलाधिकारी राहुल द्विवेदी ने राजस्व निरीक्षक से सभी कुओं की सूची मंगवाई है और बदहाल कुओं को ठीक कराकर पेयजल आपूर्ति लायक बनाने का आश्वासन दिया है।
अभिलेखों में कुओं की स्थिति पर नजर
तहसील में दर्ज कुल कुएं-1512
वर्तमान में पानी युक्त हालत में-1171
अति प्राचीन कुएं -250
निष्प्रयोज्य कुएं- 341
प्रतिक्रिया-
1-बैलों द्वारा खींचकर पुरवाई के माध्यम से हजारो लीटर पानी प्रतिदिन निकाल जाता था। तब भी उनके जलस्तर में कभी कमी नही आती थी। आज ऐसे कुए गंदगी से पटे नजर आ रहे है।-चंद्रप्रकाश रैकवार, पुनाहुर
2-मंदिर के साथ कुआं होना ग्रामीणों की धार्मिक रीति में शामिल था। लोग कुआं निर्माण के साथ उसमें बाल्टी डोर तक रखते थे, कि आने वाला राहगीर अपनी प्यास बुझा सके। आज बाल्टी डोर तो दूर की बात कुओ में पीने लायक पानी ही नही बचा है।
-रामस्वरूप,गोरेमऊ

फोटो - 03 सूखा पड़ा नल दिखाता स्थानीय युवक।

फोटो - 03 सूखा पड़ा नल दिखाता स्थानीय युवक।

फोटो - 03 सूखा पड़ा नल दिखाता स्थानीय युवक।