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Banda News: मान्यता आठवीं की, कक्षाएं 10वीं तक...आवासीय संचालन की भी अनुमति नहीं
Mon, 17 Aug 2026 11:39 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Mon, 17 Aug 2026 11:39 PM IST
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फोटो-28-बीएल विद्यालय मंदिर आवासीय विद्यालय का भवन। ब्यूरो
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बांदा। शहर के झील का पुरवा स्थित बीएल विद्या मंदिर आवासीय विद्यालय में दो छात्रों की संदिग्ध हालात में मौत के बाद विद्यालय की मान्यता और सरकारी निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
विद्यालय को बेसिक शिक्षा विभाग से केवल कक्षा आठ तक की मान्यता मिली है, जबकि आवासीय विद्यालय संचालित करने की कोई अनुमति नहीं है। इसके बावजूद यहां कक्षा 10 तक की कक्षाएं संचालित की जा रही थीं। छात्रावास में भी कक्षा 10 का एक छात्र रह रहा था।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विद्यालय की मान्यता कक्षा आठ तक है तो कक्षा नौ और 10 की पढ़ाई किस आधार पर कराई जा रही थी। वहीं माध्यमिक शिक्षा परिषद से भी विद्यालय को कोई मान्यता नहीं मिली है। इसके बाद भी विद्यालय में माध्यमिक कक्षाओं का संचालन जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
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दो बच्चों की मौत के बाद अब अधिकारी मान्यता से अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। एक विभाग आवासीय मान्यता से इन्कार कर रहा है तो दूसरा विद्यालय को मान्यता देने से ही इन्कार कर रहा है। ऐसे में सवाल है कि वर्षों से बच्चों की पढ़ाई और आवासीय व्यवस्था किसकी निगरानी में चल रही थी।
बेसिक शिक्षा अधिकारी अव्यक्तराम तिवारी का कहना है कि बेसिक शिक्षा विभाग से आवासीय विद्यालय की मान्यता नहीं दी जाती है। उनके विभाग ने विद्यालय को केवल कक्षा आठ तक की मान्यता दी थी, जो वर्ष 2007 में मिली थी। वहीं जिला विद्यालय निरीक्षक दिनेश कुमार ने उनके विभाग से विद्यालय को किसी भी तरह की मान्यता दिए जाने से इन्कार किया है।
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नहीं हुआ निरीक्षण, अब खुल रहीं परतें
विद्यालय में लंबे समय से बच्चे पढ़ रहे और रह रहे थे, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी इसकी वास्तविक स्थिति जानने की कोशिश नहीं की। न छात्रावास की व्यवस्था जांची गई और न ही यह देखा गया कि विद्यालय में किन कक्षाओं का संचालन हो रहा है। यदि समय रहते विद्यालय का निरीक्षण किया गया होता तो कक्षा आठ से आगे की पढ़ाई और बिना अनुमति आवासीय व्यवस्था का मामला सामने आ सकता था।
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अन्य बच्चों के परिजनों को भी नहीं दी सूचना
दो बच्चों की हालत बिगड़ने और मौत होने के बाद भी विद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। रविवार रात घटना के बाद सोमवार दोपहर तक विद्यालय में रह रहे अन्य बच्चों के परिजनों को घटना की जानकारी नहीं दी गई। आरोप है कि बच्चों की स्वास्थ्य जांच तक नहीं कराई गई। दो छात्रों की हालत बिगड़ने के बाद भी बाकी बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर तत्काल कदम नहीं उठाया गया।
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रात में घर सूचना देने को कहते रहे बच्चे, नहीं कराई बात
नितिन के साथ उसका छोटा भाई हर्ष कक्षा एक में इसी विद्यालय का छात्र है। वहीं अरुण का बड़ा भाई उत्कर्ष कक्षा पांच में पढ़ता है। दोनों के भाइयों ने परिजन को बताया कि उन्होंने रात में ही घर पर उनकी तबीयत खराब होने की सूचना देने को कहा था लेकिन स्कूल के बड़े सर ने बात नहीं कराई। सोमवार सुबह जिला अस्पताल से परिजन को बच्चों के बीमार होने की सूचना दी गई। परिजन अस्पताल पहुंचे तो दोनों बच्चों की मौत हो चुकी थी। परिजन ने स्कूल प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया है।
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सोचा था पढ़कर करेंगे उजाला, बेटों को निगल गई अंधेरी रात
बांदा। साधारण किसान परिवार के नितिन और अरुण। जिनके परिवार ने अपनी खुशियों को दांव पर लगाकर बेटों के उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा था।
दो-दो बेटों को आवासीय विद्यालय में भेजकर 80 हजार रुपये सालाना फीस दे रहे थे। उन्हें क्या पता था कि उनके बेटों को रविवार रात का अंधेरा निगल जाएगा। घरवालों को केवल इस बात की तकलीफ सबसे अधिक है कि विद्यालय की ओर से बच्चों के बीमार होने की खबर रात में क्यों नहीं दी गई।
थाना गिरवां के गांव सरस्वाह निवासी सुनील प्रजापति किसान हैं। घर में पत्नी अनीता देवी व तीन बेटे अनीस, नितिन और हर्ष व एक बेटी लक्ष्मी हैं। सुनील के पास सात-आठ बीघा खेत हैं। इसी के बूते वह बेटों के भविष्य को संवारने की कोशिश कर रहे थे।
उन्होंने अपने बेटे नितिन और हर्ष का प्रवेश आवासीय विद्यालय में कराया था। एक बेटे की फीस 40 हजार सालाना थी। इस तरह सुनील 80 हजार रुपये सालाना देने के लिए अपनी हर खुशी को दांव पर लगाकर बैठे थे।
इसी तरह से थाना चिल्ला के गांव महेंदु निवासी पुष्कर उर्फ जयकिशोर कुशवाहा ने भी दो बेटों अरुण और उत्कर्ष को आवासीय विद्यालय में प्रवेश दिलाया था। पुष्कर भी सामान्य किसान हैं और पिता विजयपाल कुशवाहा पूर्व सैनिक है। पुष्कर ने बताया कि दोनों बेटों की शिक्षा का खर्च उनके दादा विजयपाल उठा रहे थे। पुष्कर ने बताया कि घर में पत्नी प्रीती व बेटी दीपिका है।
बेटों की मौत की खबर सोमवार की सुबह जब उन्हें मिली तो उनके सामने अंधेरा छा गया। समझ नहीं आया कि आखिर कुछ घंटे में ऐसा क्या हुआ कि उनके बच्चे अब उन्हें दोबारा देखने को नहीं मिलेंगे। बेसुध हुआ परिवार सब कामकाज छोड़कर मेडिकल कॉलेज पहुंचा।
परिजनों ने कहा कि स्कूल प्रबंधक ने उन्हें अगर रात में ही खबर दी होती तो शायद वह बेहतर इलाज का प्रयास करके अपने कलेजे के टुकड़ों को बचाने का भरसक प्रयास करते लेकिन विद्यालय की ओर से की गई लापरवाही ने उनके घरों के चिराग को बुझा दिया। जिनका दुख अंतिम सांस तक उन्हें रहेगा।
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पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट नहीं, विसरा सुरक्षित
बांदा। मेडिकल कॉलेज बांदा में सोमवार को नितिन और अरुण का पोस्टमार्टम हुआ। देर शाम उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिली। बताया गया कि दोनों छात्रों की मौत का कारण स्पष्ट नहीं हुआ है। मौत का कारण जानने के लिए उनके विसरा को सुरक्षित कर प्रयोगशाला भेजा जाएगा। जिससे विस्तृत जांच कर मौत का कारण पता किया जा सके। प्रभारी निरीक्षक कोतवाली नगर बलराम सिंह ने बताया कि प्रकरण में अभी तक परिवार की तरफ से शिकायत नहीं की गई। अगर शिकायत मिलती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। (संवाद)
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एफएसडीए की टीम ने भरे छह नमूने
बांदा। विद्यालय में दो बच्चों की मौत के बाद खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की टीम भी पहुंची। मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी नंदलाल गुप्ता ने रसोई की जांच की। यहां लाइसेंस नहीं लिया गया था।
इसके साथ ही अन्य नियमों की भी अनदेखी दिखी। टीम ने यहां से छह नमूने लेकर जांच के लिए भेजे। इसमें मूंग की दाल, आटा और रिफाइंड के अलावा पका चावल, रोटी और कद्दू की सब्जी का नमूना लिया गया। दरअसल रात को छात्राओं ने मूंग की दाल और रोटी ही खाई थी। ऐसे में इसकी जांच भी जरूरी हो गई। (संवाद)
चंदे से मंगवाए थे मोमोज और फिंगर चिप्स
बांदा। रविवार के चलते सभी बच्चों ने बाहर का खाने की इच्छा जताई। सभी ने 20 रुपये का चंदा दिया। इसके बाद विद्यालय में ही पढ़ने वाला कक्षा सात का छात्र राहुल साइकिल से महाराणा प्रताप चौक आया था। यहां एक ठेल से उसने मोमोज और फिंगर चिप्स लिए। इसके बाद विद्यालय आया और सभी ने बैठकर एक साथ इनका आनंद लिया। मृतक नितिन के भाई हर्ष का आरोप है कि कुछ बच्चों ने चटनी खाई थी, उन्हीं की हालत बिगड़ी है। (संवाद)
नहीं दी गई कोई तहरीर
बांदा। दोनों बच्चों की मौत के बाद सोमवार रात तक कोतवाली में कोई तहरीर नहीं दी गई। कोतवाल बलराम सिंह ने बताया कि दोनों बच्चों के शव का पोस्टमार्टम कराया गया है। किसी की तरफ से कोई तहरीर नहीं दी गई है। (संवाद)
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विद्यालय को बेसिक शिक्षा विभाग से केवल कक्षा आठ तक की मान्यता मिली है, जबकि आवासीय विद्यालय संचालित करने की कोई अनुमति नहीं है। इसके बावजूद यहां कक्षा 10 तक की कक्षाएं संचालित की जा रही थीं। छात्रावास में भी कक्षा 10 का एक छात्र रह रहा था।
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सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विद्यालय की मान्यता कक्षा आठ तक है तो कक्षा नौ और 10 की पढ़ाई किस आधार पर कराई जा रही थी। वहीं माध्यमिक शिक्षा परिषद से भी विद्यालय को कोई मान्यता नहीं मिली है। इसके बाद भी विद्यालय में माध्यमिक कक्षाओं का संचालन जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
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दो बच्चों की मौत के बाद अब अधिकारी मान्यता से अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। एक विभाग आवासीय मान्यता से इन्कार कर रहा है तो दूसरा विद्यालय को मान्यता देने से ही इन्कार कर रहा है। ऐसे में सवाल है कि वर्षों से बच्चों की पढ़ाई और आवासीय व्यवस्था किसकी निगरानी में चल रही थी।
बेसिक शिक्षा अधिकारी अव्यक्तराम तिवारी का कहना है कि बेसिक शिक्षा विभाग से आवासीय विद्यालय की मान्यता नहीं दी जाती है। उनके विभाग ने विद्यालय को केवल कक्षा आठ तक की मान्यता दी थी, जो वर्ष 2007 में मिली थी। वहीं जिला विद्यालय निरीक्षक दिनेश कुमार ने उनके विभाग से विद्यालय को किसी भी तरह की मान्यता दिए जाने से इन्कार किया है।
नहीं हुआ निरीक्षण, अब खुल रहीं परतें
विद्यालय में लंबे समय से बच्चे पढ़ रहे और रह रहे थे, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी इसकी वास्तविक स्थिति जानने की कोशिश नहीं की। न छात्रावास की व्यवस्था जांची गई और न ही यह देखा गया कि विद्यालय में किन कक्षाओं का संचालन हो रहा है। यदि समय रहते विद्यालय का निरीक्षण किया गया होता तो कक्षा आठ से आगे की पढ़ाई और बिना अनुमति आवासीय व्यवस्था का मामला सामने आ सकता था।
अन्य बच्चों के परिजनों को भी नहीं दी सूचना
दो बच्चों की हालत बिगड़ने और मौत होने के बाद भी विद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। रविवार रात घटना के बाद सोमवार दोपहर तक विद्यालय में रह रहे अन्य बच्चों के परिजनों को घटना की जानकारी नहीं दी गई। आरोप है कि बच्चों की स्वास्थ्य जांच तक नहीं कराई गई। दो छात्रों की हालत बिगड़ने के बाद भी बाकी बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर तत्काल कदम नहीं उठाया गया।
रात में घर सूचना देने को कहते रहे बच्चे, नहीं कराई बात
नितिन के साथ उसका छोटा भाई हर्ष कक्षा एक में इसी विद्यालय का छात्र है। वहीं अरुण का बड़ा भाई उत्कर्ष कक्षा पांच में पढ़ता है। दोनों के भाइयों ने परिजन को बताया कि उन्होंने रात में ही घर पर उनकी तबीयत खराब होने की सूचना देने को कहा था लेकिन स्कूल के बड़े सर ने बात नहीं कराई। सोमवार सुबह जिला अस्पताल से परिजन को बच्चों के बीमार होने की सूचना दी गई। परिजन अस्पताल पहुंचे तो दोनों बच्चों की मौत हो चुकी थी। परिजन ने स्कूल प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया है।
सोचा था पढ़कर करेंगे उजाला, बेटों को निगल गई अंधेरी रात
बांदा। साधारण किसान परिवार के नितिन और अरुण। जिनके परिवार ने अपनी खुशियों को दांव पर लगाकर बेटों के उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा था।
दो-दो बेटों को आवासीय विद्यालय में भेजकर 80 हजार रुपये सालाना फीस दे रहे थे। उन्हें क्या पता था कि उनके बेटों को रविवार रात का अंधेरा निगल जाएगा। घरवालों को केवल इस बात की तकलीफ सबसे अधिक है कि विद्यालय की ओर से बच्चों के बीमार होने की खबर रात में क्यों नहीं दी गई।
थाना गिरवां के गांव सरस्वाह निवासी सुनील प्रजापति किसान हैं। घर में पत्नी अनीता देवी व तीन बेटे अनीस, नितिन और हर्ष व एक बेटी लक्ष्मी हैं। सुनील के पास सात-आठ बीघा खेत हैं। इसी के बूते वह बेटों के भविष्य को संवारने की कोशिश कर रहे थे।
उन्होंने अपने बेटे नितिन और हर्ष का प्रवेश आवासीय विद्यालय में कराया था। एक बेटे की फीस 40 हजार सालाना थी। इस तरह सुनील 80 हजार रुपये सालाना देने के लिए अपनी हर खुशी को दांव पर लगाकर बैठे थे।
इसी तरह से थाना चिल्ला के गांव महेंदु निवासी पुष्कर उर्फ जयकिशोर कुशवाहा ने भी दो बेटों अरुण और उत्कर्ष को आवासीय विद्यालय में प्रवेश दिलाया था। पुष्कर भी सामान्य किसान हैं और पिता विजयपाल कुशवाहा पूर्व सैनिक है। पुष्कर ने बताया कि दोनों बेटों की शिक्षा का खर्च उनके दादा विजयपाल उठा रहे थे। पुष्कर ने बताया कि घर में पत्नी प्रीती व बेटी दीपिका है।
बेटों की मौत की खबर सोमवार की सुबह जब उन्हें मिली तो उनके सामने अंधेरा छा गया। समझ नहीं आया कि आखिर कुछ घंटे में ऐसा क्या हुआ कि उनके बच्चे अब उन्हें दोबारा देखने को नहीं मिलेंगे। बेसुध हुआ परिवार सब कामकाज छोड़कर मेडिकल कॉलेज पहुंचा।
परिजनों ने कहा कि स्कूल प्रबंधक ने उन्हें अगर रात में ही खबर दी होती तो शायद वह बेहतर इलाज का प्रयास करके अपने कलेजे के टुकड़ों को बचाने का भरसक प्रयास करते लेकिन विद्यालय की ओर से की गई लापरवाही ने उनके घरों के चिराग को बुझा दिया। जिनका दुख अंतिम सांस तक उन्हें रहेगा।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट नहीं, विसरा सुरक्षित
बांदा। मेडिकल कॉलेज बांदा में सोमवार को नितिन और अरुण का पोस्टमार्टम हुआ। देर शाम उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिली। बताया गया कि दोनों छात्रों की मौत का कारण स्पष्ट नहीं हुआ है। मौत का कारण जानने के लिए उनके विसरा को सुरक्षित कर प्रयोगशाला भेजा जाएगा। जिससे विस्तृत जांच कर मौत का कारण पता किया जा सके। प्रभारी निरीक्षक कोतवाली नगर बलराम सिंह ने बताया कि प्रकरण में अभी तक परिवार की तरफ से शिकायत नहीं की गई। अगर शिकायत मिलती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। (संवाद)
एफएसडीए की टीम ने भरे छह नमूने
बांदा। विद्यालय में दो बच्चों की मौत के बाद खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की टीम भी पहुंची। मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी नंदलाल गुप्ता ने रसोई की जांच की। यहां लाइसेंस नहीं लिया गया था।
इसके साथ ही अन्य नियमों की भी अनदेखी दिखी। टीम ने यहां से छह नमूने लेकर जांच के लिए भेजे। इसमें मूंग की दाल, आटा और रिफाइंड के अलावा पका चावल, रोटी और कद्दू की सब्जी का नमूना लिया गया। दरअसल रात को छात्राओं ने मूंग की दाल और रोटी ही खाई थी। ऐसे में इसकी जांच भी जरूरी हो गई। (संवाद)
चंदे से मंगवाए थे मोमोज और फिंगर चिप्स
बांदा। रविवार के चलते सभी बच्चों ने बाहर का खाने की इच्छा जताई। सभी ने 20 रुपये का चंदा दिया। इसके बाद विद्यालय में ही पढ़ने वाला कक्षा सात का छात्र राहुल साइकिल से महाराणा प्रताप चौक आया था। यहां एक ठेल से उसने मोमोज और फिंगर चिप्स लिए। इसके बाद विद्यालय आया और सभी ने बैठकर एक साथ इनका आनंद लिया। मृतक नितिन के भाई हर्ष का आरोप है कि कुछ बच्चों ने चटनी खाई थी, उन्हीं की हालत बिगड़ी है। (संवाद)
नहीं दी गई कोई तहरीर
बांदा। दोनों बच्चों की मौत के बाद सोमवार रात तक कोतवाली में कोई तहरीर नहीं दी गई। कोतवाल बलराम सिंह ने बताया कि दोनों बच्चों के शव का पोस्टमार्टम कराया गया है। किसी की तरफ से कोई तहरीर नहीं दी गई है। (संवाद)