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Banda News: डेढ़ साल से ज्यादा चलता रहा ठेका, किसी ने नहीं देखी स्टांप चोरी की खामी
Thu, 25 Jun 2026 11:41 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Thu, 25 Jun 2026 11:41 PM IST
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बांदा। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के टोल ठेके में 13.34 करोड़ रुपये की स्टांप चोरी पकड़े जाने के बाद सवाल सिस्टम पर भी खड़े हो गए हैं। डेढ़ साल से अधिक ठेका चलता रहा, पर स्टांप की खामी किसी अधिकारी की नजर में नहीं आई। इसी साल अक्तूबर में अनुबंध समाप्त होना था। ऐसे में अगर तीन महीने और जांच न होती तो कंपनी को भुगतान हो जाता और सरकार को करोड़ों रुपये राजस्व की चपत लगती है। स्टांप चोरी पकड़ने का यह मामला अभी तक का सबसे बड़ा बताया जा रहा है।
10 अक्तूबर 2024 को यह अनुबंध यूपीडा व मेसर्स दातार सिक्योरिटी सर्विस ग्रुप के बीच दो साल तक के लिए हुआ था। इसी के आधार पर कंपनी ने चित्रकूट से इटावा तक बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के टोल प्लाजा संचालित किए, करोड़ों रुपये का टोल संग्रह किया और भुगतान भी प्राप्त करती रही, लेकिन इस दौरान किसी स्तर पर यह नहीं देखा गया कि अनुबंध पर देय स्टांप शुल्क जमा है या नहीं। स्टांप एवं निबंधन विभाग को भी अनुबंध की प्रति हासिल करने के लिए यूपीडा से दो बार पत्राचार करना पड़ा। दस्तावेज सामने आने के बाद जब उसकी वित्तीय कीमत और स्टांप शुल्क का मिलान किया गया तो करोड़ों रुपये की कमी पकड़ में आ गई।
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चूक या सुनियोजित लापरवाही
333 करोड़ रुपये का अनुबंध कोई सामान्य फाइल नहीं थी। ऐसे अनुबंधों को विधिक, वित्तीय और प्रशासनिक स्तर पर कई चरणों से गुजरना पड़ता है। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि किसी भी अधिकारी की नजर स्टांप शुल्क जैसे महत्वपूर्ण बिंदु पर न गई हो। यही कारण है कि चर्चा शुरू हो गई है कि यदि जांच की परतें और खुलीं तो मामला केवल कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा।
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अब नजर अगली कार्रवाई पर
13.34 करोड़ रुपये की स्टांप चोरी का वाद दर्ज हो चुका है, लेकिन अब सबकी नजर इस बात पर है कि कार्रवाई केवल राजस्व वसूली तक सीमित रहती है या फिर यह भी तय किया जाएगा कि आखिर 333 करोड़ रुपये के अनुबंध में सबसे बुनियादी कानूनी औपचारिकता की अनदेखी किसकी जिम्मेदारी थी। इस मामले में असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि स्टांप शुल्क किसने नहीं दिया, बल्कि यह भी है कि करोड़ों रुपये का ठेका आखिर किसकी निगरानी में बिना जांच के चलता रहा।
वर्जन
जांच में स्टांप चोरी का मामला पकड़ा गया है। चूंकि इस मामले में राजस्व की रकम अधिक है, इसलिए इसे जिलाधिकारी की कोर्ट में सुना जाएगा। अन्य विभागों के बड़े अनुबंधों की जांच कराई जा रही है।
प्रवीण सिंह सचान, सहायक महानिरीक्षक, निबंधन
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10 अक्तूबर 2024 को यह अनुबंध यूपीडा व मेसर्स दातार सिक्योरिटी सर्विस ग्रुप के बीच दो साल तक के लिए हुआ था। इसी के आधार पर कंपनी ने चित्रकूट से इटावा तक बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के टोल प्लाजा संचालित किए, करोड़ों रुपये का टोल संग्रह किया और भुगतान भी प्राप्त करती रही, लेकिन इस दौरान किसी स्तर पर यह नहीं देखा गया कि अनुबंध पर देय स्टांप शुल्क जमा है या नहीं। स्टांप एवं निबंधन विभाग को भी अनुबंध की प्रति हासिल करने के लिए यूपीडा से दो बार पत्राचार करना पड़ा। दस्तावेज सामने आने के बाद जब उसकी वित्तीय कीमत और स्टांप शुल्क का मिलान किया गया तो करोड़ों रुपये की कमी पकड़ में आ गई।
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चूक या सुनियोजित लापरवाही
333 करोड़ रुपये का अनुबंध कोई सामान्य फाइल नहीं थी। ऐसे अनुबंधों को विधिक, वित्तीय और प्रशासनिक स्तर पर कई चरणों से गुजरना पड़ता है। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि किसी भी अधिकारी की नजर स्टांप शुल्क जैसे महत्वपूर्ण बिंदु पर न गई हो। यही कारण है कि चर्चा शुरू हो गई है कि यदि जांच की परतें और खुलीं तो मामला केवल कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा।
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अब नजर अगली कार्रवाई पर
13.34 करोड़ रुपये की स्टांप चोरी का वाद दर्ज हो चुका है, लेकिन अब सबकी नजर इस बात पर है कि कार्रवाई केवल राजस्व वसूली तक सीमित रहती है या फिर यह भी तय किया जाएगा कि आखिर 333 करोड़ रुपये के अनुबंध में सबसे बुनियादी कानूनी औपचारिकता की अनदेखी किसकी जिम्मेदारी थी। इस मामले में असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि स्टांप शुल्क किसने नहीं दिया, बल्कि यह भी है कि करोड़ों रुपये का ठेका आखिर किसकी निगरानी में बिना जांच के चलता रहा।
वर्जन
जांच में स्टांप चोरी का मामला पकड़ा गया है। चूंकि इस मामले में राजस्व की रकम अधिक है, इसलिए इसे जिलाधिकारी की कोर्ट में सुना जाएगा। अन्य विभागों के बड़े अनुबंधों की जांच कराई जा रही है।
प्रवीण सिंह सचान, सहायक महानिरीक्षक, निबंधन