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Barabanki News: गांवों से रूठे देसी पक्षी, झीलों में विदेशी मेहमानों की बहार

संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी Updated Tue, 06 Jan 2026 12:45 AM IST
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Native birds are upset with villages, and lakes are full of foreign guests.
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बाराबंकी। जिले में पर्यावरण के बदलते मिजाज को दो अलग-अलग तस्वीरों से समझा जा सकता है। एक तरफ गांवों के वे सूने आंगन और खेत हैं, जहां से गौरैया, तिलोरी, भुजैनी, मैना, कठफोड़वा, तीतर और बटेर जैसे स्थानीय पक्षी लगभग गायब हो चुके हैं। दूसरी तरफ जिले की वे झीलें हैं, जहां कड़ाके की ठंड में आज भी हजारों मील दूर से आए विदेशी परिंदे डेरा डालते हैं। यह विरोधाभास साफ बताता है कि समस्या पक्षियों में नहीं, बल्कि हमारी बदलती जीवनशैली और अनियोजित विकास में है।
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करीब 40 लाख की आबादी वाले इस जिले में 5,308 हेक्टेयर वन क्षेत्र है। इसमें रामसनेहीघाट में 29 प्रतिशत, फतेहपुर में 27 प्रतिशत व हैदरगढ़ में 15 प्रतिशत हैं लोक निर्माण विभाग 1034 किमी लंबी सड़कों के दोनों ओर पेड़ है।आंकड़े बताते हैं कि गांवों में अब 90 प्रतिशत मकान पक्के हो चुके हैं। आधुनिक सुख-सुविधाओं ने पुराने छप्परों, कच्ची दीवारों और कुओं की जगह ले ली है, जो कभी पक्षियों के सुरक्षित ठिकाने हुआ करते थे। छप्पर न होने से भुजैनी और कुओं की जगत गायब होने से तिलोरी जैसे पक्षी बेघर हो गए। वहीं, आम के बागों की कटान ने कठफोड़वा का अस्तित्व संकट में डाल दिया है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि तीतर और बटेर जैसे पक्षियों का अस्तित्व शिकार और खान-पान के शौक की भेंट चढ़ रहा है।
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गांवों के सूनेपन के उलट जिले के जलस्रोत (वेटलैंड्स) आज भी जीवंत हैं। वन विभाग ने जिले में करीब 400 वेटलैंड्स की जियो-टैगिंग की है, जिनमें 12 प्रमुख झीलें शामिल हैं। बेलहरा की किरकिच्ची, हरख की लंबौआ, हैदरगढ़ की नरदही और फतेहपुर की भगहर जैसी झीलें हर सर्दी में गुलजार रहती हैं। अकेले 600 बीघे में फैली किरकिच्ची झील में रूस, ऑस्ट्रेलिया, जापान और तिब्बत जैसे देशों से आए साइबेरियन पिनटेल, शोवलर, गिर्री और बेखुर बतख जैसे विदेशी मेहमान नजर आते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन झीलों में प्रचुर मात्रा में भोजन और सुरक्षित माहौल मिलने के कारण विदेशी पक्षी हर साल हजारों किमी का सफर तय कर यहां आते हैं। यदि हमें अपने स्थानीय पक्षियों को बचाना है, तो गांवों में हरियाली और उनके अनुकूल परिवेश को फिर से जीवित करना होगा।
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घोंसलों की जगह ही खत्म
आज हालात बदल चुके हैं। गांवों में भी शहर जैसा कंक्रीट कल्चर आ गया है। पक्के मकान, टाइल्स की छतें, बंद रोशनदान और शीशे की खिड़कियां, इन सबने घोंसलों की जगह ही खत्म कर दी। ऊपर से खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का बढ़ता इस्तेमाल। कीट खत्म हुए, तो पक्षियों का भोजन नहीं बचा।
- आकाशदीप बधावन, डीएफओ
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