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Bhadohi News: मैदानों पर बोर्ड टंगे, खिलाड़ियों के सपने लटके
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भदोही के मानिकपुर खेल मैदान में लगा बोर्ड। संवाद
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ज्ञानपुर। भारत 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करने जा रहा है। 2036 ओलंपिक के लिए दावेदारी भी कर रहा है, लेकिन गांवों में खेल प्रतिभाओं को निखारने की मुहिम सिकुड़ते मैदानों में सिमट गई है। खेल मैदान न होने से प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। आलम यह है कि पांच साल में 92 खेल मैदान चिन्हित हुए, लेकिन 14 ही विकसित हो सके। 78 खेल मैदानों पर बोर्ड या अन्य उपकरण लगाकर छोड़ दिया गया है। खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए गांवों में खेल मैदान विकसित किए जा रहे हैं। कोविड महामारी के बाद शुरू हुई मुहिम जमीन के अभाव में दम तोड़ती दिख रही है। युवा कल्याण विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो 546 ग्राम पंचायतों में 92 गांवों में जमीन मिली। 2021 से अब तक 14 खेल मैदान बनकर तैयार हो गए हैं, जबकि 78 अधूरे हैं। कुछ स्थानों पर बोर्ड लगा है तो कुछ जगह ईंट की हल्की दीवार बनाकर छोड़ दिया गया है।
सोमवार को हमारी टीम ने अभोली के अमिलहरा, भदोही के संवरपुर, मानिकपुर, अनेगपुर और सुरहन गांव में खेल मैदानों की पड़ताल की। इसमें सभी स्थानों पर काम 10 फीसदी भी नहीं हो सका है। आंकड़ों पर गौर करें तो 400 से अधिक खेल मैदान अतिक्रमण की जद में हैं। इन्हें अतिक्रमण मुक्त करने के लिए कोई पहल नहीं की जा सकी। विभाग की तरफ से डीएम के माध्यम से तीनों एसडीएम को चार से पांच बार पत्राचार किया गया, लेकिन उसे अमल में नहीं लिया गया।
क्रिकेटर शिवम दूबे के गांव का खेल मैदान बदहाल
भारतीय टीम के स्टार ऑलराउंडर शिवम दूबे का गांव चौरी के मानिकपुर में है। भले ही वह मुंबई में खेलकर आगे बढ़े हैं, लेकिन उनके पैतृक गांव के खेल मैदान की हालत ठीक नहीं है। मैदान में सिर्फ बोर्ड लगाकर जिम्मेदार भूल गए हैं।
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35 अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय खिलाड़ी देने वाले मैदान की हालत खराब
डीघ ब्लॉक के मदनपुर का खेल मैदान आज भी विकास के इंतजार में है। यह वही मैदान है, जहां से अंतरराष्ट्रीय बेसबॉल के खिलाड़ी रिंकू सिंह, दिवंगत मुरलीधर बिंद, जैवलिन खिलाड़ी कारती साहनी समेत 35 राष्ट्रीय खिलाड़ी निकले। यहां आज भी व्यवस्थाएं नहीं हो सकी हैं।
खेल मैदानों से प्रधानों ने कर दिया खेल
जिले में कुल 546 ग्राम पंचायतें हैं। दो दशक पूर्व तक सभी गांवों में खेल मैदान रहे, लेकिन निजी लाभ के चक्कर में प्रधानों ने खेल मैदान से ही खेल कर दिया। शुरुआती दिनों में खेल मैदान कागजों में अंकित नहीं थे। इससे उन जमीनों का पट्टा दूसरों को कर दिया गया। यही नहीं, कई स्थानों पर अतिक्रमण भी हो गया है। राजनीति के कारण उन स्थानों से अतिक्रमण नहीं हट सका। यही कारण है कि 546 में 400 गांवों में खेल मैदान के लिए जमीन नहीं मिल सकी है।
हमारे यहां रेड प्लेट की व्यवस्था नहीं है। जैवलिन न होने से प्रैक्टिस में दिक्कत होती है। प्रशासन की तरफ से जरूरी सुविधाएं मुहैया करानी चाहिए। - सचिन, खिलाड़ी, मदनपुर:
खेल मैदानों का विकास सिर्फ कागजों में हो रहा है। खिलाड़ियों को न तो सुविधाएं मिल रही हैं और न ही व्यवस्थाएं। खिलाड़ी स्वयं के साधन से मेहनत करते हैं। - अंकित यादव, खिलाड़ी, कौलापुर
आंकड़ों पर नजर
चिन्हित मैदान : 92
विकसित मैदान : 14
अविकसित मैदान : 78
अतिक्रमण के शिकार : 400 करीब
मनरेगा यानी अब वीबीरामजी से खेल मैदान का विकास होना है। शुरुआत में तेजी से काम हुए, लेकिन दो से तीन साल से उम्मीद के हिसाब से काम नहीं हो सका। इसके लिए पत्र लिखा गया है। - रवि कुमार तिवारी, प्रभारी युवा कल्याण अधिकारी
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सोमवार को हमारी टीम ने अभोली के अमिलहरा, भदोही के संवरपुर, मानिकपुर, अनेगपुर और सुरहन गांव में खेल मैदानों की पड़ताल की। इसमें सभी स्थानों पर काम 10 फीसदी भी नहीं हो सका है। आंकड़ों पर गौर करें तो 400 से अधिक खेल मैदान अतिक्रमण की जद में हैं। इन्हें अतिक्रमण मुक्त करने के लिए कोई पहल नहीं की जा सकी। विभाग की तरफ से डीएम के माध्यम से तीनों एसडीएम को चार से पांच बार पत्राचार किया गया, लेकिन उसे अमल में नहीं लिया गया।
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क्रिकेटर शिवम दूबे के गांव का खेल मैदान बदहाल
भारतीय टीम के स्टार ऑलराउंडर शिवम दूबे का गांव चौरी के मानिकपुर में है। भले ही वह मुंबई में खेलकर आगे बढ़े हैं, लेकिन उनके पैतृक गांव के खेल मैदान की हालत ठीक नहीं है। मैदान में सिर्फ बोर्ड लगाकर जिम्मेदार भूल गए हैं।
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35 अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय खिलाड़ी देने वाले मैदान की हालत खराब
डीघ ब्लॉक के मदनपुर का खेल मैदान आज भी विकास के इंतजार में है। यह वही मैदान है, जहां से अंतरराष्ट्रीय बेसबॉल के खिलाड़ी रिंकू सिंह, दिवंगत मुरलीधर बिंद, जैवलिन खिलाड़ी कारती साहनी समेत 35 राष्ट्रीय खिलाड़ी निकले। यहां आज भी व्यवस्थाएं नहीं हो सकी हैं।
खेल मैदानों से प्रधानों ने कर दिया खेल
जिले में कुल 546 ग्राम पंचायतें हैं। दो दशक पूर्व तक सभी गांवों में खेल मैदान रहे, लेकिन निजी लाभ के चक्कर में प्रधानों ने खेल मैदान से ही खेल कर दिया। शुरुआती दिनों में खेल मैदान कागजों में अंकित नहीं थे। इससे उन जमीनों का पट्टा दूसरों को कर दिया गया। यही नहीं, कई स्थानों पर अतिक्रमण भी हो गया है। राजनीति के कारण उन स्थानों से अतिक्रमण नहीं हट सका। यही कारण है कि 546 में 400 गांवों में खेल मैदान के लिए जमीन नहीं मिल सकी है।
हमारे यहां रेड प्लेट की व्यवस्था नहीं है। जैवलिन न होने से प्रैक्टिस में दिक्कत होती है। प्रशासन की तरफ से जरूरी सुविधाएं मुहैया करानी चाहिए। - सचिन, खिलाड़ी, मदनपुर:
खेल मैदानों का विकास सिर्फ कागजों में हो रहा है। खिलाड़ियों को न तो सुविधाएं मिल रही हैं और न ही व्यवस्थाएं। खिलाड़ी स्वयं के साधन से मेहनत करते हैं। - अंकित यादव, खिलाड़ी, कौलापुर
आंकड़ों पर नजर
चिन्हित मैदान : 92
विकसित मैदान : 14
अविकसित मैदान : 78
अतिक्रमण के शिकार : 400 करीब
मनरेगा यानी अब वीबीरामजी से खेल मैदान का विकास होना है। शुरुआत में तेजी से काम हुए, लेकिन दो से तीन साल से उम्मीद के हिसाब से काम नहीं हो सका। इसके लिए पत्र लिखा गया है। - रवि कुमार तिवारी, प्रभारी युवा कल्याण अधिकारी