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Budaun News: फाल्गुन में सूना पड़ा पलाश वन, होली तक नहीं खिलेंगे टेसू के फूल
संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं
Updated Wed, 25 Feb 2026 12:27 AM IST
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कादरचौक इलाके के ककोड़ा जंगल में लगे टेशू के पेड़ों में इस बार अभी तक नहीं निकले फूल। संवाद
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अमित पांडेय
बदायूं/कादरचौक। फाल्गुन की आहट के साथ जिन जंगलों में कभी अंगारों-सी लालिमा लहराती थी, वहां इस बार सन्नाटा पसरा है। कादरचौक क्षेत्र के सैकड़ों एकड़ में फैले पलाश वन में होली तक टेसू के फूल नहीं खिले। वसंत का शृंगार कहे जाने वाले इन पुष्पों के बिना जंगल वीरान नजर आ रहे हैं। ग्रामीणों और बुजुर्गों का कहना है कि लंबे समय बाद फाल्गुन का ऐसा सूना दृश्य देखा है। ऐसे में इन फूलों के सहारे हर साल होने वाला लाखों रुपये का कारोबार भी इस बार नहीं हो सकेगा। जाे सूखे फूल रखे हैं, उसी से रंग बनाने की तैयारी की जा रही है।
जानकारों के अनुसार टेसू, ढाक, परसा, केसू और किंशुक जैसे नामों से जाना जाता है। वसंत ऋतु में इसके पुष्प गुच्छ अंगारों की तरह दहकते थे और गिरे फूलों से धरती लाल चादर-सी ओढ़ लेती थी। अंग्रेजी साहित्य में इसे ‘फ्लेम ऑफ फॉरेस्ट’ यानी ‘वन ज्योति’ कहा गया है। लेकिन इस बार वसंत का यह शृंगार गायब है।
जलवायु परिवर्तन और अतिक्रमण का असर
स्थानीय लोगों का मानना है कि प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और वन क्षेत्र पर बढ़ते कब्जों ने पलाश के प्राकृतिक चक्र को प्रभावित किया है। ककोड़ा, कादरचौक और भूड़ा-भदरौल में लगभग 150 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले पलाश वन का दायरा लगातार सिमट रहा है। कभी एक हजार एकड़ तक फैले वन अब सीमित परिक्षेत्र में रह गए हैं। नई पौध तैयार नहीं हो पा रही और पुराने वृक्ष धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। वन विभाग की उदासीनता पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि अवैध कटान और जलौनी लकड़ी की निकासी पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही।
होली के रंग और परंपरा से जुड़ा है टेसू
चार-पांच दशक पहले तक होली के प्राकृतिक रंग इन्हीं फूलों से तैयार किए जाते थे। आज भी कुछ लोग त्वचा के लिए लाभकारी टेसू के फूलों से रंग बनाकर होली खेलते हैं। प्राचीन ग्रंथों और लोक साहित्य में पलाश का उल्लेख मिलता है। सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों में इसका विशेष स्थान रहा है।
राज्य पुष्प और डाक टिकट पर सम्मान
पलाश को उत्तर प्रदेश का ‘राज्य पुष्प’ होने का गौरव प्राप्त है। भारत सरकार डाक विभाग की ओर से इसे डाक टिकट पर भी स्थान दिया जा चुका है। इसके पुष्प, गोंद, पत्ते और जड़ आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर माने जाते हैं। नपुंसकता, चर्म रोग, चोट और नेत्रज्योति जैसे रोगों के उपचार में इसका उपयोग बताया जाता है।
पत्तल-दोना की परंपरा भी हुई ओझल
पलाश के पत्तों से दोना और पत्तल बनाए जाते थे। मान्यता है कि इसके पत्तल में भोजन करना शुद्धता का प्रतीक है और चांदी के पात्र में भोजन के समान फलदायी माना गया है। समय के साथ प्लास्टिक के दोने-पत्तल ने इसकी जगह ले ली, जिससे पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।
पौराणिक कथा से जुड़ी मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार कामदेव ने इसी वृक्ष पर बैठकर भगवान शिव की तपस्या भंग की थी। शिव के क्रोध से कामदेव भस्म हुए और वृक्ष दहक उठे। तभी से इसके फूल शिव के तीसरे नेत्र की ज्वाला जैसे माने जाते हैं। प्रकृति प्रेमियों को चिंता है कि यदि संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में पलाश वन इतिहास बनकर रह जाएंगे।
सूखे फूलों से बनाया जा रहा रंग, 20 मार्च के बाद टेशू के खिलेंगे फूल
स्थानीय निवासी कृपाल ने बताया कि इस साल होली का त्योहार पहले पड़ रहा है। इसी के चलते टेशू के फूल नहीं खिले हैं। करीब 20 मार्च के बाद इन पेड़ों में फूल आते है। स्थानीय मंदिर के पुजारी महेश दास ने बताया कि होली समय से पहले है, इसलिए जंगल में फूल नहीं खिले हैं। बताया कि लोगों के पास सूखे फूल रखे हैं, उसी से रंग बनाकर होली पर खेला जाएगा। जबकि यदि फूल खिले होते तो गीले रंग से होली खेली जाती।
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बदायूं/कादरचौक। फाल्गुन की आहट के साथ जिन जंगलों में कभी अंगारों-सी लालिमा लहराती थी, वहां इस बार सन्नाटा पसरा है। कादरचौक क्षेत्र के सैकड़ों एकड़ में फैले पलाश वन में होली तक टेसू के फूल नहीं खिले। वसंत का शृंगार कहे जाने वाले इन पुष्पों के बिना जंगल वीरान नजर आ रहे हैं। ग्रामीणों और बुजुर्गों का कहना है कि लंबे समय बाद फाल्गुन का ऐसा सूना दृश्य देखा है। ऐसे में इन फूलों के सहारे हर साल होने वाला लाखों रुपये का कारोबार भी इस बार नहीं हो सकेगा। जाे सूखे फूल रखे हैं, उसी से रंग बनाने की तैयारी की जा रही है।
जानकारों के अनुसार टेसू, ढाक, परसा, केसू और किंशुक जैसे नामों से जाना जाता है। वसंत ऋतु में इसके पुष्प गुच्छ अंगारों की तरह दहकते थे और गिरे फूलों से धरती लाल चादर-सी ओढ़ लेती थी। अंग्रेजी साहित्य में इसे ‘फ्लेम ऑफ फॉरेस्ट’ यानी ‘वन ज्योति’ कहा गया है। लेकिन इस बार वसंत का यह शृंगार गायब है।
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जलवायु परिवर्तन और अतिक्रमण का असर
स्थानीय लोगों का मानना है कि प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और वन क्षेत्र पर बढ़ते कब्जों ने पलाश के प्राकृतिक चक्र को प्रभावित किया है। ककोड़ा, कादरचौक और भूड़ा-भदरौल में लगभग 150 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले पलाश वन का दायरा लगातार सिमट रहा है। कभी एक हजार एकड़ तक फैले वन अब सीमित परिक्षेत्र में रह गए हैं। नई पौध तैयार नहीं हो पा रही और पुराने वृक्ष धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। वन विभाग की उदासीनता पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि अवैध कटान और जलौनी लकड़ी की निकासी पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही।
होली के रंग और परंपरा से जुड़ा है टेसू
चार-पांच दशक पहले तक होली के प्राकृतिक रंग इन्हीं फूलों से तैयार किए जाते थे। आज भी कुछ लोग त्वचा के लिए लाभकारी टेसू के फूलों से रंग बनाकर होली खेलते हैं। प्राचीन ग्रंथों और लोक साहित्य में पलाश का उल्लेख मिलता है। सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों में इसका विशेष स्थान रहा है।
राज्य पुष्प और डाक टिकट पर सम्मान
पलाश को उत्तर प्रदेश का ‘राज्य पुष्प’ होने का गौरव प्राप्त है। भारत सरकार डाक विभाग की ओर से इसे डाक टिकट पर भी स्थान दिया जा चुका है। इसके पुष्प, गोंद, पत्ते और जड़ आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर माने जाते हैं। नपुंसकता, चर्म रोग, चोट और नेत्रज्योति जैसे रोगों के उपचार में इसका उपयोग बताया जाता है।
पत्तल-दोना की परंपरा भी हुई ओझल
पलाश के पत्तों से दोना और पत्तल बनाए जाते थे। मान्यता है कि इसके पत्तल में भोजन करना शुद्धता का प्रतीक है और चांदी के पात्र में भोजन के समान फलदायी माना गया है। समय के साथ प्लास्टिक के दोने-पत्तल ने इसकी जगह ले ली, जिससे पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।
पौराणिक कथा से जुड़ी मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार कामदेव ने इसी वृक्ष पर बैठकर भगवान शिव की तपस्या भंग की थी। शिव के क्रोध से कामदेव भस्म हुए और वृक्ष दहक उठे। तभी से इसके फूल शिव के तीसरे नेत्र की ज्वाला जैसे माने जाते हैं। प्रकृति प्रेमियों को चिंता है कि यदि संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में पलाश वन इतिहास बनकर रह जाएंगे।
सूखे फूलों से बनाया जा रहा रंग, 20 मार्च के बाद टेशू के खिलेंगे फूल
स्थानीय निवासी कृपाल ने बताया कि इस साल होली का त्योहार पहले पड़ रहा है। इसी के चलते टेशू के फूल नहीं खिले हैं। करीब 20 मार्च के बाद इन पेड़ों में फूल आते है। स्थानीय मंदिर के पुजारी महेश दास ने बताया कि होली समय से पहले है, इसलिए जंगल में फूल नहीं खिले हैं। बताया कि लोगों के पास सूखे फूल रखे हैं, उसी से रंग बनाकर होली पर खेला जाएगा। जबकि यदि फूल खिले होते तो गीले रंग से होली खेली जाती।
