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Bulandshahar News: इंदौर खेड़ा टीला को सहेज रहा पुरातत्व विभाग, बदल जाएगी सूरत
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डिबाई क्षेत्र का इंदौर खेड़ा टीला। संवाद
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डिबाई। गांव इंदौर खेड़ा टीला को पुरातत्व विभाग ने सहेजना शुरू कर दिया है। इसकी सूरत बदलने के लिए करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। हालांकि इस कवायद से ऐतिहासिक टीले पर रहने वाले परिवारों की चिंता बढ़ गई है। उनका कहना है कि अब वह कहां जाएंगे। उन्होंने अधिकारियों से उन्हें यहीं पर रहने देने की मांग की है।
गांव इंदौर खेड़ा टीले पर तीन वर्ष पहले पुरातत्व विभाग ने पच्छिम दिशा में आसपास की जमीन चिह्नित कर कब्जे में ले लिया था। पथवारी मंदिर के निकट चारों ओर साढ़े तीन करोड़ की लागत से 425 मीटर लंबाई में चहारदीवारी बनवाई गई है। इसके ऊपर 1.8 मीटर ऊंचाई में लोहे ग्रिल लगाई जा रही है।
इसकी जद में पानी की टंकी, राजकीय पशु चिकित्सालय, दो नलकूप और 40-50 परिवार रह रहे हैं। ग्रामीण राजेंद्र सिंह, किशन लाल, धर्मेंद्र सिंह, प्रेमपाल, मनवीर सिंह, सतपाल, धर्मेंद्र, महेंद्र, रोशन सिंह, लाखन, सुखवीर सिंह, सुनीता, प्रेमलता, गायत्री, नीलम आदि का कहना है कि विभाग व प्रधान ने उन्हें काम शुरू करने से पहले कोई सूचना नहीं दी। ऐसे में अब वह लोग कहां जाएंगे।
खोदाई में निकल चुका है अष्टधातु, सोना-चांदी और तांबे का सामान
उत्तर गुप्त काल और कुषाण काल का अनुमान लगाकर वर्ष 2004 में दो किमी क्षेत्र में तीन स्थानों पर अलग-अलग खोदाई की गई थी। इस दौरान पहले छोर पर खोदाई में कुम्हार बर्तन बनाने का चाक, 25 फीट खोदाई में 20 गुणा दो मीटर के कमरे, ईंट के अलावा भवन में सीढ़ियां मिलीं। इसके अलावा सौंदर्य सामग्री, पशुओं के कंकाल और अवशेष मिले थे। दूसरे छोर पर पंच मार्क सिक्के बड़ी मात्रा में मिले थे। साथ ही मध्य कालीन युग का 13वीं सदी का सिक्का व अष्ट धातु की मूर्तियां मिली थीं। यह सब कोलकाता के म्यूजियम व आगरा के पुरातत्व संग्रहालय में रखे गए हैं।
महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है टीला
ऐतिहासिक पौराणिक ग्रंथों के अनुसार पूर्व में यह इंदपुरा, इंदरपुर, इंदरपत व इंदप्रस्थ के नाम से यह जाना जाता था। यह जिले का एक राजवंश था और नागदत्त नागसेन व मतिल राजाओं का राज्य भी था। बताते है कि स्वर्ग के राजा इंद्र की नगरी भी यही थी। गांव के उत्तर दिशा में अति प्राचीन द्वापर युगीन शिवलिंग है जिसकी गहराई को कोई थाह नहीं है। कर्ण टीला कर्णवास में यहां महाराजा कर्ण सवा मन सोना प्रतिदिन दान किया करते थे। वह इसी गांव का भाग बताया जाता है। हड़प्पा सभ्यता के चिन्ह व अवशेष भी यहां खोदाई में मिल चुके हैं। भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी का मायका इसी गांव में था। बुजुर्ग बताते हैं कि गांव से गंगा तक बनी सुरंग, जिसमें वह प्रतिदिन गंगा स्नान के लिए जाया करती थीं, उसके चिह्नन आज भी मौजूद हैं। भागवत गुरु शुकदेव व परीक्षित की कथा भी यहीं पर हुई बताई जाती है। कहते हैं कि राजा यदू की यह राजधानी भी रही है। स्कंदगुप्त की राजधानी इंदौर व इंदौर तामपत्र भी मौजूद हैं जो जुनागढ़ गुजरात के अभिलेख और इंदौर तामपत्र से प्रकट होता है। नाग वंशीय राजा शेषनाग का स्थान भी इसे ही माना जाता है। इसके अलावा कुषाण कास्य वंश, चौथी शताब्दी यानी 320 ई में चंद्रगुप्त प्रथम राजा, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का भी यहां से संबंध रहा है। पूर्वजों बताते थे कि लोधी जाति की संस्कृति का केंद्र इंदरपुर और मध्य प्रदेश श्रीनगरी उज्जैन रहा है।
पुरातत्व विभाग ने इंदौर खेड़ा टीले को संरक्षित करने की दिशा में पहल की है। यहां पर कई काम शुरू हो गए हैं। इस कार्य को जल्द पूरा कर लिया जाएगा। इसके लिए विभाग को जिम्मेदारी सौंपी गई है। - राजेंद्र सिंह, पुरातत्व विभाग के कंजर्वेशन असिस्टेंट
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गांव इंदौर खेड़ा टीले पर तीन वर्ष पहले पुरातत्व विभाग ने पच्छिम दिशा में आसपास की जमीन चिह्नित कर कब्जे में ले लिया था। पथवारी मंदिर के निकट चारों ओर साढ़े तीन करोड़ की लागत से 425 मीटर लंबाई में चहारदीवारी बनवाई गई है। इसके ऊपर 1.8 मीटर ऊंचाई में लोहे ग्रिल लगाई जा रही है।
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इसकी जद में पानी की टंकी, राजकीय पशु चिकित्सालय, दो नलकूप और 40-50 परिवार रह रहे हैं। ग्रामीण राजेंद्र सिंह, किशन लाल, धर्मेंद्र सिंह, प्रेमपाल, मनवीर सिंह, सतपाल, धर्मेंद्र, महेंद्र, रोशन सिंह, लाखन, सुखवीर सिंह, सुनीता, प्रेमलता, गायत्री, नीलम आदि का कहना है कि विभाग व प्रधान ने उन्हें काम शुरू करने से पहले कोई सूचना नहीं दी। ऐसे में अब वह लोग कहां जाएंगे।
खोदाई में निकल चुका है अष्टधातु, सोना-चांदी और तांबे का सामान
उत्तर गुप्त काल और कुषाण काल का अनुमान लगाकर वर्ष 2004 में दो किमी क्षेत्र में तीन स्थानों पर अलग-अलग खोदाई की गई थी। इस दौरान पहले छोर पर खोदाई में कुम्हार बर्तन बनाने का चाक, 25 फीट खोदाई में 20 गुणा दो मीटर के कमरे, ईंट के अलावा भवन में सीढ़ियां मिलीं। इसके अलावा सौंदर्य सामग्री, पशुओं के कंकाल और अवशेष मिले थे। दूसरे छोर पर पंच मार्क सिक्के बड़ी मात्रा में मिले थे। साथ ही मध्य कालीन युग का 13वीं सदी का सिक्का व अष्ट धातु की मूर्तियां मिली थीं। यह सब कोलकाता के म्यूजियम व आगरा के पुरातत्व संग्रहालय में रखे गए हैं।
महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है टीला
ऐतिहासिक पौराणिक ग्रंथों के अनुसार पूर्व में यह इंदपुरा, इंदरपुर, इंदरपत व इंदप्रस्थ के नाम से यह जाना जाता था। यह जिले का एक राजवंश था और नागदत्त नागसेन व मतिल राजाओं का राज्य भी था। बताते है कि स्वर्ग के राजा इंद्र की नगरी भी यही थी। गांव के उत्तर दिशा में अति प्राचीन द्वापर युगीन शिवलिंग है जिसकी गहराई को कोई थाह नहीं है। कर्ण टीला कर्णवास में यहां महाराजा कर्ण सवा मन सोना प्रतिदिन दान किया करते थे। वह इसी गांव का भाग बताया जाता है। हड़प्पा सभ्यता के चिन्ह व अवशेष भी यहां खोदाई में मिल चुके हैं। भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी का मायका इसी गांव में था। बुजुर्ग बताते हैं कि गांव से गंगा तक बनी सुरंग, जिसमें वह प्रतिदिन गंगा स्नान के लिए जाया करती थीं, उसके चिह्नन आज भी मौजूद हैं। भागवत गुरु शुकदेव व परीक्षित की कथा भी यहीं पर हुई बताई जाती है। कहते हैं कि राजा यदू की यह राजधानी भी रही है। स्कंदगुप्त की राजधानी इंदौर व इंदौर तामपत्र भी मौजूद हैं जो जुनागढ़ गुजरात के अभिलेख और इंदौर तामपत्र से प्रकट होता है। नाग वंशीय राजा शेषनाग का स्थान भी इसे ही माना जाता है। इसके अलावा कुषाण कास्य वंश, चौथी शताब्दी यानी 320 ई में चंद्रगुप्त प्रथम राजा, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का भी यहां से संबंध रहा है। पूर्वजों बताते थे कि लोधी जाति की संस्कृति का केंद्र इंदरपुर और मध्य प्रदेश श्रीनगरी उज्जैन रहा है।
पुरातत्व विभाग ने इंदौर खेड़ा टीले को संरक्षित करने की दिशा में पहल की है। यहां पर कई काम शुरू हो गए हैं। इस कार्य को जल्द पूरा कर लिया जाएगा। इसके लिए विभाग को जिम्मेदारी सौंपी गई है। - राजेंद्र सिंह, पुरातत्व विभाग के कंजर्वेशन असिस्टेंट
