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Bulandshahar News: माेनू के बलिदान की खबर से बगराई में मातम.. बिलखे बुआ - फूफा बोले, चला गया लाडला
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बलिदान मोनू का फाइल फोटो। स्रोत : फाइल फोटो
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खुर्जा। जम्मू-कश्मीर के डोडा में कर्तव्य की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूत मोनू सिंह (25) की शहादत की खबर जैसे ही बगराई गांव पहुंची, वहां सन्नाटा पसर गया। भले ही मोनू का परिवार अब अलीगढ़ के दाऊपुर में रह रहा है, लेकिन खुर्जा के इसी बगराई गांव की धूल में खेलकर मोनू ने सेना में जाने का सपना संजोया था। शहीद की बुआ और फूफा के घर आज चूल्हा नहीं जला, हर आंख नम है और जुबां पर बस मोनू के शांत स्वभाव और उसकी जांबाजी के किस्से हैं।
अलीगढ़ के दाऊपुर निवासी प्रताप सिंह करीब 26 वर्ष पहले खुर्जा के बगराई गांव में आकर बस गए थे। यहीं रहकर उन्होंने खेती-बाड़ी की और अपने तीनों बेटों—सोनू, मोनू और प्रशांत की परवरिश की। मोनू का जन्म वर्ष 2001 में इसी परिवेश में हुआ था। बगराई के एसएमजेईसी स्कूल से मोनू ने इंटरमीडिएट तक की शिक्षा प्राप्त की और फिर एनआईसी कॉलेज से स्नातक किया।
गांव के लोगों ने बताया कि मोनू और उसका छोटा भाई प्रशांत के मन में सेना की वर्दी के प्रति जुनून था। वर्ष 2019 में मोनू की मेहनत रंग लाई और वह सेना में भर्ती हो गए। वर्तमान में उनकी तैनाती 72 आर्माल्ड अटैचमेंट बटालियन में थी। बृहस्पतिवार को जैसे ही हादसे की आधिकारिक सूचना मिली, बगराई गांव में शोक की लहर दौड़ गई।
वो आखिरी मुलाकात अब बस यादें बनकर रह गई
शहीद के फूफा सोनवीर सिंह ने भारी मन से बताया कि मोनू करीब डेढ़ महीने पहले ही छुट्टी पर घर आए थे। वह अपनी डेढ़ साल की मासूम बेटी देविका और पत्नी को लेकर बगराई गांव भी आए थे। सोनवीर कहते हैं, उस समय गांव में उत्सव जैसा माहौल था। मोनू सबसे बड़े प्यार से मिले थे। किसने सोचा था कि डेढ़ महीने पहले जिस मुस्कुराते चेहरे को विदा किया था, वह अब तिरंगे में लिपटकर लौटेगा। शहीद की बुआ कुंतेश देवी और परिवार के अन्य सदस्य खबर मिलते ही अलीगढ़ रवाना हो गए हैं।
शांत स्वभाव और पढ़ाई में अव्वल थे मोनू
फुफेरे भाई अभितेश ने बचपन की यादें साझा करते हुए बताया कि तीनों भाइयों में मोनू सबसे शांत और सरल स्वभाव के थे। वह पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहते थे और उनका व्यवहार ऐसा था कि गांव का हर बुजुर्ग उन्हें अपने बेटे की तरह प्यार करता था। मोनू की शादी वर्ष 2023 में हुई थी। अब उनकी डेढ़ साल की बेटी देविका है, जिसे शायद यह भी नहीं पता कि उसके पिता ने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दे दिया है।
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अलीगढ़ के दाऊपुर निवासी प्रताप सिंह करीब 26 वर्ष पहले खुर्जा के बगराई गांव में आकर बस गए थे। यहीं रहकर उन्होंने खेती-बाड़ी की और अपने तीनों बेटों—सोनू, मोनू और प्रशांत की परवरिश की। मोनू का जन्म वर्ष 2001 में इसी परिवेश में हुआ था। बगराई के एसएमजेईसी स्कूल से मोनू ने इंटरमीडिएट तक की शिक्षा प्राप्त की और फिर एनआईसी कॉलेज से स्नातक किया।
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गांव के लोगों ने बताया कि मोनू और उसका छोटा भाई प्रशांत के मन में सेना की वर्दी के प्रति जुनून था। वर्ष 2019 में मोनू की मेहनत रंग लाई और वह सेना में भर्ती हो गए। वर्तमान में उनकी तैनाती 72 आर्माल्ड अटैचमेंट बटालियन में थी। बृहस्पतिवार को जैसे ही हादसे की आधिकारिक सूचना मिली, बगराई गांव में शोक की लहर दौड़ गई।
वो आखिरी मुलाकात अब बस यादें बनकर रह गई
शहीद के फूफा सोनवीर सिंह ने भारी मन से बताया कि मोनू करीब डेढ़ महीने पहले ही छुट्टी पर घर आए थे। वह अपनी डेढ़ साल की मासूम बेटी देविका और पत्नी को लेकर बगराई गांव भी आए थे। सोनवीर कहते हैं, उस समय गांव में उत्सव जैसा माहौल था। मोनू सबसे बड़े प्यार से मिले थे। किसने सोचा था कि डेढ़ महीने पहले जिस मुस्कुराते चेहरे को विदा किया था, वह अब तिरंगे में लिपटकर लौटेगा। शहीद की बुआ कुंतेश देवी और परिवार के अन्य सदस्य खबर मिलते ही अलीगढ़ रवाना हो गए हैं।
शांत स्वभाव और पढ़ाई में अव्वल थे मोनू
फुफेरे भाई अभितेश ने बचपन की यादें साझा करते हुए बताया कि तीनों भाइयों में मोनू सबसे शांत और सरल स्वभाव के थे। वह पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहते थे और उनका व्यवहार ऐसा था कि गांव का हर बुजुर्ग उन्हें अपने बेटे की तरह प्यार करता था। मोनू की शादी वर्ष 2023 में हुई थी। अब उनकी डेढ़ साल की बेटी देविका है, जिसे शायद यह भी नहीं पता कि उसके पिता ने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दे दिया है।

बलिदान मोनू का फाइल फोटो। स्रोत : फाइल फोटो
