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Chandauli News: 650 किलोमीटर दूर से पैदल चलकर पालकी से लाए थे मां काली की प्रतिमा
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सिकठा स्थित मां काली की प्रतिमा। संवाद
पीडीडीयू नगर। आस्था और विश्वास की अनूठी कहानी बरहनी ब्लॉक के सिकठा गांव स्थित मां काली मंदिर से जुड़ी है। मान्यता है कि करीब ढाई सौ साल पहले गांव निवासी सर्वजीत सिंह ने संतान प्राप्ति की मनौती मांगी थी।
मनौती पूरी होने पर उन्होंने कोलकाता से मां काली की प्रतिमा पालकी में रखकर पैदल गांव तक लाने का संकल्प पूरा किया। करीब 650 किलोमीटर की यात्रा के बाद काले पत्थर से बनी प्रतिमा को गांव में स्थापित कराया गया। आज यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
ग्रामीणों के अनुसार, सर्वजीत सिंह को कोई संतान नहीं थी। उन्होंने मां काली से प्रार्थना की थी कि संतान प्राप्त होने पर वह कोलकाता से मां की प्रतिमा पैदल अपने गांव लेकर आएंगे। मान्यता है कि मां के आशीर्वाद से उनके घर पुत्र का जन्म हुआ।
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उन्होंने पुत्र का नाम काली प्रसाद सिंह रखा। इसके बाद उन्होंने अपना संकल्प पूरा करते हुए पालकी में मां की प्रतिमा रखी और पैदल गांव पहुंचे। यहां विधि-विधान से प्रतिमा स्थापित कराई गई।
समय के साथ मंदिर की मान्यता आसपास के गांवों तक फैल गई। आज सिकठा समेत कई गांवों के श्रद्धालु मां काली के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। भक्त संतान प्राप्ति, परिवार की सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मां के दरबार में प्रार्थना करते हैं।
नवरात्र सहित अन्य धार्मिक अवसरों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। करीब ढाई सौ वर्ष पुरानी यह मान्यता गांव की धार्मिक पहचान से जुड़ी है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस कथा के प्रति ग्रामीणों की गहरी आस्था है।
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मनौती पूरी होने पर उन्होंने कोलकाता से मां काली की प्रतिमा पालकी में रखकर पैदल गांव तक लाने का संकल्प पूरा किया। करीब 650 किलोमीटर की यात्रा के बाद काले पत्थर से बनी प्रतिमा को गांव में स्थापित कराया गया। आज यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
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ग्रामीणों के अनुसार, सर्वजीत सिंह को कोई संतान नहीं थी। उन्होंने मां काली से प्रार्थना की थी कि संतान प्राप्त होने पर वह कोलकाता से मां की प्रतिमा पैदल अपने गांव लेकर आएंगे। मान्यता है कि मां के आशीर्वाद से उनके घर पुत्र का जन्म हुआ।
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उन्होंने पुत्र का नाम काली प्रसाद सिंह रखा। इसके बाद उन्होंने अपना संकल्प पूरा करते हुए पालकी में मां की प्रतिमा रखी और पैदल गांव पहुंचे। यहां विधि-विधान से प्रतिमा स्थापित कराई गई।
समय के साथ मंदिर की मान्यता आसपास के गांवों तक फैल गई। आज सिकठा समेत कई गांवों के श्रद्धालु मां काली के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। भक्त संतान प्राप्ति, परिवार की सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मां के दरबार में प्रार्थना करते हैं।
नवरात्र सहित अन्य धार्मिक अवसरों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। करीब ढाई सौ वर्ष पुरानी यह मान्यता गांव की धार्मिक पहचान से जुड़ी है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस कथा के प्रति ग्रामीणों की गहरी आस्था है।