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Chitrakoot News: 1857 की क्रांति की गवाह थी मऊ तहसील
Fri, 14 Aug 2026 11:34 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट
संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट
Updated Fri, 14 Aug 2026 11:34 PM IST
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फोटो 14 सीकेटीपी 20 खंडहर में तब्दील पुराना थाना भवन। संवाद
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मऊ (चित्रकूट)। कस्बे की पुरानी तहसील कभी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की गवाह थी।
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यहां बगावत की चिंगारी भड़की थी। आज उस ऐतिहासिक इमारत का अस्तित्व मिट चुका है। उसी स्थान पर करीब दो करोड़ रुपये की लागत से नया उपनिबंधक कार्यालय बनकर तैयार है। निर्माण कार्य 90 प्रतिशत पूरा हो चुका है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और इतिहासकार अभिनव राज त्रिपाठी ने बताया कि मऊ की पुरानी तहसील का संबंध 1857 की क्रांति से रहा है। सप्लीमेंट टू द लंदन गजेटियर में भी मऊ और आसपास के क्षेत्र में हुए विद्रोह का उल्लेख मिलता है।
उन्होंने बताया कि प्रयागराज की सेंट्रल जेल से फरार हुए विद्रोही यमुना नदी के रास्ते मऊ पहुंचे थे। इसके बाद यहां अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा। क्रांतिकारियों ने तहसील में लूटपाट की और सरकारी दस्तावेजों को आग के हवाले कर दिया।
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त्रिपाठी के अनुसार गूलर के पेड़ और आनंदी माता मंदिर के पास स्थित नीम के पेड़ पर भी कई क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। इतिहासकार ने मांग की है कि जिस स्थान पर नया उपनिबंधक कार्यालय बन रहा है, वहां 1857 के क्रांतिकारियों के सम्मान में एक शिलापट लगाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी को बलिदान की यह गाथा याद रहे।
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अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यहां बगावत की चिंगारी भड़की थी। आज उस ऐतिहासिक इमारत का अस्तित्व मिट चुका है। उसी स्थान पर करीब दो करोड़ रुपये की लागत से नया उपनिबंधक कार्यालय बनकर तैयार है। निर्माण कार्य 90 प्रतिशत पूरा हो चुका है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और इतिहासकार अभिनव राज त्रिपाठी ने बताया कि मऊ की पुरानी तहसील का संबंध 1857 की क्रांति से रहा है। सप्लीमेंट टू द लंदन गजेटियर में भी मऊ और आसपास के क्षेत्र में हुए विद्रोह का उल्लेख मिलता है।
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उन्होंने बताया कि प्रयागराज की सेंट्रल जेल से फरार हुए विद्रोही यमुना नदी के रास्ते मऊ पहुंचे थे। इसके बाद यहां अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा। क्रांतिकारियों ने तहसील में लूटपाट की और सरकारी दस्तावेजों को आग के हवाले कर दिया।
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त्रिपाठी के अनुसार गूलर के पेड़ और आनंदी माता मंदिर के पास स्थित नीम के पेड़ पर भी कई क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। इतिहासकार ने मांग की है कि जिस स्थान पर नया उपनिबंधक कार्यालय बन रहा है, वहां 1857 के क्रांतिकारियों के सम्मान में एक शिलापट लगाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी को बलिदान की यह गाथा याद रहे।