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रामायण मेला : रामकथा के मर्मज्ञों ने बिखेरे भक्ति के रंग
संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट
Updated Wed, 18 Feb 2026 12:30 AM IST
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चित्रकूट। 53वें राष्ट्रीय रामायण महोत्सव के तीसरे दिन भगवान श्रीराम की तपोस्थली चित्रकूट में विभिन्न भाषाओं और प्रदेशों के राम कथा के मर्मज्ञ विद्वानों ने अपने व्याख्यानों से भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस मौके पर प्रख्यात संतों, व्यासों और कथावाचकों के भक्ति परक प्रवचनों के साथ शास्त्रीय नृत्य, संगीत, अभिनय, रामलीला, रासलीला और कठपुतली नृत्य जैसी बोधप्रद प्रस्तुतियां दीं, जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा।
रामकथा के दौरान प्रयागराज के पूर्व सांसद उदयभान करवरिया ने चित्रकूट की महिमा का गुणगान करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम को घर में, घाट पर या मार्ग पर पाया जा सकता है। बबेरू से पधारे मानस मर्मज्ञ पं. लक्ष्मी प्रसाद शर्मा ने रामचरित मानस में भगवान को प्राप्त करने वाली चार नारियों - सीता, सती, शबरी और सूर्पणखा का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि नारियों ने ही रामायण के महानायक प्रभु श्री राम को आगे बढ़ाया, चाहे वह मंथरा-कैकेयी के द्वारा वनवास हो या सूर्पणखा के कारण पंचवटी से लंका की यात्रा। राष्ट्र, समाज और परिवार में नारियों का विशेष महत्व है।
बांदा से पधारे मानस किंकर रामप्रताप शुक्ल ने राम जन्म के कारणों और हनुमान जी द्वारा लंका जाने, सुरसा व लंकिनी का सामना करने का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि राम को पाने के लिए राम भक्त हनुमान जी की शरण में जाना होगा। नई पीढ़ी को जीवन में सफलता पाने के लिए हनुमान जी के चरित्र का अनुकरण करना चाहिए। डॉ. राम लाल द्विवेदी प्राणेश ने रामचरित मानस की शुरुआत और अंत के व अक्षर से होने को इसका विश्व में यश और गौरव दिलाने का कारण बताया। डॉ. अरूणा आभा ने नारी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए नवधा भक्ति और निषादराज के प्रति श्री राम के प्रेम का उल्लेख किया। अयोध्या धाम से पधारे स्वामी गर्गाचार्य ने श्रीमद्भागवत और रामचरित मानस को मानव जीवन को सुख-शांति प्रदान करने वाले प्रमुख साधन बताया। सुरेंद्र सिंह शरीर दानी ने प्रभु श्रीराम को संस्कृत का उन्नायक और समदर्शी बताते हुए उनके मर्यादा पुरुषोत्तम होने को जीवन मूल्यों के क्षरण को दूर करने वाला बताया।
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गोष्ठी में विद्वानों ने तुलसीदास को बताया काव्यशास्त्र का महान पंडित
संवाद न्यूज एजेंसी
चित्रकूट। रामायण मेला महोत्सव के दौरान आयोजित विद्वत गोष्ठी में वक्ताओं ने गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य, हनुमान जी के विज्ञान और रामचरितमानस के महत्व पर प्रकाश डाला।
डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ललित ने तुलसीदास को प्रीति रस के प्रणेता के रूप में सराहा। अयोध्या से आए डॉ. हरि प्रसाद दुबे ने हनुमान जी को एक अनन्य विज्ञानी बताया, वहीं दिल्ली के संजय मिश्र ने राम को जन-जन की आत्मा में बसा हुआ बताया। सुलतानपुर के डॉ. कृष्ण मणि चतुर्वेदी मैत्रेय ने मानस के पाठ भेद पर चर्चा की। मुजफ्फरपुर के डॉ. संजय पंकज ने राम को सत्य और सीता को सनातन शक्ति स्वरूपा निरूपित किया। सीतामणी की डॉ. आशा कुमारी ने चित्रकूट में सीता जी के जीवन और दुखों का वर्णन किया। लखनऊ विश्वविद्यालय की डॉ. अल्का पांडेय ने राम के गूढ़ चरित्र को भवलोक और भावलोक का हेतु बताया। मुजफ्फर नगर सीतामढी के डॉ. विमल कुमार परिमल ने मनुष्य से ईश्वत्व की यात्रा का वर्णन किया। रीवा की डॉ. अरूणा पाठक ने मानस में वर्णित विभिन्न रसों की मीमांसा की।
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रामकथा के दौरान प्रयागराज के पूर्व सांसद उदयभान करवरिया ने चित्रकूट की महिमा का गुणगान करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम को घर में, घाट पर या मार्ग पर पाया जा सकता है। बबेरू से पधारे मानस मर्मज्ञ पं. लक्ष्मी प्रसाद शर्मा ने रामचरित मानस में भगवान को प्राप्त करने वाली चार नारियों - सीता, सती, शबरी और सूर्पणखा का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि नारियों ने ही रामायण के महानायक प्रभु श्री राम को आगे बढ़ाया, चाहे वह मंथरा-कैकेयी के द्वारा वनवास हो या सूर्पणखा के कारण पंचवटी से लंका की यात्रा। राष्ट्र, समाज और परिवार में नारियों का विशेष महत्व है।
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बांदा से पधारे मानस किंकर रामप्रताप शुक्ल ने राम जन्म के कारणों और हनुमान जी द्वारा लंका जाने, सुरसा व लंकिनी का सामना करने का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि राम को पाने के लिए राम भक्त हनुमान जी की शरण में जाना होगा। नई पीढ़ी को जीवन में सफलता पाने के लिए हनुमान जी के चरित्र का अनुकरण करना चाहिए। डॉ. राम लाल द्विवेदी प्राणेश ने रामचरित मानस की शुरुआत और अंत के व अक्षर से होने को इसका विश्व में यश और गौरव दिलाने का कारण बताया। डॉ. अरूणा आभा ने नारी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए नवधा भक्ति और निषादराज के प्रति श्री राम के प्रेम का उल्लेख किया। अयोध्या धाम से पधारे स्वामी गर्गाचार्य ने श्रीमद्भागवत और रामचरित मानस को मानव जीवन को सुख-शांति प्रदान करने वाले प्रमुख साधन बताया। सुरेंद्र सिंह शरीर दानी ने प्रभु श्रीराम को संस्कृत का उन्नायक और समदर्शी बताते हुए उनके मर्यादा पुरुषोत्तम होने को जीवन मूल्यों के क्षरण को दूर करने वाला बताया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
चित्रकूट। रामायण मेला महोत्सव के दौरान आयोजित विद्वत गोष्ठी में वक्ताओं ने गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य, हनुमान जी के विज्ञान और रामचरितमानस के महत्व पर प्रकाश डाला।
डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ललित ने तुलसीदास को प्रीति रस के प्रणेता के रूप में सराहा। अयोध्या से आए डॉ. हरि प्रसाद दुबे ने हनुमान जी को एक अनन्य विज्ञानी बताया, वहीं दिल्ली के संजय मिश्र ने राम को जन-जन की आत्मा में बसा हुआ बताया। सुलतानपुर के डॉ. कृष्ण मणि चतुर्वेदी मैत्रेय ने मानस के पाठ भेद पर चर्चा की। मुजफ्फरपुर के डॉ. संजय पंकज ने राम को सत्य और सीता को सनातन शक्ति स्वरूपा निरूपित किया। सीतामणी की डॉ. आशा कुमारी ने चित्रकूट में सीता जी के जीवन और दुखों का वर्णन किया। लखनऊ विश्वविद्यालय की डॉ. अल्का पांडेय ने राम के गूढ़ चरित्र को भवलोक और भावलोक का हेतु बताया। मुजफ्फर नगर सीतामढी के डॉ. विमल कुमार परिमल ने मनुष्य से ईश्वत्व की यात्रा का वर्णन किया। रीवा की डॉ. अरूणा पाठक ने मानस में वर्णित विभिन्न रसों की मीमांसा की।