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Deoria News: मनमानी...बीएसए दफ्तर में सभी आदेश बेमानी
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
Updated Thu, 26 Feb 2026 01:28 AM IST
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देवरिया। वेतन देने का आदेश हाईकोर्ट का, बजट देने निर्देश शासन का, लेकिन अमल होगा लिपिक की मर्जी से।
नतीजा यह हुआ कि जनक लघु माध्यमिक विद्यालय, मड़िपुर पर ताला लटक गया। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में एक लिपिकीय स्तर की आपत्ति स्कूल प्रबंधन और शासन-प्रशासन पर भारी पड़ी। 42 शिक्षक मुकदमा लड़ते-लड़ते थक गए, लेकिन सिस्टम में कोई बदलाव नहीं आया।
विद्यालय के प्रबंधक जनकदेव राय के पास मुकदमे से संबंधित मोटी फाइल है। प्रबंधक के अनुसार, वर्ष 1971 में गांव के बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए आठवीं तक का स्कूल खोला गया। 1984 में मान्यता के लिए हाईकोर्ट जाना पड़ा। तब से अब तक वेतन और मान्यता संबंधी विवाद को लेकर करीब 160 बार हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा चुका है। वर्ष 1998 में विद्यालय को अनुदान देने का आदेश हाईकोर्ट ने दिया। इस पर कार्रवाई नहीं हुई तो फिर कोर्ट गए। 2009 में शिक्षकों ने मुकदमा दायर किया। इसके बाद वर्ष 2011 में स्थायी मान्यता का आदेश मिला।
वर्ष 2013 में वित्त पोषण का आदेश मिला। अगले साल यानी वर्ष 2014 में मंडलीय समिति की बैठक में दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी व एक लिपिक को वेतन देने का आदेश हुआ। फिर मामला हाईकोर्ट पहुंचा और अगले आदेश पर वर्ष 2017 में 21 शिक्षकों का वेतन भुगतान शुरू हुआ।
साल 2019 तक भुगतान हुआ। इसके बाद फिर भुगतान रोक दिया गया। फाइलों में यह रिपोर्ट लगा दी गई कि स्कूल में बच्चे नहीं हैं और विद्यालय बंद है।
प्रबंधक जनकदेव राय ने बताया कि अपील पर कोई सुनवाई नहीं हुई, उल्टे हमारे ही खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया गया। इसके बाद फिर हाईकोर्ट गए तो वर्ष 2021 में कोर्ट ने जवाब-तलब किया। इस पर विभाग की तरफ से वेतन नियमित रूप से दिए जाने की बात कही गई। इस मामले को लेकर फिर अपील की, तब बजट अनुमोदित करने की प्रक्रिया का हवाला दिया गया।
प्रबंधक का आरोप है कि पिछले पांच साल से वह लगातार बीएसए दफ्तर का चक्कर लगा रहे हैं। 10 बार से अधिक लेखाधिकारी से मिल चुके हैं। तीन बार बीएसए शालिनी श्रीवास्तव से भी बात कर चुके हैं।
अधिकारी लिपिक से मिलने की बात कहते हैं। लिपिक अकारण ही फाइलों में आपत्तियां लगाकर भुगतान की प्रक्रिया रोक देते हैं।
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नतीजा यह हुआ कि जनक लघु माध्यमिक विद्यालय, मड़िपुर पर ताला लटक गया। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में एक लिपिकीय स्तर की आपत्ति स्कूल प्रबंधन और शासन-प्रशासन पर भारी पड़ी। 42 शिक्षक मुकदमा लड़ते-लड़ते थक गए, लेकिन सिस्टम में कोई बदलाव नहीं आया।
विद्यालय के प्रबंधक जनकदेव राय के पास मुकदमे से संबंधित मोटी फाइल है। प्रबंधक के अनुसार, वर्ष 1971 में गांव के बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए आठवीं तक का स्कूल खोला गया। 1984 में मान्यता के लिए हाईकोर्ट जाना पड़ा। तब से अब तक वेतन और मान्यता संबंधी विवाद को लेकर करीब 160 बार हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा चुका है। वर्ष 1998 में विद्यालय को अनुदान देने का आदेश हाईकोर्ट ने दिया। इस पर कार्रवाई नहीं हुई तो फिर कोर्ट गए। 2009 में शिक्षकों ने मुकदमा दायर किया। इसके बाद वर्ष 2011 में स्थायी मान्यता का आदेश मिला।
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वर्ष 2013 में वित्त पोषण का आदेश मिला। अगले साल यानी वर्ष 2014 में मंडलीय समिति की बैठक में दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी व एक लिपिक को वेतन देने का आदेश हुआ। फिर मामला हाईकोर्ट पहुंचा और अगले आदेश पर वर्ष 2017 में 21 शिक्षकों का वेतन भुगतान शुरू हुआ।
साल 2019 तक भुगतान हुआ। इसके बाद फिर भुगतान रोक दिया गया। फाइलों में यह रिपोर्ट लगा दी गई कि स्कूल में बच्चे नहीं हैं और विद्यालय बंद है।
प्रबंधक जनकदेव राय ने बताया कि अपील पर कोई सुनवाई नहीं हुई, उल्टे हमारे ही खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया गया। इसके बाद फिर हाईकोर्ट गए तो वर्ष 2021 में कोर्ट ने जवाब-तलब किया। इस पर विभाग की तरफ से वेतन नियमित रूप से दिए जाने की बात कही गई। इस मामले को लेकर फिर अपील की, तब बजट अनुमोदित करने की प्रक्रिया का हवाला दिया गया।
प्रबंधक का आरोप है कि पिछले पांच साल से वह लगातार बीएसए दफ्तर का चक्कर लगा रहे हैं। 10 बार से अधिक लेखाधिकारी से मिल चुके हैं। तीन बार बीएसए शालिनी श्रीवास्तव से भी बात कर चुके हैं।
अधिकारी लिपिक से मिलने की बात कहते हैं। लिपिक अकारण ही फाइलों में आपत्तियां लगाकर भुगतान की प्रक्रिया रोक देते हैं।
