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एटा के जैन परिवार ने रचा अनोखा इतिहास: पहले पुत्र, फिर मां-पिता ने त्यागा गृहस्थ जीवन, सभी ने अपनाया संत मार्ग

संवाद न्यूज एजेंसी, एटा Published by: Akash Dubey Updated Mon, 30 Mar 2026 01:22 PM IST
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सार

एक जैन परिवार के पुत्र, पिता और मां ने क्रमबद्ध तरीके से संन्यास लिया। प्रशांत जैन, मुकुल जैन और सुमन जैन ने आध्यात्मिक जीवन अपनाया। यह जैन समाज में दुर्लभ घटना है।

Three members of a family from Etah took sanyas
एक ही परिवार के तीन सदस्य बने संन्यासी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

गृहस्थ जीवन छोड़कर वैराग्य अपनाने की घटनाएं भले ही विरल हों, लेकिन एटा का एक जैन परिवार पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन गया है। सुंदरलाल स्ट्रीट निवासी जैन परिवार के तीन सदस्यों ने क्रमबद्ध तरीके से संन्यास लेकर आध्यात्मिक जीवन को समर्पित कर दिया पहले पुत्र, फिर पिता और अंत में मां ने संत जीवन अपना लिया।

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घर के इकलौते पुत्र प्रशांत जैन वर्ष 2009 में आचार्य विमर्श सागर महाराज के संपर्क में आए। पढ़ाई में मेधावी होने के बावजूद उनका मन सांसारिक जीवन से हटने लगा। बीकॉम के दौरान और एमसीए में दाखिले के बाद भी उनका रुझान केवल अध्यात्म की ओर बढ़ता गया। इकलौती बहन की दिल्ली में शादी के बाद उन्होंने गृहस्थ मार्ग छोड़ने का निर्णय लिया और 25 नवंबर 2015 को टीकमगढ़ (मध्य प्रदेश) में आचार्य विमर्श सागर महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण कर मुनि विव्रत सागर बन गए। पुत्र के वैराग्य से प्रभावित पिता मुकुल जैन ने भी कुछ समय बाद गृहस्थ जीवन त्यागने का निश्चय कर लिया। 16 नवंबर 2017 को उन्होंने जबलपुर में आचार्य विमर्श सागर महाराज से मुनि दीक्षा लेकर मुनि विश्वांक सागर का स्वरूप धारण किया और धर्म प्रचार में सक्रिय हो गए।
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मां सुमन जैन ने भी अपनाया त्याग, बनीं क्षुल्लिका विप्रांत माताजी
पुत्र और पति दोनों के संन्यासी बनने के बाद मां सुमन जैन ने भी वैराग्य मार्ग अपनाने का निर्णय ले लिया। 3 नवंबर 2019 को दुर्ग (छत्तीसगढ़) में उन्होंने क्षुल्लिका दीक्षा लेकर विप्रांत माताजी के रूप में आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश किया। एक ही परिवार के तीन सदस्यों द्वारा संन्यास ग्रहण करना जैन समाज में दुर्लभ माना जाता है। परिवार ने अपनी संपूर्ण संपत्ति और संसाधन धर्म को समर्पित कर दिए हैं। वर्तमान में तीनों ही मेरठ में आचार्य विमर्श सागर महाराज के सान्निध्य में तप, जप और प्रवचन परंपरा के माध्यम से धर्म प्रचार कर रहे हैं।  मुनि विव्रत सागर महाराज (प्रशांत) बताते हैं कि उन्होंने पहले ब्रह्मचारी जीवन इसलिए अपनाया कि बहन उनके निर्णय से प्रभावित न हो। बहन की शादी के बाद उन्होंने दीक्षा लेकर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। बाद में माता-पिता भी उसी राह पर चल पड़े और परिवार ने संपूर्ण रूप से मोक्षमार्ग को समर्पित जीवन अपना लिया।

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