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Etawah News: आलू किसान पर दोहरी मार...पैदावार घटी, लागत बढ़ी
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फोटो 17:: ताखा क्षेत्र में आलू की खोदाई करते किसान। संवाद
फोटो 18:: रविवार को नवीन मंडी में बिक्री के लिए रखे आलू। संवाद
आलू की कड़वाहट से बेहाल किसान, अब मक्का-मूंग की मिठास से भरेगा जख्म
50 पैकेट की पैदावार 35 पर सिमटी, एक एकड़ आलू में हो रहा 75 हजार का नुकसान
विशेषज्ञों की सलाह फसल विविधीकरण से बदलेगी किस्मत, उर्द और मूंग की खेती से मिलेगी राहत
संवाद न्यूज एजेंसी
इटावा। जनपद में इन दिनों खेतों की मिट्टी से उम्मीदें कम और चिंताएं ज्यादा निकल रही हैं। कभी सफेद सोना कहलाने वाला आलू आज किसानों के लिए मिट्टी के मोल बिक रहा है। घटती पैदावार और आसमान छूती लागत ने किसानों को परेशान कर दिया है। आंकड़ों का गणित बता रहा है कि एक एकड़ की खेती पर किसान को लगभग 75 हजार रुपये का सीधा घाटा हो रहा है। हालांकि, इस संकट के बीच कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि मक्का, मूंग और मूंगफली की खेती करके आलू के घाटे को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
जिले में इस बार लगभग 25 हजार हेक्टेयर आलू की बोआई की गई थी। इस समय आलू की खोदाई का काम तेजी से चल रहा है। एक ओर किसानों को बीते वर्ष की अपेक्षा कीमतें कम मिल रही हैं वहीं दूसरी ओर आलू की पैदावार भी कम हो रही है। दोहरी मार ने जनपद के किसानों को परेशान कर रखा है। किसानों का कहना है कि पिछले वर्ष जहां सफेद आलू 50 पैकेट प्रति बीघा निकलता था, वह अब 35-40 पर सिमट गया है। लाल आलू की स्थिति और भी बदतर है, जो 25-30 पैकेट रह गया है। पांच बीघे (एक एकड़) में पहले 250 पैकेट की उपज और 500 रुपये भाव से 1.25 लाख की आय होती थी। अब उपज 200 पैकेट और भाव 250 रुपये रहने से आय महज 50,000 रह गई है।
महंगाई का प्रहार, लागत हुई सवाई
मद पहले खर्चा (रुपये) अब खर्चा (रुपये) प्रतिशत बढ़ोत्तरी
बिनाई (प्रति बीघा) 300 400 33 प्रतिशत
भराई (प्रति बीघा) 350 400 14 प्रतिशत
कोल्ड स्टोर किराया (प्रति पैकेट) 140 150 07 प्रतिशत
बोरा/जाली (प्रति पीस) 12-13 15-18 26 प्रतिशत
इनसेट
इन फसलों को कर सकते हैं किसान
जायद मक्का: कम समय और नकद मुनाफे का सौदा। स्टार्च कंपनियों में मांग के कारण अच्छे दाम भी मिल जाते हैं।
मूंग और उर्द: ये फसलें मिट्टी के लिए बूस्टर डोज हैं। ये हवा से नाइट्रोजन खींचकर जमीन की उर्वरता बढ़ाती हैं, जिससे अगली बार आलू की पैदावार फिर से अच्छी पहुंच सकती है।
मूंगफली: रेतीली मिट्टी वाले क्षेत्रों के लिए यह आलू के नुकसान की भरपाई करने में सक्षम फसल है।
विशेषज्ञ की राय
किसानों को अब खेती करने के तौर-तरीकों को बदलना चाहिए। आलू के बाद दलहनी फसलें लगाने से न केवल मिट्टी की सेहत सुधरेगी, बल्कि जोखिम प्रबंधन भी होगा। आलू का घाटा मक्का या मूंग के मुनाफे से कवर किया जा सकता है। आलू की खोदाई के बाद खेत खाली छोड़ने के बजाय इन फसलों पर दांव लगाना फायदेमंद होगा।-डॉ. देवेंद्र कुमार, कृषि विशेषज्ञ
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आलू की कड़वाहट से बेहाल किसान, अब मक्का-मूंग की मिठास से भरेगा जख्म
50 पैकेट की पैदावार 35 पर सिमटी, एक एकड़ आलू में हो रहा 75 हजार का नुकसान
विशेषज्ञों की सलाह फसल विविधीकरण से बदलेगी किस्मत, उर्द और मूंग की खेती से मिलेगी राहत
संवाद न्यूज एजेंसी
इटावा। जनपद में इन दिनों खेतों की मिट्टी से उम्मीदें कम और चिंताएं ज्यादा निकल रही हैं। कभी सफेद सोना कहलाने वाला आलू आज किसानों के लिए मिट्टी के मोल बिक रहा है। घटती पैदावार और आसमान छूती लागत ने किसानों को परेशान कर दिया है। आंकड़ों का गणित बता रहा है कि एक एकड़ की खेती पर किसान को लगभग 75 हजार रुपये का सीधा घाटा हो रहा है। हालांकि, इस संकट के बीच कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि मक्का, मूंग और मूंगफली की खेती करके आलू के घाटे को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
जिले में इस बार लगभग 25 हजार हेक्टेयर आलू की बोआई की गई थी। इस समय आलू की खोदाई का काम तेजी से चल रहा है। एक ओर किसानों को बीते वर्ष की अपेक्षा कीमतें कम मिल रही हैं वहीं दूसरी ओर आलू की पैदावार भी कम हो रही है। दोहरी मार ने जनपद के किसानों को परेशान कर रखा है। किसानों का कहना है कि पिछले वर्ष जहां सफेद आलू 50 पैकेट प्रति बीघा निकलता था, वह अब 35-40 पर सिमट गया है। लाल आलू की स्थिति और भी बदतर है, जो 25-30 पैकेट रह गया है। पांच बीघे (एक एकड़) में पहले 250 पैकेट की उपज और 500 रुपये भाव से 1.25 लाख की आय होती थी। अब उपज 200 पैकेट और भाव 250 रुपये रहने से आय महज 50,000 रह गई है।
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महंगाई का प्रहार, लागत हुई सवाई
मद पहले खर्चा (रुपये) अब खर्चा (रुपये) प्रतिशत बढ़ोत्तरी
बिनाई (प्रति बीघा) 300 400 33 प्रतिशत
भराई (प्रति बीघा) 350 400 14 प्रतिशत
कोल्ड स्टोर किराया (प्रति पैकेट) 140 150 07 प्रतिशत
बोरा/जाली (प्रति पीस) 12-13 15-18 26 प्रतिशत
इनसेट
इन फसलों को कर सकते हैं किसान
जायद मक्का: कम समय और नकद मुनाफे का सौदा। स्टार्च कंपनियों में मांग के कारण अच्छे दाम भी मिल जाते हैं।
मूंग और उर्द: ये फसलें मिट्टी के लिए बूस्टर डोज हैं। ये हवा से नाइट्रोजन खींचकर जमीन की उर्वरता बढ़ाती हैं, जिससे अगली बार आलू की पैदावार फिर से अच्छी पहुंच सकती है।
मूंगफली: रेतीली मिट्टी वाले क्षेत्रों के लिए यह आलू के नुकसान की भरपाई करने में सक्षम फसल है।
विशेषज्ञ की राय
किसानों को अब खेती करने के तौर-तरीकों को बदलना चाहिए। आलू के बाद दलहनी फसलें लगाने से न केवल मिट्टी की सेहत सुधरेगी, बल्कि जोखिम प्रबंधन भी होगा। आलू का घाटा मक्का या मूंग के मुनाफे से कवर किया जा सकता है। आलू की खोदाई के बाद खेत खाली छोड़ने के बजाय इन फसलों पर दांव लगाना फायदेमंद होगा।-डॉ. देवेंद्र कुमार, कृषि विशेषज्ञ
