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Hardoi News: विशेषज्ञों की जगह प्रशिक्षुओं के हवाले ओपीडी, इलाज सिर्फ खानापूर्ति
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फोटो-06- महिला चिकित्सालय। संवाद
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हरदोई। मेडिकल कॉलेज से संबद्ध महिला अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं पूरी तरह पटरी से उतर चुकी हैं। अस्पताल में दूर-दराज से आने वाली महिला मरीजों को विशेषज्ञ डॉक्टरों का परामर्श मिलना लगभग बंद हो गया है। अस्पताल की ओपीडी इन दिनों पूरी तरह प्रशिक्षु डॉक्टरों के हवाले कर दी गई है जबकि वरिष्ठ विशेषज्ञ चिकित्सक मिलते ही नहीं हैं। ऐसे में महिला मरीजों को समुचित उपचार नहीं मिल रहा है। अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक न मिलने से मरीज अब निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर हैं।
महिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों का न मिलना अब एक आम समस्या बन गया है। नियमानुसार ओपीडी में वरिष्ठ चिकित्सकों को मौजूद रहकर मरीजों का परीक्षण करना चाहिए लेकिन हकीकत इसके उलट है। गंभीर रोगों और गर्भावस्था से जुड़ी जटिल समस्याओं के परामर्श के लिए आने वाली महिलाओं को प्रशिक्षु डॉक्टरों के सहारे छोड़ दिया जाता है। सिस्टम की इस बेरुखी का सीधा असर गरीब मरीजों की जेब पर पड़ रहा है। समुचित उपचार और सही सलाह न मिलने के कारण मरीज और उनके तीमारदार अब निजी अस्पतालों और नर्सिंगहोम की ओर रुख करने को मजबूर हैं। सरकारी व्यवस्थाओं की इसी बदहाली ने जिले में निजी स्वास्थ्य सेवाओं के भरोसे को बढ़ाया है जिससे मध्यम और गरीब वर्ग पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
विशेषज्ञ चिकित्सकों ने बनाई ओपीडी से दूरी
महिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक रोजाना आते हैं लेकिन अब विशेषज्ञ डॉक्टरों ने ओपीडी से दूरी बना ली है। महिला चिकित्सालय के तीन कक्षों में ओपीडी की जाती है। इनमें रोजाना 250 से अधिक मरीजों को परामर्श दिया जाता है। कक्ष संख्या सात में तो सीनियर रेजिडेंट आती हैं लेकिन बाकी के दो कक्ष संख्या छह और पांच में प्रशिक्षु चिकित्सक ही बैठते हैं और खास बात यह है कि इन्हीं दो कक्षों में सबसे अधिक मरीजों को भेजा जाता है। मरीजों का कहना है कि कई बार प्रशिक्षु उनकी बात समझ नहीं पाते और इससे समुचित उपचार नहीं मिल पाता है।
महिला अस्पताल की ओपीडी में रोस्टर के अनुसार ही ड्यूटी लगाई गई है। कई बार चिकित्सक अवकाश पर होते हैं तो प्रशिक्षु ओपीडी संभाल लेते हैं। -डॉ. शिवम यादव, मीडिया प्रभारी
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महिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों का न मिलना अब एक आम समस्या बन गया है। नियमानुसार ओपीडी में वरिष्ठ चिकित्सकों को मौजूद रहकर मरीजों का परीक्षण करना चाहिए लेकिन हकीकत इसके उलट है। गंभीर रोगों और गर्भावस्था से जुड़ी जटिल समस्याओं के परामर्श के लिए आने वाली महिलाओं को प्रशिक्षु डॉक्टरों के सहारे छोड़ दिया जाता है। सिस्टम की इस बेरुखी का सीधा असर गरीब मरीजों की जेब पर पड़ रहा है। समुचित उपचार और सही सलाह न मिलने के कारण मरीज और उनके तीमारदार अब निजी अस्पतालों और नर्सिंगहोम की ओर रुख करने को मजबूर हैं। सरकारी व्यवस्थाओं की इसी बदहाली ने जिले में निजी स्वास्थ्य सेवाओं के भरोसे को बढ़ाया है जिससे मध्यम और गरीब वर्ग पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
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विशेषज्ञ चिकित्सकों ने बनाई ओपीडी से दूरी
महिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक रोजाना आते हैं लेकिन अब विशेषज्ञ डॉक्टरों ने ओपीडी से दूरी बना ली है। महिला चिकित्सालय के तीन कक्षों में ओपीडी की जाती है। इनमें रोजाना 250 से अधिक मरीजों को परामर्श दिया जाता है। कक्ष संख्या सात में तो सीनियर रेजिडेंट आती हैं लेकिन बाकी के दो कक्ष संख्या छह और पांच में प्रशिक्षु चिकित्सक ही बैठते हैं और खास बात यह है कि इन्हीं दो कक्षों में सबसे अधिक मरीजों को भेजा जाता है। मरीजों का कहना है कि कई बार प्रशिक्षु उनकी बात समझ नहीं पाते और इससे समुचित उपचार नहीं मिल पाता है।
महिला अस्पताल की ओपीडी में रोस्टर के अनुसार ही ड्यूटी लगाई गई है। कई बार चिकित्सक अवकाश पर होते हैं तो प्रशिक्षु ओपीडी संभाल लेते हैं। -डॉ. शिवम यादव, मीडिया प्रभारी

फोटो-06- महिला चिकित्सालय। संवाद