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Hathras News: जगह की कमी से स्टेशन के अस्तित्व पर आया संकट
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
Updated Sat, 10 Jan 2026 01:46 AM IST
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जगह की कमी से करीब 160 साल पुराने हाथरस सिटी रेलवे स्टेशन के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अतिरिक्त ट्रैक बिछाने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिलने के कारण इस ऐतिहासिक स्टेशन को शहर से बाहर स्थानांतरित करने के रेलवे के प्रस्ताव ने शहर में हलचल बढ़ा दी है। शुक्रवार को अमर उजाला में खबर प्रकाशित होने के बाद हर शख्स इस स्टेशन के शहर से हटने के नफा-नुकसान पर चर्चा करता नजर आया।
हाथरस सिटी स्टेशन का इतिहास अंग्रेजों के शासनकाल से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इस स्टेशन की नींव 1865 के आसपास रखी गई थी। इसके साथ ही बीते करीब 25 वर्षों में स्टेशन का महत्व तेजी से बढ़ा। यात्रियों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ और यह स्टेशन शहर की जीवनरेखा बन गया।
वर्ष 2009 में जब रेलवे ट्रैक को मीटर गेज से ब्रॉड गेज में परिवर्तित किया गया, तब स्टेशन की इमारत को नया रूप दिया गया। ब्रॉड गेज से ट्रेनों की आवाजाही सुगम हुई और दूर-दराज के क्षेत्रों से सीधा रेल संपर्क संभव हो सका। इसके बाद वर्ष 2019 में हुए विद्युतीकरण ने रेलवे संचालन को और आधुनिक बना दिया।
इलेक्ट्रिक इंजनों के संचालन से ट्रेनों की रफ्तार बढ़ी और डीजल इंजनों से निकलने वाले धुएं से भी राहत मिली। अब जब मथुरा-कासगंज रेल खंड के दोहरीकरण की योजना पर काम आगे बढ़ा, तो सबसे बड़ी समस्या जगह की सामने आई। स्टेशन के एक ओर बागला कॉलेज का विशाल मैदान है, तो दूसरी ओर व्यस्त सड़क मार्ग।
इन दोनों के बीच अतिरिक्त ट्रैक बिछाने की गुंजाइश न के बराबर है। यदि इसी स्टेशन पर दोहरीकरण संभव होता, तो शहर का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता था और रेलवे के साथ शहर का विकास भी नई ऊंचाइयों पर पहुंचता। कुल मिलाकर जगह के अभाव ने 160 साल पुराने हाथरस सिटी रेलवे स्टेशन को न्यू हाथरस सिटी स्टेशन को मात दे दी है।
अमृत भारत स्टेशन में किया गया था कायाकल्प
हाल ही में वर्ष 2025 में हाथरस सिटी स्टेशन को अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत विकसित किया गया। करीब 3.5 करोड़ रुपये की लागत से स्टेशन का कायाकल्प किया गया, जिसमें प्लेटफॉर्म, प्रतीक्षालय, शौचालय, प्रकाश व्यवस्था और अन्य यात्री सुविधाओं को आधुनिक रूप दिया गया। इससे यात्रियों को काफी सहूलियत मिली और स्टेशन की सूरत भी बदली। एडीआरएम मनोज कुमार ने बताया कि दोहरीकरण होना, न्यू हाथरस सिटी स्टेशन का निर्माण आदि बहुत लंबी प्रक्रिया है। इसमें अभी सालों लगेंगे।
स्टेशन पर स्वामी विवेकानंद ने बनाया था पहला शिष्य
हाथरस सिटी स्टेशन का इतिहास स्वामी विवेकानंद से भी जुड़ा हुआ है। इसका जिक्र श्रीरामकृष्ण परमहंस मठ की किताबों में भी मिलता है। बताते हैं कि वर्ष 1888 में स्वामी विवेकानंद हाथरस सिटी रेलवे स्टेशन पर रुके थे। यहां उनकी भेंट तत्कालीन स्टेशन मास्टर शरतचंद्र गुप्ता से हुई। वह स्वामीजी के व्यक्तिव से काफी प्रभावित थे। उन्होंने स्वामी जी से खुद को अपना शिष्य बनाने की इच्छा जाहिर की थी। स्वामी जी ने उन्हें गुरु दीक्षा देने से पूर्व उनकी परीक्षा ली। इस परीक्षा में शरतचंद्र गुप्ता को स्टेशन पर कुलियों से भिक्षा मांगनी थी। परीक्षा में सफल होने पर स्वामी जी ने उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया। वह स्वामी जी के ही साथ चले गए। उनका नाम शरतचंद्र से स्वामी सदानंद रखा और वह उनके पहले शिष्य के रूप में विज्ञात हुए।
एक ओर काॅलेज का मैदान, दूसरी ओर सड़क
हाथरस सिटी स्टेशन पर एक ओर बागला इंटर व डिग्री कॉलेज का बड़ा मैदान है, तो दूसरी ओर मथुरा-बरेली राजमार्ग। ऐसे में दोनों ही ओर जगह बढ़ाया जाना मुमकिन नहीं है। इस कारण स्टेशन को शहर से बाहर ले जाने की डीपीआर तैयार की गई है।
खास बातें
-वर्ष 2009 में मीटर गेज से ब्रॉड गेज में परिवर्तन के बाद बनी थी स्टेशन की नई इमारत
-वर्ष 2019 में विद्युतीकरण से ट्रेनों को मिली तेज रफ्तार, डीजल इंजन के धुएं से मिली राहत
-वर्ष 2025 में अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत करीब 3.5 करोड़ रुपये की लागत से हुआ कायाकल्प
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हाथरस सिटी स्टेशन का इतिहास अंग्रेजों के शासनकाल से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इस स्टेशन की नींव 1865 के आसपास रखी गई थी। इसके साथ ही बीते करीब 25 वर्षों में स्टेशन का महत्व तेजी से बढ़ा। यात्रियों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ और यह स्टेशन शहर की जीवनरेखा बन गया।
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वर्ष 2009 में जब रेलवे ट्रैक को मीटर गेज से ब्रॉड गेज में परिवर्तित किया गया, तब स्टेशन की इमारत को नया रूप दिया गया। ब्रॉड गेज से ट्रेनों की आवाजाही सुगम हुई और दूर-दराज के क्षेत्रों से सीधा रेल संपर्क संभव हो सका। इसके बाद वर्ष 2019 में हुए विद्युतीकरण ने रेलवे संचालन को और आधुनिक बना दिया।
इलेक्ट्रिक इंजनों के संचालन से ट्रेनों की रफ्तार बढ़ी और डीजल इंजनों से निकलने वाले धुएं से भी राहत मिली। अब जब मथुरा-कासगंज रेल खंड के दोहरीकरण की योजना पर काम आगे बढ़ा, तो सबसे बड़ी समस्या जगह की सामने आई। स्टेशन के एक ओर बागला कॉलेज का विशाल मैदान है, तो दूसरी ओर व्यस्त सड़क मार्ग।
इन दोनों के बीच अतिरिक्त ट्रैक बिछाने की गुंजाइश न के बराबर है। यदि इसी स्टेशन पर दोहरीकरण संभव होता, तो शहर का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता था और रेलवे के साथ शहर का विकास भी नई ऊंचाइयों पर पहुंचता। कुल मिलाकर जगह के अभाव ने 160 साल पुराने हाथरस सिटी रेलवे स्टेशन को न्यू हाथरस सिटी स्टेशन को मात दे दी है।
अमृत भारत स्टेशन में किया गया था कायाकल्प
हाल ही में वर्ष 2025 में हाथरस सिटी स्टेशन को अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत विकसित किया गया। करीब 3.5 करोड़ रुपये की लागत से स्टेशन का कायाकल्प किया गया, जिसमें प्लेटफॉर्म, प्रतीक्षालय, शौचालय, प्रकाश व्यवस्था और अन्य यात्री सुविधाओं को आधुनिक रूप दिया गया। इससे यात्रियों को काफी सहूलियत मिली और स्टेशन की सूरत भी बदली। एडीआरएम मनोज कुमार ने बताया कि दोहरीकरण होना, न्यू हाथरस सिटी स्टेशन का निर्माण आदि बहुत लंबी प्रक्रिया है। इसमें अभी सालों लगेंगे।
स्टेशन पर स्वामी विवेकानंद ने बनाया था पहला शिष्य
हाथरस सिटी स्टेशन का इतिहास स्वामी विवेकानंद से भी जुड़ा हुआ है। इसका जिक्र श्रीरामकृष्ण परमहंस मठ की किताबों में भी मिलता है। बताते हैं कि वर्ष 1888 में स्वामी विवेकानंद हाथरस सिटी रेलवे स्टेशन पर रुके थे। यहां उनकी भेंट तत्कालीन स्टेशन मास्टर शरतचंद्र गुप्ता से हुई। वह स्वामीजी के व्यक्तिव से काफी प्रभावित थे। उन्होंने स्वामी जी से खुद को अपना शिष्य बनाने की इच्छा जाहिर की थी। स्वामी जी ने उन्हें गुरु दीक्षा देने से पूर्व उनकी परीक्षा ली। इस परीक्षा में शरतचंद्र गुप्ता को स्टेशन पर कुलियों से भिक्षा मांगनी थी। परीक्षा में सफल होने पर स्वामी जी ने उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया। वह स्वामी जी के ही साथ चले गए। उनका नाम शरतचंद्र से स्वामी सदानंद रखा और वह उनके पहले शिष्य के रूप में विज्ञात हुए।
एक ओर काॅलेज का मैदान, दूसरी ओर सड़क
हाथरस सिटी स्टेशन पर एक ओर बागला इंटर व डिग्री कॉलेज का बड़ा मैदान है, तो दूसरी ओर मथुरा-बरेली राजमार्ग। ऐसे में दोनों ही ओर जगह बढ़ाया जाना मुमकिन नहीं है। इस कारण स्टेशन को शहर से बाहर ले जाने की डीपीआर तैयार की गई है।
खास बातें
-वर्ष 2009 में मीटर गेज से ब्रॉड गेज में परिवर्तन के बाद बनी थी स्टेशन की नई इमारत
-वर्ष 2019 में विद्युतीकरण से ट्रेनों को मिली तेज रफ्तार, डीजल इंजन के धुएं से मिली राहत
-वर्ष 2025 में अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत करीब 3.5 करोड़ रुपये की लागत से हुआ कायाकल्प