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Jhansi: जल संस्थान की पूर्व महाप्रबंधक व अधिशासी अभियंता विजिलेंस जांच में फंसे, दर्ज होगी एफआईआर

अमर उजाला नेटवर्क Published by: दीपक महाजन Updated Thu, 02 Apr 2026 05:16 AM IST
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सार

विजिलेंस टीम ने जांच के दौरान दोनों आरोपियों से पूछताछ की और महाप्रबंधक कार्यालय से बरामद 250 से अधिक फाइलों की जांच की। इसमें करोड़ों रुपये के अनियमित भुगतान के साक्ष्य मिले।

Jhansi: Former General Manager and Executive Engineer of Water Institute caught in Vigilance investigation
भ्रष्टाचार - फोटो : AI
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विस्तार

जल संस्थान में पांच साल पहले हुए करोड़ों रुपये के घोटाले की विजिलेंस जांच पूरी हो गई है। तीन वर्ष तक चली जांच में तत्कालीन महाप्रबंधक मंजू रानी गुप्ता और अधिशासी अभियंता कुलदीप सिंह के खिलाफ अहम साक्ष्य मिले हैं। जांच में कानपुर की फर्म से मिलीभगत की भी पुष्टि हुई है। अब आरोपी अफसरों और संबंधित फर्म के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की तैयारी है।
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विजिलेंस ने वर्ष 2023 में की थी जांच शुरू
वर्ष 2020-21 में मंजू रानी गुप्ता के कार्यकाल के दौरान करोड़ों रुपये के अनियमित भुगतान का मामला सामने आया था। इस पर विजिलेंस ने वर्ष 2023 में जांच शुरू की थी। इस दौरान मंजू रानी गुप्ता और तत्कालीन सचिव कुलदीप सिंह के खिलाफ कुल 13 शिकायतें मिलीं, जिनमें से चार आरोप सही पाए गए। जांच में सामने आया कि जल संस्थान झांसी की तत्कालीन महाप्रबंधक ने उरई के अधिशासी अभियंता का कार्यभार अपने पास रखते हुए फर्मों को अनियमित भुगतान किए। वहीं, झांसी में सचिव के रूप में भी करोड़ों रुपये के भुगतान में अनियमितताएं पाई गईं।
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गोलमाल में शामिल रही कानपुर की फर्म
विजिलेंस टीम ने जांच के दौरान दोनों आरोपियों से पूछताछ की और महाप्रबंधक कार्यालय से बरामद 250 से अधिक फाइलों की जांच की। इसमें करोड़ों रुपये के अनियमित भुगतान के साक्ष्य मिले। विशेष रूप से कानपुर स्थित ‘सारांश इंटरप्राइजेज’ समेत कई फर्मों को करीब 7.59 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। इस फर्म की प्रोपराइटर सीमा शुक्ला बताई गई हैं। विजिलेंस अधिकारियों के अनुसार, जांच में मिले साक्ष्यों के आधार पर आरोपी अफसरों और संबंधित फर्म के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए शासन से अनुमति मांगी गई है। अनुमति मिलते ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। एसपी (विजिलेंस) राजेंद्र यादव ने इसकी पुष्टि की है।


पहले भी सामने आ चुके हैं घोटाले
जल संस्थान में इससे पहले भी कई घोटाले उजागर हो चुके हैं। विजिलेंस ने करीब तीन वर्ष पहले लखनऊ में एक मामले में प्राथमिकी दर्ज की थी। इसमें एक अप्रैल 2005 से 31 मार्च 2017 के बीच हुए भुगतानों में वित्तीय अनियमितताएं सामने आई थीं। इस अवधि में जल संस्थान को 508 करोड़ रुपये का बजट मिला था, जिसमें 126 करोड़ सामग्री आपूर्ति और 173 करोड़ रुपये मरम्मत कार्यों पर खर्च दर्शाया गया। शेष राशि वेतन, पेंशन और अन्य मदों में खर्च हुई। जांच में 41.95 करोड़ रुपये का हिसाब स्पष्ट नहीं हो सका। इस मामले में तत्कालीन महाप्रबंधक इंद्रदेव पांडेय समेत 35 अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम सामने आए थे।
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