Kanpur: मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद दूर हो या पास, नए लेंस से सब दिखेगा साफ-साफ, हैलट में 200 मरीजों पर शोध
Kanpur News: जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के शोध के बाद हैलट में अब इडॉफ लेंस निशुल्क लगाए जाएंगे, जिससे मोतियाबिंद के मरीजों को दूर और बीच की दूरी की चीजें स्पष्ट दिखेंगी और ड्राइविंग में आसानी होगी।
विस्तार
मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद रोगियों को अब ड्राइविंग में दिक्कत नहीं होगी। ऑपरेशन के बाद नए इडॉफ लेंस के लगने से उन्हें दूर और बीच की दूरी की चीजें भी आसानी से साफ दिख जाएंगी। साथ ही नजदीक के चश्मे का नंबर भी कम लगेगा। अभी तक रोगी को लेंस से दूर की चीजें ही साफ दिखती हैं। नजदीक के लिए उन्हें बड़े नंबर का चश्मा लगाना पड़ता है। हैलट के नेत्र रोग विभाग में इडॉफ लेंस रोगियों को निशुल्क लगाया जाएगा।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग की वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी मोहन की अगुवाई में इडॉफ लेंस पर शोध किया गया। शोध में 200 रोगी शामिल किए गए। 100 रोगियों को इडॉफ लेंस और 100 को मोनोफोकल लेंस लगाया गया। इसमें मोनोफोकल और मल्टी फोकल लेंस में होने वाली दिक्कतें नहीं रहीं। डॉ. शालिनी ने बताया कि मल्टी फोकल लेंस में दूर का साफ दिखता है, लेकिन बीच में रिंग नजर आता है। रिंग की वजह से इससे व्यक्ति को दिक्कत होती है, लेकिन इडॉफ लेंस में वह रिंग नजर नहीं आता है।
बीच की दूरी की चीज देखने में दिक्कत आती रही
उन्होंने बताया कि मल्टी फोकल लेंस डायबिटीज, समलबाई, रेटिनोपैथी आदि के रोगियों को नहीं लगाया जाता। नए लेंस से इन रोगियों की समस्या का समाधान हो गया है। उन्हें इडॉफ लेंस आसानी से प्रत्यारोपित किया जा सकता है। इस लेंस से व्यक्ति की निगाह दूर के साथ ही बीच की चीजें भी कवर होती हैं। पुराने लेंस लगाने पर व्यक्ति को दूर का साफ दिखता रहा। नजदीक देखने के लिए चश्मा लगाना पड़ता है, लेकिन बीच की दूरी की चीज देखने में दिक्कत आती रही।
क्वालिटी ऑफ विजन अच्छी होती है
इडॉफ लेंस लगाने से कार और बाइक की ड्राइविंग के अलावा व्यक्ति को कंप्यूटर पर काम करने, मोबाइल की स्क्रीन देखने में भी आसानी रहेगी। इडॉफ लेंस से नजदीक की चीज देखने में आसानी होती है। बारीक चीजें या शब्द पढ़ने के लिए छोटे नंबर के चश्मे से काम चल जाता है। इसके साथ रंगों को देखने और कंट्रास्ट में आसानी रहती है। क्वालिटी ऑफ विजन अच्छी होती है। इस शोध में 45 से 60 साल आयु वर्ग के रोगियों को शामिल किया गया। इसकी अवधि एक वर्ष रही है।
