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Kaushambi News: उम्र ढली, उम्मीद नहीं… अपनों की राह ताक रहे 40 पिता
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Sat, 20 Jun 2026 11:57 PM IST
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राम प्रसाद,
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उम्र ढल गई है, कदम धीमे पड़ गए हैं, लेकिन उम्मीद अभी भी बाकी है। ओसा स्थित वृद्धाश्रम में रह रहे 55 बुजुर्गों में 40 ऐसे पिता हैं, जो अपनों से दूर होकर भी आज उनके लौट आने की राह ताक रहे हैं। जीवन भर बच्चों की खुशियों और भविष्य के लिए संघर्ष करने वाले इन पिताओं के दिलों में परिवार के प्रति प्रेम और अपनापन आज भी कम नहीं हुआ है।
फादर्स डे पर इन चेहरों की कहानी त्याग, संघर्ष और रिश्तों की बदलती तस्वीर को बयां करती है। आश्रम निदेशक आलोक राय बताते हैं कि यहां बुजुर्गों को घर जैसा माहौल देने का प्रयास किया जाता है, ताकि उन्हें परिवार की कमी कम महसूस हो। सभी के खान-पान, स्वास्थ्य और मनोरंजन का विशेष ध्यान रखा जाता है।
दो बेटों और दो बेटियों को मजदूरी कर पढ़ाया-लिखाया। बच्चे कमाने लगे तो बहुओं के दबाव में घर छोड़ना पड़ा। भटकते-भटकते वृद्धाश्रम पहुंचा हूं, लेकिन आज भी बच्चों के सुख-दुख की चिंता रहती है।- राम प्रसाद
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बेटों को पढ़ाया, उन्हें बेहतर जिंदगी दी। नौकरी मिलने के बाद वे दूर चले गए। यहां परिवार जैसा अपनापन मिल रहा है, लेकिन बच्चों की याद हर दिन आती है। - रवि प्रकाश
छह साल से आश्रम में हूं। परिवार का कोई हाल पूछने नहीं आया, लेकिन उम्मीद आज भी खत्म नहीं हुई। अब तो भगवान ही सहारा है। - देशराज
नाती-पोतों को गोद में खिलाया, कंधों पर बैठाकर खेत-खलिहान घुमाया। अब उम्र ढली तो बोझ समझा जाने लगा। फिर भी उनके लिए दुआ ही निकलती है।- राम गुलाम
फादर्स डे पर इन चेहरों की कहानी त्याग, संघर्ष और रिश्तों की बदलती तस्वीर को बयां करती है। आश्रम निदेशक आलोक राय बताते हैं कि यहां बुजुर्गों को घर जैसा माहौल देने का प्रयास किया जाता है, ताकि उन्हें परिवार की कमी कम महसूस हो। सभी के खान-पान, स्वास्थ्य और मनोरंजन का विशेष ध्यान रखा जाता है।
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दो बेटों और दो बेटियों को मजदूरी कर पढ़ाया-लिखाया। बच्चे कमाने लगे तो बहुओं के दबाव में घर छोड़ना पड़ा। भटकते-भटकते वृद्धाश्रम पहुंचा हूं, लेकिन आज भी बच्चों के सुख-दुख की चिंता रहती है।- राम प्रसाद
बेटों को पढ़ाया, उन्हें बेहतर जिंदगी दी। नौकरी मिलने के बाद वे दूर चले गए। यहां परिवार जैसा अपनापन मिल रहा है, लेकिन बच्चों की याद हर दिन आती है। - रवि प्रकाश
छह साल से आश्रम में हूं। परिवार का कोई हाल पूछने नहीं आया, लेकिन उम्मीद आज भी खत्म नहीं हुई। अब तो भगवान ही सहारा है। - देशराज
नाती-पोतों को गोद में खिलाया, कंधों पर बैठाकर खेत-खलिहान घुमाया। अब उम्र ढली तो बोझ समझा जाने लगा। फिर भी उनके लिए दुआ ही निकलती है।- राम गुलाम

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