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भारतीय संस्कृति के संरक्षण की भाषा है संस्कृत : प्रोफेसर बलराम
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Thu, 14 May 2026 03:02 AM IST
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फाजिलनगर। एसबीएम पीजी काॅलेज में बुधवार को गोष्ठी हुई। इसमें भारतीय संस्कृति का 21वीं सदी में संवर्धन विषय पर वक्ताओं ने अपने विचार रखते हुए भारतीय संस्कृति के संरक्षण में संस्कृत भाषा को संरक्षण बताया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बलराम शुक्ल ने कहा कि सनातन भावभूमि पर आधारित भारतीय आत्मप्रतिमा को उपनिवेशवादी मानसिकता ने खंडित करने का कार्य किया। संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति के संवर्धन और संरक्षण की प्रमुख वाहक है। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भाषा के रूप में सभी भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण भाषिक तत्व है, जो सदैव जीवंत और प्रासंगिक रहा है। विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर चंद्रेश ने कहा कि आधुनिक काल में संस्कृत की निरंतर जो रहे प्रगति ने यह सिद्ध किया है कि संस्कृत और भारतीय संस्कृति आज भी पूरी जीवंतता के साथ समाज में विद्यमान है। गोष्ठी को डीडीयू के संस्कृत विभाग के समन्वयक डॉ. देवेंद्र पाल आदि ने संबोधित किया। अध्यक्षता प्रबंधक शक्ति प्रकाश दीक्षित व संचालन संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कृष्णचंद चौरसिया ने किया। संवाद
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दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बलराम शुक्ल ने कहा कि सनातन भावभूमि पर आधारित भारतीय आत्मप्रतिमा को उपनिवेशवादी मानसिकता ने खंडित करने का कार्य किया। संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति के संवर्धन और संरक्षण की प्रमुख वाहक है। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भाषा के रूप में सभी भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण भाषिक तत्व है, जो सदैव जीवंत और प्रासंगिक रहा है। विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर चंद्रेश ने कहा कि आधुनिक काल में संस्कृत की निरंतर जो रहे प्रगति ने यह सिद्ध किया है कि संस्कृत और भारतीय संस्कृति आज भी पूरी जीवंतता के साथ समाज में विद्यमान है। गोष्ठी को डीडीयू के संस्कृत विभाग के समन्वयक डॉ. देवेंद्र पाल आदि ने संबोधित किया। अध्यक्षता प्रबंधक शक्ति प्रकाश दीक्षित व संचालन संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कृष्णचंद चौरसिया ने किया। संवाद
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