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Lakhimpur Kheri News: गन्ने की फसल पर बढ़ा कीटों का खतरा
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Sun, 03 May 2026 11:54 PM IST
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लखीमपुर खीरी। अप्रैल से जून तक गन्ने की फसल में अंकुर बेधक, जड़ बेधक और छोटी बेधक जैसे प्रमुख कीटों का खतरा बढ़ जाता है, जिससे फसल प्रभावित हो सकती है। जिला कृषि रक्षा अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह ने किसानों से समय रहते कीट एवं रोग प्रबंधन अपनाने की अपील की है।
उन्होंने बताया कि गन्ने की फसल पूरे वर्ष खेत में खड़ी रहती है, जिससे विभिन्न प्रकार के कीटों को आश्रय मिलता है और उनके जीवन चक्र को पूरा होने में मदद मिलती है। इसके कारण फसल को अधिक नुकसान पहुंचता है। अच्छी पैदावार और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए समय पर कीट प्रबंधन जरूरी है।
जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने बताया कि बेधक कीट गन्ने के तनों के भीतर सुरंग बनाकर पौधों के मध्य भाग को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे पौधे सूखने लगते हैं। इसे डेड हार्ट अवस्था कहा जाता है। प्रभावित भाग हटाने पर उसमें दुर्गंध भी पाई जाती है।
उन्होंने किसानों को सलाह दी कि समय-समय पर कृषि विभाग से संपर्क कर अनुदानित कृषि रक्षा रसायन प्राप्त करें तथा कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में फसल सुरक्षा उपाय अपनाएं। किसान पीसीएसआरएस प्रणाली और एनपीएसएस पोर्टल के माध्यम से भी रोग एवं कीटों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
कीट नियंत्रण के लिए क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी की 375 मिली मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
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यह रखें ध्यान
अंकुर बेधक, छोटी बेधक और जड़ सड़न रोगों पर विशेष नजर रखें।
प्रभावित पौधों को जड़ सहित उखाड़कर नष्ट करें, ताकि संक्रमण न फैले।
खेत में साफ-सफाई बनाए रखें और नियमित निगरानी करें।
प्रकाश ट्रैप और फेरोमोन ट्रैप का उपयोग कर कीटों की निगरानी एवं नियंत्रण करें।
जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोग्रामा का 15 दिन के अंतराल पर प्रयोग करें।
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उन्होंने बताया कि गन्ने की फसल पूरे वर्ष खेत में खड़ी रहती है, जिससे विभिन्न प्रकार के कीटों को आश्रय मिलता है और उनके जीवन चक्र को पूरा होने में मदद मिलती है। इसके कारण फसल को अधिक नुकसान पहुंचता है। अच्छी पैदावार और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए समय पर कीट प्रबंधन जरूरी है।
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जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने बताया कि बेधक कीट गन्ने के तनों के भीतर सुरंग बनाकर पौधों के मध्य भाग को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे पौधे सूखने लगते हैं। इसे डेड हार्ट अवस्था कहा जाता है। प्रभावित भाग हटाने पर उसमें दुर्गंध भी पाई जाती है।
उन्होंने किसानों को सलाह दी कि समय-समय पर कृषि विभाग से संपर्क कर अनुदानित कृषि रक्षा रसायन प्राप्त करें तथा कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में फसल सुरक्षा उपाय अपनाएं। किसान पीसीएसआरएस प्रणाली और एनपीएसएस पोर्टल के माध्यम से भी रोग एवं कीटों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
कीट नियंत्रण के लिए क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी की 375 मिली मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
यह रखें ध्यान
अंकुर बेधक, छोटी बेधक और जड़ सड़न रोगों पर विशेष नजर रखें।
प्रभावित पौधों को जड़ सहित उखाड़कर नष्ट करें, ताकि संक्रमण न फैले।
खेत में साफ-सफाई बनाए रखें और नियमित निगरानी करें।
प्रकाश ट्रैप और फेरोमोन ट्रैप का उपयोग कर कीटों की निगरानी एवं नियंत्रण करें।
जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोग्रामा का 15 दिन के अंतराल पर प्रयोग करें।
