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Lakhimpur Kheri: तराई इलाके में साठा धान की रोपाई शुरू, भूजल स्तर गिरने से जल संकट की चिंता
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Published by: Mukesh Kumar
Updated Tue, 21 Apr 2026 06:10 PM IST
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धान की रोपाई करते मजदूर
- फोटो : संवाद
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लखीमपुर खीरी के तराई क्षेत्र में साठा धान की रोपाई का सिलसिला शुरू हो गया है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि की उम्मीद है। हालांकि, इस फसल में अत्यधिक सिंचाई की आवश्यकता के कारण भूजल स्तर तेजी से नीचे गिरने की चिंताएं बढ़ गई हैं। कृषि विशेषज्ञ और स्थानीय लोग इस स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, जो भविष्य में जल संकट का कारण बन सकती है।
धौरहरा क्षेत्र के कफारा, टापरपुरवा और गोसाइनपुरवा समेत आसपास के गांवों में किसान गेहूं की कटाई के तुरंत बाद खेतों में साठा धान की रोपाई में जुट गए हैं। इन दिनों खेतों में किसानों और मजदूरों की चहल-पहल बढ़ गई है। किसान तेजी से रोपाई का कार्य कर रहे हैं।
किसानों का कहना है कि साठा धान की फसल कम समय में तैयार हो जाती है। इससे उन्हें एक ही सीजन में दो बार धान की खेती का मौका मिलता है। पहली फसल काटने के बाद अगस्त माह में दोबारा धान की रोपाई कर ली जाती है। यह दोहरी फसल उनकी आमदनी में इजाफा करती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
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धौरहरा क्षेत्र के कफारा, टापरपुरवा और गोसाइनपुरवा समेत आसपास के गांवों में किसान गेहूं की कटाई के तुरंत बाद खेतों में साठा धान की रोपाई में जुट गए हैं। इन दिनों खेतों में किसानों और मजदूरों की चहल-पहल बढ़ गई है। किसान तेजी से रोपाई का कार्य कर रहे हैं।
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किसानों का कहना है कि साठा धान की फसल कम समय में तैयार हो जाती है। इससे उन्हें एक ही सीजन में दो बार धान की खेती का मौका मिलता है। पहली फसल काटने के बाद अगस्त माह में दोबारा धान की रोपाई कर ली जाती है। यह दोहरी फसल उनकी आमदनी में इजाफा करती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
भूजल स्तर पर बढ़ता दबाव
कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों ने साठा धान की खेती को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस फसल में अत्यधिक सिंचाई की जरूरत होती है। इससे क्षेत्र में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। यदि इसी तरह साठा धान की खेती बढ़ती रही, तो आने वाले समय में जल संकट गहरा सकता है। यह स्थिति पर्यावरण और कृषि दोनों के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है।
जल संरक्षण के उपाय अनिवार्य
कृषि विभाग के जानकारों का कहना है कि किसानों को साठा धान के साथ-साथ जल संरक्षण के उपाय अपनाने चाहिए। वैकल्पिक फसलों और कम पानी वाली तकनीकों को बढ़ावा देकर ही भूजल स्तर को संतुलित रखा जा सकता है। विभाग ने किसानों से ऐसी पद्धतियों को अपनाने का आग्रह किया है। इससे न केवल पानी बचेगा, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहेगी।
कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों ने साठा धान की खेती को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस फसल में अत्यधिक सिंचाई की जरूरत होती है। इससे क्षेत्र में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। यदि इसी तरह साठा धान की खेती बढ़ती रही, तो आने वाले समय में जल संकट गहरा सकता है। यह स्थिति पर्यावरण और कृषि दोनों के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है।
जल संरक्षण के उपाय अनिवार्य
कृषि विभाग के जानकारों का कहना है कि किसानों को साठा धान के साथ-साथ जल संरक्षण के उपाय अपनाने चाहिए। वैकल्पिक फसलों और कम पानी वाली तकनीकों को बढ़ावा देकर ही भूजल स्तर को संतुलित रखा जा सकता है। विभाग ने किसानों से ऐसी पद्धतियों को अपनाने का आग्रह किया है। इससे न केवल पानी बचेगा, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहेगी।

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