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Maharajganj News: कीमती है इन ''दुकानों की धूल'', पूरे साल की बुक रखते हैं खरीदार

Mon, 17 Aug 2026 12:31 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 17 Aug 2026 12:31 AM IST
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The dust of these shops is precious; buyers keep them booked for the entire year.
आभूषण निर्माण व सफाई में निकलते सूक्ष्म कण, कहा जाता नियारा
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जिला मुख्यालय पर 12 सराफा कारोबारी तैयार कराते हैंडमेड ज्वैलरी
महराजगंज। यकीन मानिए कि जनपद के लगभग 12 दुकानों से निकलने वाली प्रतिदिन की धूल बड़ी कीमती है। इसकी खरीद के लिए पूरे साल की एडवांस बुकिंग होती है। तीन-तीन माह पर खरीदार धूल ले जाते हैं। एक साल के धूल की कीमत दो से तीन लाख रुपये है।
जनपद में अब अधिकतर आभूषणों का निर्माण मशीनों के जरिये किया जा रहा है। इसके बावजूद जनपद मुख्यालय पर 12 से अधिक सराफा कारोबारी अपने यहां हाथ से आभूषण तैयार करवाते हैं। सोने वा चांदी से आभूषण तैयार करने के दौरान उनकी घिसाई की जाती है। इस प्रक्रिया में इनके सूक्ष्म कण फर्श पर गिरकर धूल में मिल जाते हैं। इस धातु मिश्रित धूल को नियारा कहते हैं।
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सोने व चांदी के आभूषण बनाने वाले आशीष वर्मा ने बताया कि आभूषण तैयार करते समय सोने-चांदी की कटिंग व सफाई में महंगी धातुओं के सूक्षमकण निकलते रहते हैं। काफी सूक्ष्म होने के कारण यह आंख से नहीं दिखते। इसलिए दुकान की सफाई के बाद निकलने वाली हर दिन की धूल को डस्टबिन में सुरक्षित रखा जाता है। नियारा खरीदने के लिए दूरदराज से कारोबारी आते हैं।
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आभूषण कारीगर दुर्गा वर्मा ने बताया कि नियारा की डिमांड इसी बात से समझ सकते कि पूरे वर्ष की धूल खरीदने की बुकिंग खरीदार पहले ही कर लेते हैं। मौजूदा वक्त में रेडीमेड आभूषणों का दौर में भी मुख्यालय पर 12 से अधिक सराफा कारोबारी अपने यहां आभूषण बनाने का कार्य कराते हैं। इनके दुकान की 12 महीने की धूल (नियारा) दो से तीन लाख रुपये में बिकती है। इसके लिए खरीदार एडवांस भुगतान करते हैं।
नियारा गलाकर अलग करते कीमती धातु
जिले से नियारा खरीदने वाले गाजीपुर निवासी अल्तमस ने बताया कि जो कारोबारी हैंडमेड ज्वैलरी तैयार कराते हैं उनके यहां की धातु मिश्रित धूल कण को नियारा कहा जाता है। इसे खरीदकर हम अपने वर्कशाप पर लाते हैं और इसे उच्च तापमान पर गर्म करके शोधित करते हैं। इस प्रक्रिया से सोने व चांदी को अलग किया जाता है। एक दुकान के पूरे साल के नियारा से 70 से 75 हजार रुपये की आय होती है। नेपाल में आज भी हैंडमेड ज्वैलरी का क्रेज है। वहां से आने वाले नियारा में अधिक कमाई की संभावना रहती है। महराजगंज में अल्तमस ने इस वर्ष चार दुकानों से नियारा उठाने की बुकिंग दो-दो लाख रुपये में की है। तीन महीने पर इसे उठाने के लिए आते हैं।
नेपाल में बरकरार हैंडमेड ज्वैलरी का क्रेज
भारतीय क्षेत्र में भले ही मशीनों के आने से हैंडमेड ज्वैलरी का क्रेज घटा है लेकिन नेपाल में अभी भी हैंडमेड ज्वैलरी का क्रेज है। नेपाल के छोटे से छोटे दुकान का नियारा दो से तीन लाख रुपये में पूरे साल के लिए बुक होता है। पिछले सप्ताह नेपाल से 13.62 टन नियारा डीसीएम पर लादकर भारत बिना कस्टम शुल्क चुकाए के लाया जा रहा था। यह नियारा कुल 125 बोरियो में भरा था जिसे कस्टम ने जब्त कर लाने वालों पर जुर्माना लगाया। इस कार्रवाई के बाद नियारा भारतीय क्षेत्रों में चर्चा का विषय बना है।
स्पीअप
हैंडमेड ज्वैलरी का क्रेज पहले की अपेक्षा घटा है। जब दुकान का संचालन बाबा करते थे तब बड़े पैमाने पर आभूषण निर्माण होता था। 10 से अधिक कारीगर आभूषण तैयार करते थे। उस समय दुकान की धूल (नियारा) पांच- पांच लाख रुपये में बुक होती थी। आज सिर्फ पांच कारीगर ही हैं। तब भी प्रत्येक वर्ष दो से तीन लाख रुपये का नियारा बिक जाता है।
-राजकुमार वर्मा, सराफा कारोबारी, गोरखपुर रोड महराजगंज
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मशीन निर्मित आभूषण वजन में हल्के व आकर्षक होते हैं। इसलिए पारंपरिक डिजाइन की हैंडमेड ज्वैलरी कम बिकती है। इस वर्ष मेरे दुकान की धूल (नियारा) तीन लाख रुपये में बुक है। बुक करने वाले तीन-तीन माह पर उठान के लिए आते हैं।

-अनिल वर्मा, सराफा कारोबारी,निचलौल रोड महराजगंज।
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नेपाल में अभी भी हाथ से बने सोने व चांदी के आभूषणों का क्रेज है। इस वजह से नेपाल से मिलने वाला नियारा महंगी कीमत का होता है। अधिकतर खरीदार इसे नेपाल से कस्टम शुल्क देकर खरीदकर ले जाते हैं। पिछले सप्ताह 125 बोरी नियारा बिना कस्टम शुल्क जमा किए नेपाल से भारत कुछ लोग ले जा रहे थे। जांच करते समय मामला पकड़ में आया तो जुर्माना लगाकर छोड़ा गया।
-सुधीर त्यागी , असिस्टेंट कमिश्नर, कस्टम सोनौली, महराजगंज।
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