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UP: 'हिंदू समाज दूसरे की वीरता से नहीं, आपसी फूट से हारा', संघ प्रमुख मोहन भागवत बोले- भेदभाव मुक्त हो भारत

संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Sat, 10 Jan 2026 02:45 PM IST
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सार

वृंदावन की पावन धरती पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का आगमन हुआ। उन्होंने श्री सुदामा कुटी शताब्दी महोत्सव का शुभारंभ किया। इससे पूर्व उन्होंने चंद्रोदय मंदिर में दर्शन किए। 

Mohan Bhagwat Visits Chandrodaya Temple, Personally Distributes Meals to Children
सुदामा कुटी शताब्दी महोत्सव का शुभारंभ। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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वृंदावन में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने कहा कि सभी हिंदुओं को एकजुटता के साथ राष्ट्र व समाज की उन्नति के लिए प्रयास करने होंगे। हिंदू समाज कभी किसी दूसरे के बल, वीरता और शौर्य से हारा नहीं है। जब भी पराजय हुई तो हिंदुओं में फूट के कारण हुई। इसलिए भेदभाव मुक्त भारत होगा तो एकता होगी। संत समाज भी चाहता है कि भेदभाव मुक्त भारत हो।
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यह विचार उन्होंने शनिवार को नगर के कुंभ क्षेत्र में सुदामा कुटी के शताब्दी महाेत्सव में व्यक्त किए। उन्होंने धर्म के साथ हिंदू एकता, राष्ट्रधर्म, संत महापुरुषों से संघ के पंच परिवर्तन को जोड़ते वर्तमान परिस्थितियों का मुकाबला करने का आह्वान किया। कहा कि भगवान रामानंदाचार्य ने भी भक्ति और समरसता का संदेश दिया कि अपने स्वार्थ की हानि करके भी अपनों की हानि नहीं होने देना है। उन्होंने कहा कि पराए के लिए कर्म करने की रुचि नहीं होगी, इसलिए हम सभी अपने हैं। यह भाव जागृत होगा तभी अपनों के साथ खड़े होने की क्षमता आएगी।
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संघ प्रमुख ने कहा कि हमारा राष्ट्र ही धर्म के लिए बना है। इसका निर्माण इसलिए हुआ कि समय-समय पर दुनिया को धर्म ज्ञान से आलोकित करें। धर्म जीवन कैसे जिया जाए, इसकी शिक्षा दें। इसके लिए देशवासियों का जीवन ऐसा होना चाहिए कि हमारे चरित्र को देख कर दुनिया शिक्षा ग्रहण करें।

उन्होंने कहा कि भारत एक हैं, लेकिन दुनिया भारत में विभिन्न भाषा, जाति के रूप में हिंदुओं को बांटकर देखती है। दुनिया की दृष्टि को देखते हुए वह जितने प्रकार के हिंदू मानती है, उतने ही प्रकार के सभी के मित्र होने चाहिए। सभी जाति, धर्म, भाषा के लोगों से मित्रतावत रिश्ता रखना होगा। भगवान रामानंदाचार्य से भी सभी को जोड़ने को संदेश मिला है। इस संदेश को अपने जीवन में उतारने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि ऊपर की एकता समय-परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती है, लेकिन अंदर की एकता कभी नहीं बदलती। उसके साथ जोड़ने पर पता चलता है कि बस अपने हैं। इसके लिए जरूरी है कि एकांत साधना, स्वयं को पहचानना है। स्वयं को पहचानना। संत सुदामा दास महाराज ने भी अपने जीवन से यही संदेश दिया है। संघ का कुटुंब प्रबोधन की अवधारणा भी इसी का अंग है। जो व्यवहार हमारी संस्कृति ने हमें पढ़ाया है, वहीं हमें अपने कुटुंब के बच्चों को पढ़ाना है कि अपने और अपने परिवार के लिए जो प्रतिदिन करते हो, वह समाज के लिए भी करो। 

उन्होंने पंच परिवर्तन के पर्यावरण विषय पर कहा कि पर्यावरण और हम अलग नहीं। इसलिए इसे संतुलित रखना है। पश्चिम के लोग मानते हैं कि भारतवासी सृष्टि के स्वामी हैं, जबकि हमारे पूर्वजों ने बताया कि हम सृष्टि के स्वामी नहीं अंग है। उसी भाव से इस मिट्टी के प्रति अपनापन भी इसलिए आता है। उन्होंने भावगत में आये शकुंतला जब दुष्यंत के यहां जाने के वर्णन का प्रकृति से जुड़ाव के मार्मिक भाव को प्रकट किया।
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