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सियासत: सोशल मीडिया पर लिखी जा रही जीत की पटकथा, विधायक से लेकर गांव के प्रधान तक बना रहे डिजिटल वॉर रूम

Thu, 09 Jul 2026 04:31 PM IST
Dimple Sirohi Dimple Sirohi
Updated Thu, 09 Jul 2026 04:31 PM IST
सार

मेरठ में चुनावी राजनीति तेजी से डिजिटल होती जा रही है। विधायक से लेकर प्रधान पद के उम्मीदवार तक सोशल मीडिया, डिजिटल वॉर रूम और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से चुनावी रणनीति तैयार कर रहे हैं।

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Digital War Rooms Reshape Elections, From MLAs to Village Heads Betting on Social Media
मेरठ में चुनावी तैयारी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज के दौर में लोकतंत्र का उत्सव सिर्फ रैलियों, लाउडस्पीकरों और पर्चों तक सीमित नहीं रह गया है। राजनीति का पारंपरिक अखाड़ा अब स्मार्टफोन की स्क्रीन पर शिफ्ट हो चुका है। सियासत का डिजिटल एल्गोरिदम अब वह अदृश्य शक्ति बन चुका है जो तय करता है कि जनता का मूड किस तरफ मुड़ेगा। 

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चुनावी मैदान में अब सिर्फ राजनीतिक विश्लेषक नहीं बल्कि डेटा साइंटिस्ट, कंटेंट क्रिएटर्स और तकनीकी विशेषज्ञों का दबदबा बढ़ गया है। विधानसभा चुनाव की तैयारी हों या पंचायत चुनाव, सोशल मीडिया के जरिए जीत की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है।

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पहले सिर्फ राष्ट्रीय पार्टियां या बड़े पद के उम्मीदवार ही पीआर एजेंसियों और चुनावी रणनीतिकारों को काम पर रखते थे लेकिन आज बाजार का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मेरठ में हर विधानसभा क्षेत्र में एक समर्पित वॉर रूम है जहां ग्राफिक्स डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर्स 24 घंटे काम कर रहे हैं। अब स्थानीय स्तर के चुनावों में भी डिजिटल मार्केटिंग का क्रेज सिर चढ़कर बोल रहा है। 

गांव के प्रधान पद के उम्मीदवार भी अपनी रील बनवाने, व्हाट्सएप ग्रुप्स को मैनेज करने और सोशल मीडिया पर विज्ञापन चलाने के लिए स्थानीय डिजिटल एजेंसियों को लाखों रुपये का ठेका दे रहे हैं। राजनीतिज्ञों का मानना है कि आज के समय में भारी-भरकम भाषणों से ज्यादा असर रील या मजेदार मीम डालते हैं।

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जनता की नब्ज पर पकड़
डिजिटल युग में चुनावी रणनीतियों को पूरी तरह बदल दिया गया है। अब मतदाताओं को लुभाने के लिए केवल नारों का सहारा नहीं लिया जाता बल्कि डेटा माइनिंग के जरिए उनके व्यवहार को समझा जाता है।

तकनीकी टीमें हर बूथ, हर मोहल्ले और यहां तक कि व्यक्तिगत स्तर पर मतदाताओं की पसंद, जाति, उम्र और आर्थिक स्थिति का डेटा जुटाती हैं। मेरठ में इस तरह की कई कंपनियां भी हैं जो दावा करती हैं कि डेटा, रणनीति, कंटेंट और रचनात्मकता के दम पर वह नेता की छवि को मजबूत करते हैं और उनकी चुनावी जीत की राह आसान बनाते हैं। ये कंपनियां शहर से लेकर गांव तक अपनी पैठ जमा रही हैं।

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