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Interview: निजामी बंधु बोले-आजादी सिर्फ तारीख नहीं, भाईचारे से खुलकर जीने का नाम, दिलों को जोड़ता है संगीत

Fri, 14 Aug 2026 12:58 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Fri, 14 Aug 2026 12:58 PM IST
सार

मेरठ में अमर उजाला के मां तुझे प्रणाम अभियान के तहत आयोजित जश्न-ए-आजादी कार्यक्रम में प्रस्तुति देने पहुंचे निजामी बंधुओं ने आजादी, संगीत और सूफियाना कलाम पर खुलकर बात की।

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Meerut: Nizami Brothers on Freedom, Sufi Music and Qawwali, Music Connects Hearts and Borders
निजामी बंधु, सूफी गायक - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जश्न-ए-आजादी के मौके पर मेरठ में सूफियाना संगीत की खास महफिल सजी है। अमर उजाला के ‘मां तुझे प्रणाम’ अभियान के तहत आयोजित कार्यक्रम में देश-दुनिया में अपनी खास पहचान बना चुके निजामी बंधु अपनी आवाज और सूफियाना कलाम से शाम को रूहानी रंग दिया। हजरत निजामुद्दीन औलिया के दरबार से जुड़ी कई पीढ़ियों की संगीत विरासत को आगे बढ़ा रहे शादाब निजामी और सोहराब निजामी से संगीत, सूफियाना कलाम, बदलते दौर में कव्वाली की लोकप्रियता, नई पीढ़ी के संगीत प्रेम और आजादी के मायनों पर डिम्पल सिरोही ने की खास बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश।

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सवाल: आपके लिए आजादी के क्या मायने हैं? 
जवाब: आजादी हमारे लिए बहुत मायने रखती है। 1947 में जब हमारा देश आजाद हुआ, वह बहुत परेशानी और संघर्ष का वक्त था। आजादी के बाद देश में बहुत बदलाव आया। हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी प्रेम बढ़ा। आजादी का मतलब है कि हम अपने हिंदुस्तान में खुलकर जिएं और एक-दूसरे से प्रेम से रहें।
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क्या आजादी का मतलब सिर्फ एक तारीख, तिरंगा और जश्न है या इससे कहीं बड़ा अहसास है?
जवाब: बिल्कुल, जश्न तो होना ही चाहिए। आजादी शब्द ही हमारे लिए बहुत मायने रखता है। यह हर हिंदुस्तानी के लिए खास है। आजादी सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि खुलकर जीने और एक-दूसरे के साथ प्रेम और भाईचारे से रहने का नाम है।
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यह भी पढ़ें: मां तुझे प्रणाम: दिल दिया है जान भी देंगे...से गूंजा सभागार, कविता-शायरी-सूफी सुरों पर झूमा शहर, लहराए तिरंगे

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निजामी बंधु, सूफी गायक - फोटो : अमर उजाला
सवाल: संगीत दिलों के साथ सरहदों को भी जोड़ता है, आपके लिए संगीत की क्या अहमियत है?
जवाब: हमारे लिए संगीत एक इबादत है। आप कव्वाली गाएं, भजन गाएं या कोई और संगीत की विधा प्रस्तुत करें, संगीत का मूल भाव एक ही है। कलाकार के लिए सभी धर्म और मजहब एक हैं। संगीत लोगों को आपस में जोड़ता है। संगीत आपको ईश्वर से जोड़ता है। यह केवल दिलों को ही नहीं जोड़ता, बल्कि देशों और उनकी सरहदों के बीच भी दूरी कम करता है।

सवाल: संगीत के इतने रूप हैं, फिर सूफियाना कलाम और कव्वाली को ही क्यों चुना?
जवाब: हमारा ताल्लुक हजरत निजामुद्दीन औलिया के दरबार से है। हम वहां के कव्वाल हैं। हमारे दादा-परदादा भी वहां अपनी श्रद्धा और हाजिरी पेश करते आए हैं। सूफियाना कलाम हमें वहीं से मिला। बचपन से हमें सिखाया गया कि सूफी कलाम के जरिए सूफी संतों की इबादत करनी है और उनके सामने अपनी हाजिरी पेश करनी है। इसलिए सूफी कलाम में हमें आज भी बहुत सुकून मिलता है।

सवाल:  न्यू जेनरेशन तक कव्वाली और सूफियाना कलाम पहुंचाना कितना चुनौतीपूर्ण है?
जवाब: यह बहुत खुशी की बात है। आज की न्यू जेनरेशन कव्वाली बहुत सुन रही है और उसे सराह भी रही है। हमें भी उन्हें उनके अंदाज में सूफी संगीत पहुंचाने में और उन्हें सुनने में मजा आता है। असल बात यह है कि जब कोई कलाकार दिल से गाता है तो उसकी आवाज सामने वाले के दिल तक पहुंचती है। सूफी कलाम की खूबसूरती ही यही है कि इसे दिल से गाया जाए।

सवाल: क्या सूफियाना कलाम की असली ताकत उसकी भावनाओं और दिल से जुड़ने में है?
जवाब: बिल्कुल। सूफी का मतलब ही है कि वह आपको परवरदिगार से जोड़ता है। हम आम और मशहूर कव्वालियां गाएं, वह अलग बात है, लेकिन जब सूफी कलाम की बात आती है तो उसका मकसद आपको ऊपरवाले से जोड़ना होता है। यही सूफियाना कलाम की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

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मां तुझे प्रणाम कार्यक्रम, अमर उजाला मेरठ - फोटो : अमर उजाला
सवाल: फिल्म 'रॉकस्टार' में मौका कैसे मिला और इस अनुभव को आप किस तरह देखते हैं?
जवाब: रॉकस्टार में हमें जो मौका मिला, उसके पीछे हमारे दरबार और हमारे पीर साहब का बहुत बड़ा आशीर्वाद है।  हजरत निजामुद्दीन औलिया और हजरत अमीर खुसरो का दरबार ही हमारा घर है। वहां के सज्जादानशीन और चेयरमैन सय्यद असरार निजामी साहब हमसे बड़ी मोहब्बत करते हैं।

रॉकस्टार की शूटिंग के दौरान एआर रहमान साहब और इम्तियाज अली साहब की इच्छा थी कि फिल्म में जो कव्वाली दिखाई जाए, वह उसी दरगाह के असली कव्वालों पर फिल्माई जाए। उन्होंने हमारी मुलाकात इम्तियाज अली साहब और एआर रहमान साहब से कराई और कहा कि ये हमारे बच्चे हैं, हमारे छोटे भाई हैं और हमारे दरगाह के कव्वाल हैं। आप इन्हें मौका दें। इस तरह हमें रॉकस्टार में काम करने का अवसर मिला।  

सवाल: क्या इस तरह के अनुभवों ने आपके भीतर यह विश्वास और मजबूत किया कि आपका जीवन कव्वाली, सूफियाना कलाम और संगीत के लिए ही है?
जवाब: बिल्कुल। मैं समझता हूं कि मैं इस फील्ड से जुड़ी 31वीं-32वीं पीढ़ी हूं। जब कोई चीज इतनी पीढ़ियों से आपकी विरासत में चली आ रही हो तो उसके साथ एक अलग तरह का जुड़ाव और एहसास पैदा होता है। एक रूहानी और आध्यात्मिक माहौल अपने आप बन जाता है। हम मानते हैं कि पढ़ाई-लिखाई भी जरूरी है, लेकिन संगीत हमारे खून में है। हम इसे सीखना न भी चाहें, तब भी यह विरासत अपने आप हमारे भीतर आ जाती है। तबला बजाना हो या गाना हो, बहुत कुछ अपने आप आने लगता है। यह हमारे लिए सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है।

सवाल: कव्वाली संगीत की एक खूबसूरत विधा है। इस विरासत को आगे ले जाने की जिम्मेदारी को आप किस तरह महसूस करते हैं?
जवाब:
हमारे दादा-परदादा इसी काम से जुड़े रहे हैं। हमारा इसके अलावा कोई दूसरा काम या बिजनेस नहीं है। संगीत ही हमारी जिंदगी है। संगीत ऐसी चीज है जो आपको सीधे भगवान से जोड़ सकती है, बशर्ते आपके दिल में अपने प्रभु, अपने अल्लाह को याद करने का पक्का अकीदा हो। हम कोशिश करते हैं कि जितना हमसे हो सके, इस विरासत को आगे पहुंचाएं।

हम अपने बच्चों से भी यही कहते हैं। मेरे तीन बेटे हैं और हमारे बच्चे भी संगीत की ओर रुझान रखते हैं। हमारी कोशिश यही है कि जितना हमसे हो सके, इस विरासत को आगे ले जाएं। जब तक जिंदगी है, हम इस काम को बरकरार रखेंगे और चाहेंगे कि हमारी औलाद भी इसे आगे बढ़ाए।
 

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निजामी बंधु, सूफी गायक - फोटो : अमर उजाला
सवाल: संगीत में रियाज और अनुशासन कितना महत्वपूर्ण है?
जवाब:
रियाज बहुत जरूरी है। चाहे कोई हारमोनियम बजाने वाला हो, गायक हो या तबला बजाने वाला, रियाज के बिना सब अधूरा है। अगर रोजाना कार्यक्रम होता है तो उसी से हमारा रियाज भी हो जाता है। जिस दिन कार्यक्रम नहीं होता, उस दिन भी हम अपने बच्चों और साथियों के साथ बैठकर दो से तीन घंटे, कभी साढ़े तीन घंटे तक रियाज करते हैं। संगीत में आगे बढ़ने के लिए रियाज सबसे जरूरी चीजों में से एक है।

सवाल: आज नई पीढ़ी के कई बच्चे संगीत, कव्वाली और सूफियाना कलाम सीख रहे हैं। आपको उनमें किस तरह का अनुशासन दिखाई देता है? क्या आपको लगता है कि पहले की पीढ़ी के मुकाबले इसमें कुछ कमी आई है?
जवाब: नहीं, ऐसा नहीं है। वे संगीत के साथ प्रयोग कर रहे हैं। आज संगीत बहुत आगे बढ़ चुका है। पॉप म्यूजिक है, नए-नए इंस्ट्रूमेंट्स इस्तेमाल हो रहे हैं। हम भी कभी-कभी फ्यूजन ग्रुप के साथ कोलेबरेशन करते हैं और ऐसे कार्यक्रम कर चुके हैं। लेकिन सूफी संगीत की बात अलग है। हमारी कोशिश रहती है कि हमारा पारंपरिक काम अपनी जगह बरकरार रहे।

सवाल: आपने हजरत अमीर खुसरो का जिक्र किया। उनके कलाम के बिना तो यह बातचीत अधूरी लगेगी। क्या हमारे दर्शकों के लिए उनका कोई कलाम सुनाएंगे?
जवाब: बिल्कुल। जो कलाम मैं यहां सुना रहा हूं, उसे कार्यक्रम में भी पेश करूंगा। हजरत अमीर खुसरो का बेहद मशहूर कलाम है-‘छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके।’ यह कलाम हम आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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निजामी बंधु, सूफी गायक - फोटो : अमर उजाला
सवाल: Gen Z का म्यूजिक टेस्ट तेजी से बदल रहा है। आज की युवा पीढ़ी हिप-हॉप, रैप और इंडी पॉप सुन रही है। इस बदलते म्यूजिक ट्रेंड को आप किस तरह देखते हैं? क्या सूफियाना कलाम के साथ फ्यूजनकी जरूरत है?
जवाब: बिल्कुल, आज की नई जेनरेशन हर तरह का संगीत पसंद करती है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि उन्हें सूफी संगीत पसंद नहीं है। कई बार हमारे पास ऐसी-ऐसी फरमाइशें आती हैं, जो बिल्कुल पुराने जमाने की मशहूर कव्वालियां हैं। जब यंग जेनरेशन उन कव्वालियों की फरमाइश करती है तो हमें बहुत खुशी होती है। पुरानी कव्वालियां जब फिल्मों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं तो उनका दोबारा चलन शुरू हो जाता है। उदाहरण के तौर पर बजरंगी भाईजान में ‘भर दो झोली मेरी या मोहम्मद’ जैसे करीब 50 साल पुराने कलाम को जगह मिली और नई जेनरेशन ने उसे बहुत पसंद किया। 

इसी तरह ‘ना तो कारवां की तलाश है’ भी कई दशक पुराना कलाम है। जब उसे नए अंदाज और संगीत के साथ पेश किया गया तो आज की युवा पीढ़ी ने उसे फिर से पसंद किया। इससे यही पता चलता है कि अगर रूह तक संगीत पहुंचाना है तो वह किसी न किसी रूप में नई पीढ़ी तक पहुंच ही जाता है।

सवाल: अमर उजाला के ‘मां तुझे प्रणाम’ अभियान के तहत मेरठ में होने वाले जश्न-ए-आजादी कार्यक्रम के लिए आप क्या खास संदेश देना चाहेंगे?
जवाब: इंशाअल्लाह, सबसे पहले तो हम बहुत-बहुत शुक्रगुजार हैं कि ‘मां तुझे प्रणाम’ के जश्न-ए-आजादी कार्यक्रम में हमें याद किया गया। इसके लिए हम एक शेर कहना चाहेंगे-
‘ह’ से हिंदू बन गए और ‘म’ से मुस्लिम बने,
‘ह’ ‘म’ जब मिल गई, तब हम बने।’

यही हमारे हिंदुस्तान की खूबसूरती है कि हम सब मिलकर एक हैं और मोहब्बत के साथ रहते हैं।

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मां तुझे प्रणाम कार्यक्रम, अमर उजाला मेरठ - फोटो : अमर उजाला

सवाल: मेरठ की जनता के लिए कुछ कहना चाहेंगे?
जवाब: मेरठ की जनता का प्यार हमेशा हमें मिलता रहा है। यहां आकर हमें बहुत अच्छा लगता है। हम मेरठ के लोगों के बहुत शुक्रगुजार हैं और उम्मीद करते हैं कि आज के जश्न-ए-आजादी के कार्यक्रम में भी हमें उनका वही प्यार और मोहब्बत मिलेगी।

सवाल: मेरा आखिरी सवाल आपसे है। जो युवा और नए बच्चे संगीत के क्षेत्र में आ रहे हैं, उनके लिए आपका क्या संदेश है?
जवाब: हमारा युवाओं के लिए यही संदेश है कि युवा ही देश का भविष्य हैं। आने वाला वक्त उन्हीं का है। वे अपने लक्ष्य पर ध्यान दें और अपनी मेहनत और संस्कारों को कभी न छोड़ें। मैं एक शेर कहना चाहूंगा -
‘बेवफा लोगों से उम्मीद-ए-वफा मत रखना,
दिल को लुट जाओगे, दरवाजा खुला मत रखना।
तुमको दुनिया में तरक्की की जरूरत है अगर,
तो अपने मां-बाप को अपने से जुदा मत रखना।’


यही हमारा संदेश है कि जीवन में चाहे जितनी तरक्की करें, अपने मां-बाप और अपनी जड़ों को कभी खुद से दूर न करें। 

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