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UP: मोहसिना किदवई ने मेरठ को दिलाया था महानगर पालिका का दर्जा, नौचंदी भी चलवाई, पुराने नेताओं ने बताए किस्से
अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ
Published by: Mohd Mustakim
Updated Thu, 09 Apr 2026 09:10 AM IST
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सार
Meerut News: मेरठ से तीन बार सांसद रहीं मोहसिना किदवई का इंतकाल हो गया। उनका क्रांति धरा से खास नाता रहा। दिल्ली निजामुद्दीन स्थित कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। शहर के कांग्रेसियों ने उन्हें याद किया और श्रद्धांजलि दी।
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मोहसिना किदवई का निधन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
मेरठ संसदीय सीट से तीन बार सांसद रहीं कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री मोहसिना किदवई (94) शहरवासियों के दिल में हमेशा बनी रहेंगी। उनका इस क्रांति धरा से खास नाता रहा है। यहां की जनता को नौचंदी एक्सप्रेस का तोहफा भी उन्होंने दी दिलाया था। इतना ही नहीं, महानगर पालिका का दर्जा भी उनके विशेष प्रयासों से मिला था। 1978 में हुए उपचुनाव के अलावा 1980 और 1984 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने देश की सबसे बड़ी पंचायत में मेरठ का प्रतिनिधित्व किया।
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कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मोहसिना किदवई
- फोटो : AI generated
कांग्रेस के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष डॉक्टर यूसुफ कुरैशी मोहसिना किदवई से जुड़ी यादें ताजा कर भावुक हो जाते हैं। वह कहते हैं कि मोहसिना का जाना सियासत के एक युग का अंत है। वह मेरठ की पहली महिला सांसद थीं। साल 1978 में उन्होंने जनता पार्टी के राम चंद्र विकल को हराया था। 1980 में उन्होंने जेएनपीएस के हरीश पाल को हराया था। 1984 में एलकेडी के मंजूर अहमद को हराकर वह सांसद चुनी गई थीं। उन्होंने हरीश पाल को 57,217 वोटों से हराया था और लोकदल के मंजूर अहमद को 96,518 वोटों से पराजित किया था।
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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों में उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों का दायित्व संभाला। उनके इंतकाल की खबर मिलने के बाद कई कांग्रेसी बुधवार को नोएडा सेक्टर-40 स्थित उनके आवास पर पहुंचे और खिराज-ए-अकीदत पेश की। दिल्ली निजामुद्दीन स्थित कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। कांग्रेस के जिलाध्यक्ष गौरव भाटी, कांग्रेसी नेता मोहम्मद इमरान, महानगर अध्यक्ष रंजन शर्मा, पूर्व जिलाध्यक्ष अविनाश काजला और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दीपक शर्मा ने संवेदना व्यक्त की है।
...जब दिलाया सैयद जकीउद्दीन को टिकट
1980 में सरधना से कांग्रेस से विधायक रहे सैयद जकीउद्दीन के बेटे रिहानुद्दीन बताते हैं कि उनके पिता की जगह सरधना से कांग्रेस से किसी और विधानसभा चुनाव का टिकट हो गया था। यह बात जब मोहसिना किदवई को पता चली तो वह रात में ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलीं और उनके पिता को टिकट कराया।
1980 में सरधना से कांग्रेस से विधायक रहे सैयद जकीउद्दीन के बेटे रिहानुद्दीन बताते हैं कि उनके पिता की जगह सरधना से कांग्रेस से किसी और विधानसभा चुनाव का टिकट हो गया था। यह बात जब मोहसिना किदवई को पता चली तो वह रात में ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलीं और उनके पिता को टिकट कराया।
1987 के दंगों में चुप्पी पर उठे थे सवाल
मोहसिना किदवई को बेहद ही शांत स्वभाव वाला माना जाता था। वह एक निर्विवाद शख्सियत थीं। एक बार जब 1987 में मेरठ दंगों की भीषण आग में झुलसा था, तब उनकी चुप्पी को लेकर कुछ लोगों ने सवाल जरूर खड़े किए थे। हालांकि उस वक्त कुछ लोगों ने मोहसिना किदवई की इस चुप्पी को राजनीतिक संतुलन के रूप में परिभाषित किया था।
मोहसिना किदवई को बेहद ही शांत स्वभाव वाला माना जाता था। वह एक निर्विवाद शख्सियत थीं। एक बार जब 1987 में मेरठ दंगों की भीषण आग में झुलसा था, तब उनकी चुप्पी को लेकर कुछ लोगों ने सवाल जरूर खड़े किए थे। हालांकि उस वक्त कुछ लोगों ने मोहसिना किदवई की इस चुप्पी को राजनीतिक संतुलन के रूप में परिभाषित किया था।
पार्टी नेताओं ने मना किया, फिर भी किया दुकान का उद्घाटन
नायब शहर काजी जैनुर राशिदीन सिद्दीकी ने मोहसिना किदवई के इंतकाल पर अफसोस जताते हुए दिलचस्प संस्मरण साझा किया। बताया कि 1984 में उन्होंने हापुड़ अड्डे पर एक कबाब की दुकान का उद्घाटन का अनुरोध मोहसिना किदवई से किया था। कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें मना किया कि दुकान कबाब की है इसलिए उद्घाटन न करें, गलत संदेश जाएगा। नायब शहर काजी बताते हैं कि मोहसिना किदवई ने किसी की नहीं सुनी। अलबत्ता मेरे कहे का मान रखा और दुकान का उद्घाटन किया। वह दुकान अब भी है।
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नायब शहर काजी जैनुर राशिदीन सिद्दीकी ने मोहसिना किदवई के इंतकाल पर अफसोस जताते हुए दिलचस्प संस्मरण साझा किया। बताया कि 1984 में उन्होंने हापुड़ अड्डे पर एक कबाब की दुकान का उद्घाटन का अनुरोध मोहसिना किदवई से किया था। कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें मना किया कि दुकान कबाब की है इसलिए उद्घाटन न करें, गलत संदेश जाएगा। नायब शहर काजी बताते हैं कि मोहसिना किदवई ने किसी की नहीं सुनी। अलबत्ता मेरे कहे का मान रखा और दुकान का उद्घाटन किया। वह दुकान अब भी है।
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