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पश्चिमी यूपी में ऐसे बिगड़ा गठबंधन का 'खेल', इस वर्ग का मिलता वोट तो हो जाती नैया पार

अमित मुदगल, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Sat, 25 May 2019 10:35 AM IST
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Uttar Pradesh Lok Sabha Election 2019: SP BSP alliance does not get OBC votes in western UP
अखिलेश यादव और मायावती - फोटो : अमर उजाला
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गठबंधन की सोशल इंजीनियरिंग के साथ वेस्ट यूपी में ओबीसी का साथ कम ही मिला। उम्मीद यह थी कि ओबीसी इस तरफ मुड़ेगा और नैया पार हो जाएगी। वेस्ट की तीन सीटों जहां ओबीसी ने दलित-मुस्लिम समीकरण के साथ अपनी ताल मिला ली, वहीं पर गठबंधन उम्मीदवार जीत गए।

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वेस्ट यूपी की कई अहम सीटों पर तगड़े मुकाबले रहे। मेरठ में जबरदस्त मुकाबला हुआ। भाजपा के राजेंद्र अग्रवाल और गठबंधन प्रत्याशी हाजी याकूब कुरैशी के बीच जबरदस्त टक्कर हुई। यह तो साफ हो गया कि याकूब कुरैशी को दलित-मुस्लिम वोटरों ने एकतरफा वोट किया क्योंकि उन्हें 5 लाख 81 हजार वोट मिले। हालांकि उन्हें अन्य वर्ग का भी वोट मिला। लेकिन यह समीकरण भाजपा उम्मीदवार राजेंद्र अग्रवाल की राह रोक नहीं पाया। 47 सौ वोटों से राजेंद्र अग्रवाल जीत गए। 
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अहम बात यह रही कि ओबीसी इसमें भी अति पिछड़ों के भाजपा की तरफ जा रहे अंडर करंट को गठबंधन रोक नहीं पाया। यही अन्य सीटों पर भी हुआ। हालांकि सहारनपुर, बिजनौर और नगीना सीट पर गठबंधन काम कर गया। सहारनपुर में फजलुर्रहमान को दलित-मुस्लिम के साथ कुछ ओबीसी वोट भी मिला। नतीजा, यहां गठबंधन की राह आसान हो गई। बिजनौर में सोशल इंजीनियरिंग ने जमकर काम किया। दलित-मुस्लिम वोटों के अलावा मलूक नागर को गुर्जर व अन्य वोट मिले। ऐसे में सत्तर हजार वोटों से ज्यादा से मलूक जीत गए। नगीना में भी यही समीकरण काम आया। एक लाख 66 हजार वोटों से गिरीश चंद ने भाजपा के सीटिंग एमपी डॉ. यशवंत को चारों खाने चित कर दिया।

शिद्दत के साथ नहीं किया रुख 
अन्य सीटों पर ओबीसी ने शिद्दत के साथ गठबंधन का रुख किया ही नहीं। मुजफ्फरनगर में चौ. अजित सिंह की जीत का समीकरण दलित मुस्लिमों के अलावा जाट वोटों पर टिका था। खास बात यह रही कि जाट वोटें चौ. अजित सिंह के साथ ही भाजपा की तरफ भी खूब गईं। इसके अलावा सैनी, कश्यप, माली, प्रजापति आदि का वोट एकतरफा भाजपा को ही मिला। परिणाम यह रहा कि संजीव बालियान फिर से साढ़े छह हजार वोटों से जीत गए। जीत का यह अंतर बेहद कम रहा और मुकाबला भी बेहद तगड़ा रहा। 

इन सीटों पर ये रहा हाल
बागपत में भी दलित-मुस्लिम समीकरण के अलावा ओबीसी के वोटों पर रालोद की निगाह थी। रालोद इन वोटों में कम सेंध लगा पाई। 23 हजार वोटों से ज्यादा से डॉ. सत्यपाल सिंह ने जयंत चौधरी को मात दे दी। दरअसल इस सीट पर भी अति पिछड़ों का एकतरफा वोट भाजपा को गया। कैराना में यही वोट बैंक भाजपा की जीत का आधार बना। लगभग 69 हजार वोटों से प्रदीप कुमार जीत गए। यहां बेगम तबस्सुम का दलित-मुस्लिम समीकरण तो बेहतर था। लेकिन इस सोशल इंजीनियरिंग में बस दलित-मुस्लिम ही रह गए। बाकी वोट नहीं मिल पाए। गौतमबुद्घनगर सीट पर गठबंधन के सतबीर नागर पर सोशल इंजीनियरिंग फेल हो गई। डॉ. महेश शर्मा भारी वोटों से चुनाव जीत गए। गाजियाबाद में तो भाजपा के जनरल वीके सिंह का समीकरण बेहद मजबूत था ही। पांच लाख से ज्यादा वोटों से जीत गए। यहां सुरेश बंसल के जरिए वैश्य वोटों में सेंध लगाने कवायद थी। लेकिन यहां भी भाजपा की तरफ जमकर वोट गए।

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