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जिस घर में नारी का सम्मान नहीं, वहां नहीं रहतीं मां लक्ष्मी : कथाव्यास
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बिलारी। नगलिया जट गांव के प्राचीन शिव मंदिर परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में रविवार को कथाव्यास आरती शास्त्री ने कहा कि समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करें।
उन्होंने कहा कि जिन घरों में नारी का सम्मान नहीं होता वहां से लक्ष्मी जी दूर रहती हैं और अन्य देवी-देवता भी किनारा कर लेते हैं। बिना दैवीय कृपा के इस भौतिक जगत में जीवन यापन करना बहुत कठिन है इसलिए हमें चाहिए कि हम नारी का सम्मान करें, नारी ही घर को स्वर्ग सा सुंदर बना सकती है।
कथाव्यास ने राजा परीक्षित का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि उन्होंने अज्ञानता और अभिमान वश ऋषि के गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया था, इस कारण उन्हें श्राप मिला कि सात दिन के अंदर तेरी मृत्यु नाग के डंसने से हो जाएगी। जब परीक्षित को अपनी भूल का एहसास हुआ तब उन्होंने अपनी मुक्ति के लिए श्रीमद्भागवत कथा सुनीं। कथा व्यास ने आगे कहा कि भागवत कथा सुनने से हमारे पितर व पूर्वजों को शांति मिलती है और वह हमें आशीर्वाद प्रदान करते हैं। कथा के दौरान काफी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। कथा में महंत बालक पुरी जूना अखाड़ा, महंत गोपालपुरी, बाबा देवीदास के अलावा धर्मवीर सिंह, कृष्णा, अमरपाल आदि ने ढोलक चिमटा आदि पर संगत दी। आचार्य हरिओम ने कथा स्थल पर हवन कराया। परीक्षित के रूप में संजीव कुमार, रनवीर सिंह,महेंद्र सिंह कंचन आदि रहे। कथा के सत्र के अंत में आरती हुई और भक्तों में प्रसाद बांटा गया।
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उन्होंने कहा कि जिन घरों में नारी का सम्मान नहीं होता वहां से लक्ष्मी जी दूर रहती हैं और अन्य देवी-देवता भी किनारा कर लेते हैं। बिना दैवीय कृपा के इस भौतिक जगत में जीवन यापन करना बहुत कठिन है इसलिए हमें चाहिए कि हम नारी का सम्मान करें, नारी ही घर को स्वर्ग सा सुंदर बना सकती है।
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कथाव्यास ने राजा परीक्षित का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि उन्होंने अज्ञानता और अभिमान वश ऋषि के गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया था, इस कारण उन्हें श्राप मिला कि सात दिन के अंदर तेरी मृत्यु नाग के डंसने से हो जाएगी। जब परीक्षित को अपनी भूल का एहसास हुआ तब उन्होंने अपनी मुक्ति के लिए श्रीमद्भागवत कथा सुनीं। कथा व्यास ने आगे कहा कि भागवत कथा सुनने से हमारे पितर व पूर्वजों को शांति मिलती है और वह हमें आशीर्वाद प्रदान करते हैं। कथा के दौरान काफी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। कथा में महंत बालक पुरी जूना अखाड़ा, महंत गोपालपुरी, बाबा देवीदास के अलावा धर्मवीर सिंह, कृष्णा, अमरपाल आदि ने ढोलक चिमटा आदि पर संगत दी। आचार्य हरिओम ने कथा स्थल पर हवन कराया। परीक्षित के रूप में संजीव कुमार, रनवीर सिंह,महेंद्र सिंह कंचन आदि रहे। कथा के सत्र के अंत में आरती हुई और भक्तों में प्रसाद बांटा गया।