Moradabad: सिस्टम के दावों पर जमी बर्फ...खुले में ठिठुर रहे लोग, शहर में बने रैन बसेरे में नहीं मिल रही जगह
मुरादाबाद में रैन बसेरों के दावों के बावजूद कई बेघर लोग सड़कों पर ठिठुरते मिले। अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया कि कुछ लोगों के पास आधार न होने और कई को जानकारी न होने के कारण व खुले में सोने को मजबूर हैं।
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मुरादाबाद में कई जगह रैन बसेरे हैं। कुछ स्थायी तो कुछ अस्थायी। सभी जगह मुकम्मल इंतजाम भी हैं। इसके बावजूद भी प्रशासन के बेघर लोगों को सुविधा मुहैया कराने के दावे सड़क पर ठिठुरते दिख रहे हैं। शनिवार को भी अमर उजाला के रिपोर्टर द्वारा देर रात की गई पड़ताल में यह स्थिति सामने आई।
बुध बाजार, इंपीरियल तिराहा, पीतलनगरी बस स्टैंड, डबल फाटक समेत कई स्थानों पर लोग फुटपाथ, बस स्टॉफ की बेंच और दुकानों के आगे सोते मिले। पूछने पर किसी ने बताया कि उसके पास आधार कार्ड नहीं है। इस वजह से रैन बसेरों में उनका प्रवेश नहीं हो पाता। कुछ के पास आधार कार्ड है लेकिन उनका आरोप है कि रैन बसेरे में सोने के लिए रुपये मांगे जाते हैं।
तो कई ऐसे लोग भी हैं जिन्हें पता ही नहीं है कि जहां वह सो रहे हैं, उससे कुछ दूरी पर रैन बसेरा है। शनिवार को देर रात 12 बजे आर्य कन्या इंटर कॉलेज के बाहर सड़क किनारे सो रहे संजय बताते हैं कि वह चंदौसी के रहने वाले हैं। उनके पास आधार कार्ड और पेन कार्ड दोनों हैं लेकिन रैन बसेरे में कोई उन्हें सोने नहीं देता।
डबल फाटक पुल के पास एक दुकान के बाहर फर्श पर कंबल बिछाकर पांच लोग सोते मिले। इनमें से हरदोई निवासी कपिल बताते हैं कि वह सड़क किनारे ही सोते हैं। रैन बसेरे के बारे में जानकारी नहीं है।
खाली मिले रैन बसेरे
शनिवार को देर रात 12 बजे के बाद मुरादाबाद डिपो और पीतल नगरी डिपो पर बने अस्थायी रैन बसेरे में 50 प्रतिशत बेड खाली थे। जबकि रेलवे स्टेशन के पास बने स्थायी रैन बसेरे के पुरुष कक्ष में बेड फुल थे। महिला कक्ष में कई बेड खाली थे। यहां तहसीलदार धीरेश कुमार और उनकी टीम ने व्यवस्थाओं का जायजा भी लिया। उन्होंने बताया कि कई लोगों को सड़क से उठाकर रैन बसेरे में सुलाया गया है। कई लोग ऐसे भी हैं जो रैन बसेरे में आना ही नही चाहते।
मेरा घर पहले शहर में ही था, अब कोई ठिकाना नहीं है। दिन में रिक्शा चलाता हूं और रात में सड़क किनारे सो जाता हूं। रैन बसेरे में कोई सोने नहीं देता, कहां जाऊं। - अब्दुल हमीद
मैं दुकानों के बाहर सफाई का छोटा-मोटा काम करता हूं लेकिन मेरे पास आधार कार्ड नहीं है। इसलिए रैन बसेरे में नहीं जा सकता। सड़क किनारे ही बिस्तर बिछाकर सो जाता हूं। - राजू
मैं एक दुकान पर मजदूर हूं और शटरिंग का काम करता हूं। घर कटघर इलाके में ही है लेकिन वहां कोई अपना नहीं। इसलिए घर नहीं जाता। जहां जगह मिलती है सो जाता हूं। रैन बसेरे के बारे में मुझे जानकारी नहीं है। - अमित
मैं बुलंदशहर का रहने वाला हूं। तीन महीने से घर से निकला हुआ हूं। मजदूरी करके पेट भर लेता हूं। रेलवे स्टेशन या बाजार में जहां जगह मिलती है सो जाता हूं। कभी रैन बसेरे में जाने की कोशिश नहीं की। - सोनू, बुलंदशहर