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Moradabad News: शिप की देरी से पीतलनगरी का निर्यात संकट में, रोज 21 लाख रुपये पड़ रहा बोझ
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मुरादाबाद। पीतलनगरी का हस्तशिल्प उद्योग इन दिनों गंभीर लॉजिस्टिक संकट से जूझ रहा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों में बदलाव का सीधा असर शिपिंग व्यवस्था पर पड़ रहा है। मुंबई के न्हावा शेवा और गुजरात के मुंद्रा बंदरगाहों पर कंटेनरों को समय पर शिप नहीं मिल रही है। इसकी वजह से निर्यातकों को एक सप्ताह की मुफ्त अवधि समाप्त होने के बाद प्रत्येक कंटेनर पर रोज औसतन तीन हजार रुपये तक ग्राउंड शुल्क देना पड़ रहा है।
मुरादाबाद से प्रतिदिन करीब 70 कंटेनर हैंडीक्राफ्ट और होम डेकोर उत्पाद मुंद्रा और न्हावा शेवा बंदरगाहों के लिए भेजे जाते हैं। करीब दो महीने पहले कंटेनरों को एक सप्ताह के भीतर शिप मिल जाती थी, लेकिन अब जहाज मिलने में 20 दिन लग रहे हैं। इस दौरान कंटेनर बंदरगाह पर ही खड़े रहते हैं। इन कंटेनरों पर एक सप्ताह की मुफ्त अवधि समाप्त होने के बाद ग्राउंड शुल्क लगना शुरू हो जाता है। लासा लॉजिस्टिक आईएनसी के निदेशक अनुराग थापन ने बताया कि वर्तमान में मुरादाबाद के करीब 700 कंटेनर शिपमेंट का इंतजार कर रहे हैं। प्रत्येक कंटेनर पर रोज औसतन तीन हजार रुपये तक अतिरिक्त ग्राउंड शुल्क देना पड़ रहा है। इससे निर्यातकों पर प्रतिदिन करीब 21 लाख रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि जल्द शिप उपलब्ध नहीं हुईं तो यह बोझ और बढ़ेगा।
निर्यातकों का कहना है कि पहले ही कच्चे माल, बिजली, परिवहन और फ्रेट दरों में बढ़ोतरी से लागत बढ़ चुकी है। अब ग्राउंड शुल्क ने उद्योग पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। निर्यातक विशाल खन्ना ने बताया कि सबसे बड़ी समस्या समय पर माल की डिलीवरी नहीं हो पाना है। यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों के खरीदार तय समय पर माल चाहते हैं, लेकिन शिप में देरी से निर्यात प्रभावित हो रहा है।
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शिपिंग व्यवस्था में सुधार की मांग
-एचआर डिजाइन्स के संचालक रजत अग्रवाल ने कहा कि कंटेनरों की उपलब्धता बढ़ाने और शिपिंग व्यवस्था में तत्काल सुधार की जरूरत है। वह बताते हैं कि यदि कोई कंटेनर 10 दिन तक पोर्ट पर खड़ा रहता है तो उसका कुल ग्राउंड शुल्क करीब 30 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। इससे उत्पादों की लागत लगातार बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है।
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शिपमेंट में देरी से घट रहे ऑर्डर
-आईआईए की एक्सपोर्ट-इंपोर्ट समिति के अध्यक्ष सुरेश कुमार गुप्ता ने बताया कि शिपमेंट में लगातार हो रही देरी का असर नए ऑर्डरों पर भी पड़ रहा है। अमेरिका और कई यूरोपीय देशों से ऑर्डर कम मिल रहे हैं। कई खरीदार ऑर्डर होल्ड पर रख रहे हैं। वहीं कुछ ऑर्डर रद्द भी हो चुके हैं। उनका कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो आने वाले महीनों में निर्यात कारोबार पर इसका और गंभीर असर पड़ सकता है।
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मुरादाबाद से प्रतिदिन करीब 70 कंटेनर हैंडीक्राफ्ट और होम डेकोर उत्पाद मुंद्रा और न्हावा शेवा बंदरगाहों के लिए भेजे जाते हैं। करीब दो महीने पहले कंटेनरों को एक सप्ताह के भीतर शिप मिल जाती थी, लेकिन अब जहाज मिलने में 20 दिन लग रहे हैं। इस दौरान कंटेनर बंदरगाह पर ही खड़े रहते हैं। इन कंटेनरों पर एक सप्ताह की मुफ्त अवधि समाप्त होने के बाद ग्राउंड शुल्क लगना शुरू हो जाता है। लासा लॉजिस्टिक आईएनसी के निदेशक अनुराग थापन ने बताया कि वर्तमान में मुरादाबाद के करीब 700 कंटेनर शिपमेंट का इंतजार कर रहे हैं। प्रत्येक कंटेनर पर रोज औसतन तीन हजार रुपये तक अतिरिक्त ग्राउंड शुल्क देना पड़ रहा है। इससे निर्यातकों पर प्रतिदिन करीब 21 लाख रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि जल्द शिप उपलब्ध नहीं हुईं तो यह बोझ और बढ़ेगा।
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निर्यातकों का कहना है कि पहले ही कच्चे माल, बिजली, परिवहन और फ्रेट दरों में बढ़ोतरी से लागत बढ़ चुकी है। अब ग्राउंड शुल्क ने उद्योग पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। निर्यातक विशाल खन्ना ने बताया कि सबसे बड़ी समस्या समय पर माल की डिलीवरी नहीं हो पाना है। यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों के खरीदार तय समय पर माल चाहते हैं, लेकिन शिप में देरी से निर्यात प्रभावित हो रहा है।
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शिपिंग व्यवस्था में सुधार की मांग
-एचआर डिजाइन्स के संचालक रजत अग्रवाल ने कहा कि कंटेनरों की उपलब्धता बढ़ाने और शिपिंग व्यवस्था में तत्काल सुधार की जरूरत है। वह बताते हैं कि यदि कोई कंटेनर 10 दिन तक पोर्ट पर खड़ा रहता है तो उसका कुल ग्राउंड शुल्क करीब 30 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। इससे उत्पादों की लागत लगातार बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है।
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शिपमेंट में देरी से घट रहे ऑर्डर
-आईआईए की एक्सपोर्ट-इंपोर्ट समिति के अध्यक्ष सुरेश कुमार गुप्ता ने बताया कि शिपमेंट में लगातार हो रही देरी का असर नए ऑर्डरों पर भी पड़ रहा है। अमेरिका और कई यूरोपीय देशों से ऑर्डर कम मिल रहे हैं। कई खरीदार ऑर्डर होल्ड पर रख रहे हैं। वहीं कुछ ऑर्डर रद्द भी हो चुके हैं। उनका कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो आने वाले महीनों में निर्यात कारोबार पर इसका और गंभीर असर पड़ सकता है।