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UP: पत्नी बनी पराई, मजहबी सरहदें लांघ कर मुस्लिमों ने दी तेजपाल को अंतिम विदाई; अंजान ने निभाया बेटे जैसा फर्ज
अमर उजाला नेटवर्क, मुरादाबाद
Published by: Sharukh Khan
Updated Thu, 26 Mar 2026 03:14 PM IST
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सार
पत्नी पराई बन गई। मजहबी सरहदें लांघ कर मुस्लिमों ने तेजपाल को अंतिम विदाई दी। बेझिझक कांधा देकर रामगंगा तक अर्थी पहुंचाई। अंजान युवक ने मुखाग्नि देकर बेटे जैसा फर्ज निभाया।
तेजपाल की मौत
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
हिंदू-मुस्लिम एकता की कई मिसालें पेश कर चुके अगवानपुर में बुधवार को गंगा-जमुनी तहजीब का एक और बड़ा उदाहरण सामने आया। पत्नी समेत अपनों की बेरुखी का लंबे समय से सामना कर रहे 76 वर्षीय तेजपाल सिंह ने अंतिम सांस ली तो भी उनके अपनों का दिल नहीं पसीजा। तलाकशुदा पत्नी के आने से इन्कार और गांव में कोई रिश्तेदार न होने से कस्बे के एक हिंदू युवक ने अपने हाथों उनकी अंत्येष्टि व मुखाग्नि का जज्बा दिखाया।
साथ ही कस्बे के तमाम मुस्लिमों ने हिंदुओं के कंधे से कंधे मिलाकर बुजुर्गवार को ससम्मान अंतिम विदाई दी। इस प्रक्रिया पर होने वाले खर्च के चंदे में भी मुस्लिम भाइयों ने बिना संकोच योगदान दिया। बिजनौर जिले के मूल निवासी तेजपाल एक दौर में अगवानपुर पेपर मिल में इलेक्टीशियन का काम करते थे। इस काम के चलते ही वह अगवानपुरवासी बन गए थे।
सन 97 में मिल में एक हादसे के दौरान उनकी टांगों में गंभीर चोट आई और देखते-देखते वह दिव्यांग हो गए। रोजगार का रास्ता बंद हो गया। आपसी मतभेद के कारण तेजपाल की पत्नी से भी दूरी बनती चली गई और मामला तलाक के फैसले तक पहुंच गया। संतान के नाम पर एकमात्र बेटी भी अपनी मां के साथ चली गई।
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साथ ही कस्बे के तमाम मुस्लिमों ने हिंदुओं के कंधे से कंधे मिलाकर बुजुर्गवार को ससम्मान अंतिम विदाई दी। इस प्रक्रिया पर होने वाले खर्च के चंदे में भी मुस्लिम भाइयों ने बिना संकोच योगदान दिया। बिजनौर जिले के मूल निवासी तेजपाल एक दौर में अगवानपुर पेपर मिल में इलेक्टीशियन का काम करते थे। इस काम के चलते ही वह अगवानपुरवासी बन गए थे।
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सन 97 में मिल में एक हादसे के दौरान उनकी टांगों में गंभीर चोट आई और देखते-देखते वह दिव्यांग हो गए। रोजगार का रास्ता बंद हो गया। आपसी मतभेद के कारण तेजपाल की पत्नी से भी दूरी बनती चली गई और मामला तलाक के फैसले तक पहुंच गया। संतान के नाम पर एकमात्र बेटी भी अपनी मां के साथ चली गई।
इसके बाद अकेले तेजपाल का सहारा बना एक मुस्लिम परिवार। अगवानपुर के आसिफ नामक शख्स ने पूरी तरह एकाकी हुए तेजपाल के खाने-नाश्ते की व्यवस्था अपने घर से शुरू करा दी। यही नहीं जरूरत पड़ने पर उनके लिए दवा का इंतजाम भी यही परिवार करता और बदले में कोई पैसा कभी नहीं लिया। बुधवार की सुबह करीब 10 बजे आसिफ का बेटा दस वर्षीय अमान रोज की तरह उनके लिए खाना लेकर गया।
आवाज देने पर भी न दरवाजा खुला, न भीतर से जवाब आया। घबराए अमान ने पड़ोसी को बताया। दोनों ने सटे मकान की छत से घर में झांका तो तेजपाल टॉयलेट में अचेत अवस्था में गिरे नजर आए। तत्काल पुलिस को सूचना दी गई।
चौकी प्रभारी कुलदीप शर्मा सिपाहियों के साथ आए। दरवाजा तोड़कर पुलिस भीतर दाखिल हुई तो देखा कि तेजपाल की सांसें थम चुकी थीं। पुलिस ने उनकी पत्नी और पैतृक गांव में फोन कर घटना की सूचना दी लेकिन पत्नी ने तलाक का हवाला देकर आने से इन्कार कर दिया। गांव से बताया गया कि उनके माता-पिता गुजर चुके हैं, जबकि कोई भाई-बहन है नहीं। गांव में उनका कोई खानदानी भी नहीं है।
इसके बाद आगे आए अगवानपुर के इंसानी रिश्तों की कद्र करने वाले लोग। हिंदू-मुस्लिम का फर्क मिटाकर दोनों समुदाय के कई जिम्मेदार लोगों ने आपसी आर्थिक सहयोग से उनकी अर्थी और अंत्येष्टि का सामान जुटाया। हिंदू परंपराओं के अनुसार विधिवत अर्थी तैयार करके अंतिम यात्रा निकाली और रामगंगा किनारे श्मशान की तरह इस्तेमाल होने वाले स्थान पर उनका दाह संस्कार किया।
कस्बे में ही रहने वाले मोनू ने मुखाग्नि की रस्म निभाई। अंतिम विदाई देते समय न सिर्फ बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज के लोग मौजूद थे, बल्कि अर्थी को कांधा देने में भी पीछे नहीं रहे। दो धर्मों के बीच बात-बात पर विवाद और नफरत फैलाने की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच यह घटना अगवानपुर ही नहीं आसपास के क्षेत्र में भी चर्चा का विषय बनी है।
पूर्व में रमजान के दौरान नवरात्र की शुरुआत के वक्त भी दोनों धर्मों के लोगों ने एक-दूसरे की पूजा-इबादत में पूरी तरह सहयोगी रुख रखा था। कांवड़ यात्रा के दिनों में मुस्लिमों द्वारा शिवभक्तों पर पुष्प वर्षा जैसे उदाहरण भी सामने आए थे।
आसिफ का परिवार 15 वर्ष से कर रहा था सेवा
मजहबी दायरे में सिमटने के बजाय एक बुजुर्ग की सेवा में दरियादिली दिखाने वाले आसिफ की तेजपाल सिंह से नजदीकी की कहानी भी काफी दिलचस्प है। कस्बे के लोगों ने बताया कि साल 2011 में तेजपाल ने अगवानपुर स्थित अपना मकान बेचा था, जिसे आसिफ ने खरीदा था। मकान बेचने के बाद तेजपाल एक परिचित के साथ कहीं चले गए थे। कुछ दिन बाद ही वापस आ गए और आसिफ से अपने बेचे मकान में ही रहने की इच्छा जताई। आसिफ ने न सिर्फ इस पर सहमति जताई बल्कि उनके नाश्ते-खाने के इंतजाम की जिम्मेदारी भी अपने परिवार को दे दी। इस परिवार ने दूसरे धर्म के अंजान से बने इस अपनेपन के रिश्ते को तेजपाल की अंतिम सांस तक निभाया भी।
मजहबी दायरे में सिमटने के बजाय एक बुजुर्ग की सेवा में दरियादिली दिखाने वाले आसिफ की तेजपाल सिंह से नजदीकी की कहानी भी काफी दिलचस्प है। कस्बे के लोगों ने बताया कि साल 2011 में तेजपाल ने अगवानपुर स्थित अपना मकान बेचा था, जिसे आसिफ ने खरीदा था। मकान बेचने के बाद तेजपाल एक परिचित के साथ कहीं चले गए थे। कुछ दिन बाद ही वापस आ गए और आसिफ से अपने बेचे मकान में ही रहने की इच्छा जताई। आसिफ ने न सिर्फ इस पर सहमति जताई बल्कि उनके नाश्ते-खाने के इंतजाम की जिम्मेदारी भी अपने परिवार को दे दी। इस परिवार ने दूसरे धर्म के अंजान से बने इस अपनेपन के रिश्ते को तेजपाल की अंतिम सांस तक निभाया भी।
... इसी मकान से उठेगी मेरी अर्थी
कस्बे के लोगों ने बताया कि जब तेजपाल सिंह ने बेचने के बाद भी अपने मकान में रहने की ख्वाहिश आसिफ से साझा की तो कहा था...मैं यहीं रहूंगा, मेरी अर्थी इसी मकान से उठेगी। आसिफ और कस्बे के बड़े दिलवाले मुस्लिमों ने उनकी इस बात का पूरा सम्मान रखा।
कस्बे के लोगों ने बताया कि जब तेजपाल सिंह ने बेचने के बाद भी अपने मकान में रहने की ख्वाहिश आसिफ से साझा की तो कहा था...मैं यहीं रहूंगा, मेरी अर्थी इसी मकान से उठेगी। आसिफ और कस्बे के बड़े दिलवाले मुस्लिमों ने उनकी इस बात का पूरा सम्मान रखा।
हर किसी को अखरी विधिवत श्मशान घाट न होने की कमी
अगवानपुर के लोगों ने बताया कि कस्बे में हिंदू शवों के दाह संस्कार के लिए विधिवत श्मशान या कोई निर्धारित स्थान नहीं है। रामगंगा किनारे किसी भी उबड़-खाबड़ स्थान पर लोगों को अंत्येष्टि के लिए मजबूर होना पड़ता है। रामलीला कमेटी के अध्यक्ष वरुण गुप्ता ने नाराजगी जताते हुए कहा कि श्मशान घाट न होने से नदी किनारे कच्चे या गड्ढों जैसे स्थानों पर अंत्येष्टि करनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में सैकड़ों बीघा सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे हैं लेकिन जिम्मेदार श्मशान के लिए भूमि उपलब्ध नहीं करा रहे। इसकी वजह से विधिवत श्मशान के लिए रिलीज बजट वापस हो जाता है।
अगवानपुर के लोगों ने बताया कि कस्बे में हिंदू शवों के दाह संस्कार के लिए विधिवत श्मशान या कोई निर्धारित स्थान नहीं है। रामगंगा किनारे किसी भी उबड़-खाबड़ स्थान पर लोगों को अंत्येष्टि के लिए मजबूर होना पड़ता है। रामलीला कमेटी के अध्यक्ष वरुण गुप्ता ने नाराजगी जताते हुए कहा कि श्मशान घाट न होने से नदी किनारे कच्चे या गड्ढों जैसे स्थानों पर अंत्येष्टि करनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में सैकड़ों बीघा सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे हैं लेकिन जिम्मेदार श्मशान के लिए भूमि उपलब्ध नहीं करा रहे। इसकी वजह से विधिवत श्मशान के लिए रिलीज बजट वापस हो जाता है।