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Muzaffarnagar News: फसलें पड़ीं पीली, यूरिया के ग्लू से गिरोह हरा
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मुजफ्फरनगर। एक तरफ अन्नदाता इन दिनों यूरिया के एक-एक बोरे के लिए मोहताज है वहीं दूसरी तरफ गिरोह के सदस्य किसानों के हक पर डाका डालकर मुनाफे का ग्लू बना रहे हैं। दुकानों से लेकर प्लाईवुड फैक्टरी तक गिरोह के सदस्यों की चेन बनी हुई है। सबका अपना हिस्सा और मुनाफा है।
इंडस्ट्रियल टेक्निकल ग्रेड-1 यूरिया के बजाय लागत कम करने के लिए प्लाई चिपकाने में किसानों के यूरिया से ग्लू बनाया जा रहा था। इसमें फैक्टरी संचालकों को 10 गुणा कम खर्च करना पड़ता और वे बचत उतनी ही ले रहे थे। 265 रुपये का बोरा फैक्टरी में 850 रुपये में सप्लाई किया जाता था। इसके बाद भी फैक्टरी मालिक ग्लू बनाकर मुनाफा कमा रहे थे।
प्लाईवुड फैक्टरी में ग्लू बनाने के लिए इंडस्ट्रियल टेक्निकल ग्रेड-1 यूरिया प्रयोग किया जाता है। ग्लू का ग्रेड-1 यूरिया पर 80 से 100 रुपये प्रति किलोग्राम खर्च आता था। सहारनपुर और हरियाणा के यमुनानगर समेत अन्य क्षेत्रों में प्लाईवुड फैक्टरी संचालकों ने लागत कम करने के लिए नया तरीका निकाला।
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किसानों को आवंटित यूरिया से ग्लू बनाने का काम किया जाने लगा। इस पर लागत 10 गुणा कम होकर सिर्फ पांच से छह रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई। यही वजह है कि यूरिया की मांग इन फैक्टिरियों में काफी है। इसी के चलते यूरिया की कालाबाजारी हो रही हैं।
रेकी करते हुए कार में चलते थे आरोपी : एसएसपी संजय वर्मा ने बताया कि पुलिस से बचने के लिए गिरोह के सदस्य मालवाहक वाहनों के आगे औरा गाड़ी लगाकर रेकी करते हुए चलते थे।
रास्ते में कोई परेशानी न हो, इसके लिए फर्जी बिल भी दुकानदारों से बनवा लेते थे। प्रकरण में एक अन्य साथी संजय निवासी कानोवाली रायसी लक्सर, हरिद्वार भी उनके साथ काम करता है, जो उस वक्त साथ नहीं था। खाद बेचकर जो भी मुनाफा होता था, उसे सभी लोग काम के हिसाब से आपस में बांट लेते थे।
दुकानों से खरीदकर इकट्ठा करते थे यूरिया : गिरोह के सदस्य प्रशासन की ओर से आवंटित दुकानों से यूरिया खरीदकर इकट्ठा करते रहते थे। इसके बाद सप्लाई को तस्करों के माध्यम से भेजा जाता था। जिला कृषि अधिकारी राहुल तेवतिया ने बताया कि जिले में 600 दुकाने हैं, जिनके आवंटन और स्टॉक की जांच शुरू करा दी गई है।
इंडस्ट्रियल टेक्निकल ग्रेड-1 यूरिया के बजाय लागत कम करने के लिए प्लाई चिपकाने में किसानों के यूरिया से ग्लू बनाया जा रहा था। इसमें फैक्टरी संचालकों को 10 गुणा कम खर्च करना पड़ता और वे बचत उतनी ही ले रहे थे। 265 रुपये का बोरा फैक्टरी में 850 रुपये में सप्लाई किया जाता था। इसके बाद भी फैक्टरी मालिक ग्लू बनाकर मुनाफा कमा रहे थे।
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प्लाईवुड फैक्टरी में ग्लू बनाने के लिए इंडस्ट्रियल टेक्निकल ग्रेड-1 यूरिया प्रयोग किया जाता है। ग्लू का ग्रेड-1 यूरिया पर 80 से 100 रुपये प्रति किलोग्राम खर्च आता था। सहारनपुर और हरियाणा के यमुनानगर समेत अन्य क्षेत्रों में प्लाईवुड फैक्टरी संचालकों ने लागत कम करने के लिए नया तरीका निकाला।
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रेकी करते हुए कार में चलते थे आरोपी : एसएसपी संजय वर्मा ने बताया कि पुलिस से बचने के लिए गिरोह के सदस्य मालवाहक वाहनों के आगे औरा गाड़ी लगाकर रेकी करते हुए चलते थे।
रास्ते में कोई परेशानी न हो, इसके लिए फर्जी बिल भी दुकानदारों से बनवा लेते थे। प्रकरण में एक अन्य साथी संजय निवासी कानोवाली रायसी लक्सर, हरिद्वार भी उनके साथ काम करता है, जो उस वक्त साथ नहीं था। खाद बेचकर जो भी मुनाफा होता था, उसे सभी लोग काम के हिसाब से आपस में बांट लेते थे।
दुकानों से खरीदकर इकट्ठा करते थे यूरिया : गिरोह के सदस्य प्रशासन की ओर से आवंटित दुकानों से यूरिया खरीदकर इकट्ठा करते रहते थे। इसके बाद सप्लाई को तस्करों के माध्यम से भेजा जाता था। जिला कृषि अधिकारी राहुल तेवतिया ने बताया कि जिले में 600 दुकाने हैं, जिनके आवंटन और स्टॉक की जांच शुरू करा दी गई है।